Class 9 Hindi Elective Chapter 3 आप भोले तो जग भला

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Class 9 Hindi Elective Chapter 3 आप भोले तो जग भला

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आप भोले तो जग भला

पाठ – 3

बोध एवं विचार

अभ्यासमाला

(अ) सही विकल्प का चयन करो : 

1. एक काँच के महल में कितने कुत्ते घुसे थे ? 

(क) एक ।

(ख) दो ।

(ग) एक हजार । 

(घ) कई हजार । 

उत्तर : (ख) दो ।

प्रश्न 2. काँच का महल किसका प्रतीक है ?– 

(क) संसार ।

(ख) अजायब घर ।

(ग) चिड़ियाघर ।

(घ) सपनोंका महल ।

उत्तर : (क) संसार ।

प्रश्न 3. ” निंदक बाबा वीर हमारा, बिनही कौड़ी बहै विचारा। आपन डुबे और को तारे, ऐसा प्रतीम पार उतारे।” प्रस्तुत पंक्तियों के रचयिता कौन है ? 

(क) कबीर दास ।

(ख) रैदास ।

(ग) बिहारीलाल ।

(घ) दादू । 

 उत्तर : (घ) दादु ।

प्रश्न 4. आदमी भूखा रहता है- 

(क) धनका ।

(ख) जनका ।

(ग) प्रेमका ।

(घ) मान का ।

उत्तर : (ग) प्रेमका ।

प्रश्न 5. गाँधीजी ने अहिंसा की तुलना सीमेंट से क्यों की है ? 

(क) अहिंसा से मनुष्य एक साथ रहता है । 

(ख) अहिंसा किसी को अलग नहीं होने देती ।

(ग) अहिंसा सीमेंट की तरह एक दुसरे को जोड़ कर रखती है । 

(घ) अहिंसा में सीमेंट-जैसी ताकत है । 

उत्तर : (ख) अहिंसा किसी को अलग नहीं होने देती ।

(आ) संक्षिप्त उत्तर दो : 

1. दो कुत्तों की घटना का वर्णन करके लेखक क्या सीख देना चाहते हैं ? 

उत्तर : दो कुत्तों की घटना का वर्णन द्वारा लेखक हमे यह सीखाना चाहते है कि मनुष्यों पर अपने स्वभाव की छाया पड़ती है। हम दुसरों के दोषों को न देखकर उनके गुणों की और ध्यान देना चाहिए। अगर हम अपनी गलतीयों का सुधार न करके हमेशा दूसरों के दोषों की और देखते रहे तो फिर दुनिया के लोगों का बुरी नजर हम पर जरूर पड़ेगा ही। इसलिए कहा जाता है कि ‘आप भले तो जग भला’ ‘आप बुरे तो जगबुरा।’ अतः हम अच्छाई पर ही ध्यान देना चाहिए । बुरे पर नहीं ।

2. लेखक ने संसार की तुलना काँच के महल से क्यों की है ? 

उत्तर : काँचों के टुकड़ों पर हम अपने शकल को देखते है। हम अपने सुरत को जिस प्रकार बनाकर देखना चाहता ऐसा ही देख सकता उस काँचो के दुकड़ो पर। इस दुनिया के लोगों में कोई ऐसा नहीं जो सारे और से पुर्ण है। किसि में अगर गुणों का मात्रा अधिक तो दुसरें में कम अथवा किसि में अवगुणों का मात्रा अधिक तो दुसरें में कम मनुष्यों के ये गुणों और अवगुणों को निन्दक हमेशा देखते है और उन्हें अच्छाई और बुराई का मार्ग बतलाता है। निन्दक के नजरों से लेखक ने इस संसार को काँच के महलों से तुलना करके सभी प्राणीओ के स्वभाव की छाया को हमारे सामने प्रस्तुत की है ।

3. अब्राहम लिंकन की सफलता का सबसे बड़ा रहस्य क्या था ? 

उत्तर : अब्राहम लिंकन ने दुसरों का दृष्टिकोण, दुसरों का विचारों को, भावों को समझकर चलते थे। वे कभी दुसरों की अनावश्यक नुक्ताचीनी नहीं करते थे। वे स्वयं ही कहते थे, “मैं दुसरों की अनावश्यक नुक्ताचीनी कर उनका दिल नहीं दुखाता।” लिंकन की सफलता का सबसे बड़ा रहस्य यही था ।

4. लेखक ने गांधी और सरदार पृथ्वीसिंह के उदाहरण क्या स्पष्ट करने के लिए दिए है ?

