SEBA Class 10 Elective Hindi Sample Paper – 1 | দশম শ্ৰেণীৰ হিন্দী প্ৰশ্নকাকত

SEBA Class 10 Elective Hindi Sample Paper – 1, HSLC Elective Hindi Model Question Answer, দশম শ্ৰেণীৰ হিন্দী প্ৰশ্নকাকত to each chapter is provided in the list of SEBA so that you can easily browse through different chapters and select needs one. Assam Board Elective Hindi Sample Paper Class 10 SEBA can be of great value to excel in the examination.

Join Telegram Groups
SEBA Class 10 Elective Hindi Simple Paper and Question Answer

SEBA Class 10 Elective Hindi Sample Paper – 1

HSLC Model Question Paper provided is as per the Latest Assam Board Curriculum and covers all the questions from the SEBA Textbooks. Access the detailed SEBA Class 10 Elective Hindi Sample Paper – 1 provided here and get a good grip on the subject. Access the SEBA Class 10 Elective Hindi Sample Paper – 1, Class X Elective Hindi Model Question Answer of Assamese in Page Format. Make use of them during your practice and score well in the exams.

हिंदी प्रश्नपत्र

PART – I

ELECTIVE HINDI

MODEL QUESTION ANSWER

Group – A 

1. एक वाक्य में उत्तर दो :

(क) जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित प्रथम कहानी का नाम क्या है ? 

उत्तर : जयशंकर प्रसाद द्वारा रचित प्रथम कहानी का नाम है- ‘ग्राम’ जो 1911 ई. में ‘इंदु’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।

(ख) बेनीपुरी जी को जेल की यात्राएँ क्यों करनी पड़ी थी ? 

उत्तर : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सक्रिय सेनानी के रूप में बेनीपुरी जी को 1930 ई. से 1942 ई. तक का समय जेल यात्रा में ही व्यतीत करना पड़ा।

(ग) संसार में कलम और तलवार में से किसकी शक्ति असीम है ? 

उत्तर : संसार में कलम की शक्ति असीम है।

(घ) दुनिया का ध्यान सामान्यतः किस पर जाता है ? 

उत्तर : दुनिया चकमक देखती है, ऊपर का आवरण देखती है, बाह्य चमक-दमक के आकर्षण में उलझी दुनिया का ध्यान वास्तविकता की ओर नहीं जा पाता। 

(ङ) कवयित्री मीराँ बाई ने मनुष्यों से किस नाम का रस पीने का आह्वान किया है ?

उत्तर : मीरों बाई ने प्रभु कृष्ण के प्रेम रंग-रस पीने का अहवन किया है ।

(च) गुरुदेव ने कब मोहनदास करमचंद गाँधी को ‘महात्मा’ के रूप में संबोधित किया था ?

उत्तर : शांतिनिकेतन में जब गाँधी जी आए थे, तब गुरुदेव ने उन्हें ‘महात्मा’ के रूप में संबोधित किया था।

(छ) भोलाराम का घर किस शहर में था ? 

उत्तर : भोलाराम का घर जबलपुर शहर में था।

सप्रसंग व्याख्या करो :

2. “हम कठोरता से भागते हैं, भद्देपन से मुख मोड़ते हैं, इसलिए सच से भी भागते हैं।”

उत्तर : संदर्भ प्रस्तुत गद्यांश श्री रामवृक्ष बेनीपुरी द्वारा रचित ‘नींव की ईंट’ निबंध से अवतरित है।

प्रसंग : लेखक ने यहां गुमनामी के अंधकार में डूबे हुए उन शहीदों के प्रति समाज का ध्यान आकृष्ट कराया है, जो समाज के वास्तविक निर्माता है।

व्याख्या : लेखक सत्य को प्रत्यक्ष की चमकीली सुन्दरता से परे भद्दा एवं कड़वा बताया है, जिसे जानने का प्रयास बहुत कम लोग करते हैं, क्योंकि सत्य कठोर होता है, उस पर चमक-दमक का कोई परदा नहीं होता। कठोरता अपने जन्मकाल से ही भद्दी तथा कुरूप होती है। भद्दपन एवं कठोरता दोनों में गहरा सम्बन्ध है। इस कारण सत्य को कठोर एवं असुन्दर देखकर लोग उससे दूर भागते हैं। सुन्दर और विशाल भवनों की प्रशंसा की जाती है, जबकि भवन का कठोर सत्य उसकी वह नींव है, जिस पर भवत खड़ा होता है। किसी विशाल और सुंदर भवन की वास्यविकता उसके कंगूरे से ज्ञात नहीं होती है। वास्तविक सत्य का ज्ञान तो उसकी तींव में छिपी हुई उस इंट से ही होती है, जिस पर वह विशाल भवन टिका होता है।

अथवा

जीवन में एक सितारा था, 

माना वह बेहद प्यारा था, 

वह डूब गया तो डूब गया, 

अम्बर के आनन को देखो। 

उत्तर : संदर्भ प्रस्तुत पंक्तियाँ हरिवंश राय बच्चन द्वारा रचित ‘जो