उत्तर : गाँधीजी सत्य, अहिंसा और प्रेम के पुजारी थे। वे कभी हिंसा नही चाहते थे। दुसरी और पृथ्वीसिंह एक ऐसा व्यक्ति थे जो अपनी बुराई या आलोचना सुनकर आग बबूला हो जाते थे पर वे दुनिया को दिन भर बुराई करते थे। वे दुसरों का दृष्टि कोण समझने की कोशिश नहीं करते जिसे गाँधीजी करते थे। जो व्यक्ति अपने आपको समझते है, वह दुसरो को समझ सकता है। अपने को सुधारे बिना दुसरों का दिल दुखाना हिंसा है, पृथ्वीसिंह जिसे अपनाए थे। लेकिन एकदिन वे अपनी गलती समझ लिए और वापु के सामने अपने को अर्पन कर दिया। इसके द्वारा यह साबित किया गया कि अच्छा आदर्श आदमी बनने के लिए प्रेम की शिक्षा लेना जरुरी है। क्योंकि यही प्रेम मनुष्यों को अहिंसा का मार्ग बतलाती है जिस मार्ग मे जाकर मनुष्य सत्य का दर्शन कर सकता है ।

5. रसोइया ने बिना खबर दिए लेखक के मित्र की नौकरी क्यों छोड़ दी ?

उत्तर : क्योंकि रसोइया भी एक आदमी है। उसके भी एक दिल है। प्रेम का भुखा आदमी कभी किसि से डाँट खाना नहीं चाहता। अच्छा भोजन बनाने पर भी वह लेखक के मित्र से कभी भी तारीफ के दो शब्द नहीं सुनता। उस दिन रसोइया ने दाल में बहुत नमक डाला, साग में नमक नहीं डाला, रोटी भी जली हुई थीं। इसको लेकर मालिक महाशय ने उसे दिल खोलकर डाँटा। बेचारा रसोइया मालिक पर नाराज हो गए और उन्हे सबसे बड़ा मूर्ख समझकर बिना खवर दिए भाग गए ।

6. ” अच्छा हो, सुकरात के इस विचार को मेरे मित्र अपने कमरे में लिखकर टाँग लें।” लेखक ने ऐसा क्यों कहा है ?

उत्तर : सुधारवादी लेखक श्रीमन्नारयण जी के अनुसार आपके मित्र सदा दुसरों के दोषों को देखते रहे थे। वे दुसरों की अनावश्यक नुक्ताचीनी कर उनका दिल दुखाता था। इसलिए वे किसी को अपने और आकर्षित नहीं कर पाया था। उनमें व्यवहार कुशली, शिष्टाचारों होने का अभाव था। वे स्वयं को बहुत, ज्ञानी, आदर्शवान और सम्मानीय पात्र समझते थे। पर कभी भी अपनी आखों के शहतीर को वे नहीं देखते थे। जिसकी वजह से उनकी किसी से नहीं। बनती न मित्रों से, न ऑफिस के कर्मचारियों से और घर के नौकरों से। जब लेखक को यह पताचला कि आपके मित्र ने दार्शनिक सुकरात की उस बाणी (“जो मनुष्य मूर्ख है और जानता है कि वह मूर्ख, वह ज्ञानी है, पर जो मूर्ख है और नहीं जानता कि वह मूर्ख है, वह सबसे बड़ा मूर्ख है। “) को अपने कमरे में लिखकर टाँग लेता है तो उन्हें बहुत खुश हुआ कि आगे ओर वे अपने (मुल) विचारों पर चलकर भुल न करेंगे ।

(इ) निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दो :

1. अपने मित्र को परेशान देखकर लेखक को किस किस्से का स्मरण हो आता है ? 

उत्तर : अपने मित्र को परेशान देखकर लेखक को काँच के महल में घुश कर डर के मारे भौकने, कुदने और अंत में गश स्वाकर गिरा पड़ा कुत्ता का स्मरण आता है ।

2. दुखड़ा रोते रहनेवाले व्यक्ति का दुनिया से दुर किसी जंगल में चले जाना क्यों बेहतर है ?

उत्तर : मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। अपने चिन्ता विचारों के कारण मनुष्य दुसरे प्राणी से श्रेष्ठ होते है। जो व्यक्ति अपने आपको पहचानते हैं, अपनी गलतीयों को सुधारे बिना दुसरों की अनावश्यक नुक्ताचीनी नहीं करता वही अपना जीवन को सुखमय बना सकता, जीवन को सफल बना सकता। हसी खुशी से जीवन विताना ही मनुष्यों का लक्ष्य होना चाहिए। दूसरों के गुणों पर ही हमें ध्यान देना चाहिए दोषों पर नहीं। जो दुनिया के लोगों से नम्रता और प्रेम का बरताव करेंगी, दुनिया भी उनका साथ देगी। अंग्रेजी में एक कहावत है कि अगर आप हँसेंगे तो दुनिया भी आपका साथ देगी, पर अगर आपको गुस्सा होना और रोना ही है तो दुनिया से दूर किसी जंगल मे चले जाना ही हितकर होगा ।

3. ‘प्रेम और सहानुभूति से किसी को भी अपने वश में किया जा सकता है। यह स्पष्ट करने के लिए लेखक ने क्या-क्या उदाहरण दिए हैं ? 

उत्तर : जीवन जीने के लिए हर एक मनुष्य को प्रेम और सहानुभूति को शिक्षा लेना आवश्यक है। किसी भी प्राणी प्रेम का भुखा रहता है। किसी ने किसी से खरी खटी सुनना नही चाहता। लेखक ने इस प्रसंग पर कुछ उदाहरण हमारे सामने प्रस्तुत करते है जो निम्नांकित है । 

(क) प्रेम और सहानुभूति न होने के कारण लेखक के मित्र को किसी से नहीं बनती। केवल मित्र ही नहीं घर के नौकर भी उनका साथ छोड़कर चला गया था। लेखक के मित्र में प्रेम का जैसा शहद का अभाव था। लेखक कहते है कि शहद की एक बूँद ज्यादा भक्खियों को आकर्षित करती है, वजाय एक सेर जहर के ।

(ख) प्रेम और सहानुभूति को जो समझते है वह दुसरो को अपमान कर उनका दिल को नहीं दुखाता। जँहा प्रेम नही वहा घृणा और हिंसा घेर लेता है। घृणा और हिंसा का वश होनेवाले लोग भेद का दीवार खड़ा करता, एकता की नहीं। महात्मा गाँधी प्रेम और सहानुभूति की मूर्ति थे। वे हिंसा के मार्ग मे चलनेवाले पृथ्वीसिंह जैसा सरदार को अहिंसा का पाठ पढ़ाकर अपना वश अर्थात प्रेम का वश कर लिया था ।

(ग) मनुष्य की तरह जानवर ने भी प्रेम की भाषा समझते है। अमेरिका के मशहुर लेखक इमर्सन अपने लड़के के साथ मिलकर जब एक नन्हे बछड़े को झोपड़ी के अंदर लेने के लिए बहुत जोर खींचने लगे तो सारी ताकत लगाकर बछड़ा भी पीछे हटने लगा। इमर्सन को बड़े परेशान हुए। इतने में बुढ़ी नौकरानी उधर से निकली। तमाशा देखकर वह दौड़ी आई और अपना अंगुठा बछड़े के मुँह में प्यार से डालकर उसे झोंपड़ी की तरफ ले जाने लगी बछड़ा चुपचाप कुटी के अन्दर चला गया। यही है प्रेम का जादु ।

(घ) लेखक के मित्र के पास एक रसोइया था। वह भोजन बनाकर खिलाया करता था। भोजन जितना भी स्वादिष्ट न हो मालिक उसका तारीफ नहीं करता वल्की कुछ न कुछ बिगड़ जाने की दोहाई देकर उनको सुबह से शाम तक दिल खोलकर डॉटा ही करता था। मालिक महाशय के दिल में किसी की जिंदगी और विचारों का जगह नहीं था। वे दूसरों से प्यार नहीं रखते पर हमेशा दूसरो से प्यार चाहते। यह जानबुझकर लोग उनका साथ देना छोड़ दिया था। यह रसोइया भी कुछ कहै बिना उनका साथ छोड़कर भाग गया ।

इस प्रकार लेखक ने प्रेम और सहानुभूति का जीवन जीने पर कितना गंभीर और हृदय स्पर्शी भूमिका है इसमें स्पष्ट किया है ।

4. लेखक ने अपने मित्र की किन गलतियों का वर्णन किया है ? 

उत्तर : दुनिया में पुर्ण कोई नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति से गलतिया होती हैं। इसलिए एक दुसरे को सुधारने की कोशिश करना अनुचित ही समझना चाहिए। इस प्रसंग पर ही लेखक श्रीमन्नारायण जी ने अपने मित्र की इसमें वर्णन किया है। कुछ गलतियों का लेखक के मतानुसार वे दुसरों का दृष्टिकोण समझने की कोशिश नहीं करते। दुसरों के विचारों को, कामों को, भावनाओं को आलोचना करना ही अपना परम धर्म समझते हैं। उनका शायद यह ख्याल है कि ईश्वर ने उन्हें लोगों को सुधारने के लिए ही भेजा है। लेखक के मित्र का दुसरा गलती यह है कि वे अपनी बुराई या आलोचना दुसरों के मुँह में सुनकर आगबबुला हो जाते है, भले ही वे दुनिया की दिनभर बुराई करते रहें। लेखक के मित्र का तीसरी गलती यह है कि वे अपनी प्रेम और सहानुभूति से दुसरों की गलतीयों को समझाया नहीं कर सकता जिस तरह गाँधाजी कर सकते थे।

5. इस पाठ का आधार पर बताओ कि ‘हमें क्या  करना चाहिए और क्या नहीं करना चहिए।’

उत्तर : हम अपने को पूर्ण मानव बनाने के लिए कुछ विशेष बातों पर ध्यान देना चाहिए। सभी प्राणीओं से श्रेष्ठ होकर भी मनुष्यों को यह भुल जाना नहीं चाहिए कि वह सब गलतीयों से मुक्त है। हमें याद रखना चाहिए कि यदि मनुष्य स्वयं भला है तो उसे सारा संसार भला दिखाई देता है। हमें सदैव दुसरों की अच्छाइयों को देखना चाहिए, दुसरों की बुराईयों पर ध्यान देना नहीं चाहिए। हर परिस्थिति में खुश रहने के लिए महापुरुषों के द्वारा प्राप्त विचारों और आदर्शो पर चलना चाहिए। इस प्रसंग में महात्मा गाँधी, सत्यवीर सुकरात, कबीर तथा दादु के बाणीओं का हमेशा स्मरण करना चाहिए और उनके द्वारा दिखाये गए मार्ग पर चलना चाहिए। सभी प्राणीओं को प्रेम और सहानुभूति से देखना चाहिए। दूसरों की अनावश्यक नुक्ताचीनी करके उनका दिल दुखाना नहीं चाहिए। हमें दुसरों के अवगुणों पर टिका-टिप्पनी बंद करना चाहिए। अपनी बुराई की आलोचना सुनकर आगबबुला होना अनुचित है। क्योंकि इससे हमारी अवगुणों का दुर न हो सकता, वल्कि हमें निन्दक का यह बिना खर्च का उपकार मानलेना ही चाहिए। इस सिलसिले में यह अवश्य जरुरी है कि हम अपने विचारों को नम्रता और प्रेमपूर्वक दुसरों के सामने पेश करना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि आदमी प्रेम का भूखा रहता है। कोई किसी से खरी खटी सुनना नहीं चाहता। इसलिए हम एक दुसरे को तारीफ करना चाहिए। हिंसा का मार्ग त्यागकर सत्य, प्रेम और अहिंसा का मार्ग पर चलना चाहिए।

Sl. No.Contents
Chapter 1हिम्मत और जिंदगी
Chapter 2परीक्षा
Chapter 3आप भोले तो जग भला
Chapter 4बिंदु बिंदु विचार
Chapter 5चिड़िया की बच्ची
Chapter 6चिकित्सा का चक्कर
Chapter 7अपराजिता
Chapter 8मणि-कांचन संयोग
Chapter 9कृष्ण- महिमा
Chapter 10दोहा दशक
Chapter 11चरैवेती
Chapter 12नर हो, न निराश करो मन को
Chapter 13मुरझाया फुल
Chapter 14गाँँव से शहर की ओर
Chapter 15साबरमती के संत (सधु)
Chapter 16टूटा पहिया

(ई) आशय पष्ट करो: 

(क) शहद की एक बूँद ज्यादा मक्खियों को आकर्षित करती है वजाय एक सर जहर के ।

उत्तर : इस पंक्ति के जरिए लेखक यह कहना चाहता है कि मक्खियों के उपर एक बूँद शहद का जितना असर होता है, एक सेर जहर भी उतना अस फेला नहीं सकता। शहद की तरह बुरे मनुष्यों को अपनी और आकर्षण करने के लिए हमें प्रेम और सहानुभूति तथा नम्रता से बातें करनी चाहिए। क्योंकि इसमें जो मिठास है उतना मिठास खरी खटी में कहाँ ? दुसरों को डाँटकर नही, प्रेम दरशाकर ही बातें करनी चाहिए।

(ख) लोग दुसरों की आँखों का तिनका तो देखते हैं, पर अपनी आँख शहतीर को नहीं देखते।

उत्तर : इस पंक्ति में सुधारवादी निबंधकार श्रीमन्नारायण जी ने मनुष्यों के वीच रहे अवगुणों के बारे में अपना विचार प्रकट किया है। इस पंक्ति का मतलब यह है कि ज्यादातर मनुष्य दुसरों की बुराइयों को देखते है और अनावश्यक नुक्ताचीनी करते है । लेकिन वे भुल जाते है कि उनके अन्दर भी दुसरों से अधिक गलतीयाँ भरी हुई है। यह सही है कि हमारे अनेक लोग अपनी गलतीयों की और ध्यान नहीं देते। अगर लोग अपने आप को सुधारकर दुसरों का देखरेख करता तो सारी दुनिया भी सुन्दर दिखाई देता। इससे यह साबित किया गया कि जो लोग भले है वह दूसरों की भलाई ही देखते है तथा दुसरों की भलाई के लिए ही काम करते हैं ।

(ग) जो मनुष्य मूर्ख है और जानता है कि वह मूर्ख है वह ज्ञानी है, पर जो मूर्ख है और नहीं जानता कि वह मूर्ख है, वह सबसे बड़ा मूर्ख है।

उत्तर : इस पंक्ति से लेखक ग्रीक दार्शनिक संन्त सत्यवीर सुकरात को एक महान आदर्श पुरुष के रुप में हमारे सामने प्रस्तुत किया है। सुकरात की यह वाणी हम सबका स्मरणीय है। इसका यह अर्थ है कि जो ज्ञानी होगा उनसे भुल होगा ही नहीं, वह आसानी से अपने आपको सुधार कर सकता है, और जो मूर्ख होकर चलेगा उनसे कोई साथ नहीं देगा और हमेशा परेशानी में दिन विताना होगा। अपनी गलतीयों को सुधार लेने के लिए तथा अपने आप को पहचानने के लिए सुकरात की यह वाणी शहद की तरह मिठी है जो सभी का दिल खींच लेता है ।

भाषा एवं व्याकरण ज्ञान

1. निम्नलिखित शब्दों का उच्चारण करो :

उत्तर : नजर,  जोर,  हजार,  नाराज,  जरूर,  जरा , जिन्दगी ,  तारीफ ,  ऑफिस,  सफाई,  फैशन,  फन । 

उपर्युक्त शब्दों में “ज” और “फ” अरबी-फारसी तथा अंग्रेजी से आए तत्सम शब्दों की ध्वनियाँ हैं। इन्हें संघर्षो ध्वनि कहते है, क्योंकि इनका उच्चारण करते समय हवा घर्षण के साथ निकलती है, जबकी “ज” और “फ” ध्वनि के उच्चारण में हवा रुकती है ।

निम्नलिखित शब्दों में अंतर समझते हुए उच्चारण करो और उनका वाक्यों में प्रयोग करो :

जरा     (बुढ़ापा)               

जरा    (थोड़ा-सा)

राज     (राज्य)                 

राज     (रहस्य)

तेज     (चमक)                

तेज    (फुर्तीला

फन    (साँप का फण)        

फन     (कला)

उत्तर : वाक्य रचना : जरा (बुढ़ापा) ― प्रफुल्ल को जरा अवस्था प्राप्त हुआ है ।

जरा (थोड़ासा) ― जरा पानी देना बहुत प्यास लगी है।

राज (राज्य) ― राम ने अयोध्या में राज कर रहा है ।

राज (रहस्य) ― तुम्हारे तन्दरुस्ति का राज क्या है ?

तेज (चमक) ― सुर्य का तेज बहुत ज्यादा है ।

तेज (फुर्तीला) ― शचीन बहुत तेज दौढ़ता है ।

फन (साँप का फण) ― नागिन का फन का सामने नाचोमत । 

फन (कला) ― अजय अभिनय मे अपना फन दिखाया । 

नोट : आजकल इन शब्दों में “नुक्ता” का प्रयोग कम हो रहा है ।

2. निम्नलिखित गद्यांश का पाठ करते समय इसका ध्यान रखो कि तिरछी रेखाएँ क्षणभर ठहराव का संकेत देती हैं। इसी के अनुसार इसे पढ़ो ।

महात्मा गाँधी ने / पृथ्वीसिंह से कहा / सरदार साहब, अगर आप सेवाग्राम में आकर/मेरे आश्रम में रह सकें/ तभी मैं समझूँगा कि आपने अहिंसा का पाठ/ सचमुच सीख लिया है ।”

पृथ्वीसिंह जरा चौंककर बोले/”आपका क्या मतलब बापुजी?” “भाई/मेरा आश्रम तो/एक प्रयोगशाला जैसा ही है/जिन लोगों की कहीं नहीं बनती, / अक्सर वे मेरे पास आ जाते हैं। उन सबको एक साथ रखने में/मैं सीमेंट का काम करता हूँ/और वह सीमेंट/मेरी अहिंसा ही है ।”

3. निम्नलिखित बिलोम शब्दों के अर्थ का अंतर स्पष्ट करते हुए उनका वाक्यों में प्रयोग करो :

ध्वनि ― प्रतिध्वनि ।

अहिंसा ― हिंसा ।

क्रिया — प्रतिक्रिया ।

फल ― प्रतिफल ।

उत्तर : वाक्य रचना)

ध्वनि ― महात्मा गाँधी ने सन 1942 मे अंगरेजो के खिलाफ भारत छोढ़नेका ध्वनि उठाया था ।

प्रतिध्वनि ― पहाड़ मे ध्वनि का प्रतिध्वनि होता है । 

हिंसा ― दुसरों से हिंसा मत करना । 

अहिंसा ― महात्मा जी ने अहिंसा का वाणी प्रचार किया था ।

क्रिया ― क्रिया का कितना रुप है वताओ । 

प्रतिक्रिया ― हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया होते है ।

फल ― अच्छा काम का अच्छा फल मिलता है ।

प्रतिफल ― परमाणु चुक्ति का प्रतिफल क्या होगा किसीको मालुम नही । 

4. निम्नलिखित वाक्यों को निर्देशानुसार परिवर्तन करो : 

(क) जब मैं अपने मित्र को हमेशा परेशान, नाराज और चिड़चिड़ाते देखता हुँ तब इसी किस्से का स्मरण हो आता है। (वचन वदलो) ।

उत्तर : जब हम अपने मित्रों को हमेशा परेशान, नाराज और चिड़चिड़ाते देखते हैं तब इसी किस्से का स्मरण हो आता है ।

(ख) दुखी होने का कोई कारण नहीं (प्रश्नवाचक बनाओ)। 

उत्तर : दुखी होने का कोई कारण है क्या ?

(ग) रंग-बिरंगे फुल खिले हैं । (बिस्मयादिबोधक बनाओ)।

उत्तर : अरे रंग-बिरंगे फुल खिले है !

(घ) वह अनपढ़ नौकरानी किताबें और कबिताएँ लिखना नहीं जानती थी, पर व्यावहार कुशल अवश्य थी।

उत्तर : वह अनपढ़ नौकर किताबे और कविताएँ लिखना नहीं जानता था। पर व्यावहार कुशल जानता था । 

(ङ) है तो वह भी आदमी ही। (सामान्य वाक्य बनाओ)। 

उत्तर : वह भी आदमी है ।

5. निम्नलिखित मुहावरों के अर्थ लिखकर उनका वाक्यों में प्रयोग करो :

आगबबुला होना, नुक्ताचीनी करना, टूट पड़ना, चुटकियाँ लेना, कोई चारा न होना ।

उत्तर : 1. आग बबुला होना (अत्यन्त उत्तेजित हो उठना) ― राघव तुमसे बहुत नाराज है। तुम उसके पास न जाओ, तुमको देखते ही वह आग बबुला हो जायगा । 

2. नुक्ताचीनी करना : (दोष निकालना) ― दुसरों की अनावश्यक नुक्ताचीनी करना भले लोगों का काम नहीं है ।

3. टूट पड़ना : (आक्रमण करना) ― पुलिस हथियार लेकर अत्याचारिओं पर टूट पड़े ।

4. चुटकियाँ लेना : (व्यंग्य करना) ― गाँधीजी मीठी चुटकीयाँ लेकर कड़ी से कड़ी आलोचना कर सकते थे।

5. कोई चारा न होना (कोई उपाय न होना) ―  रसोइयाँ को डाँटनेवाले मालिक को कहे बिना भाग जाने की सीवा कोई चारा न होना था ।

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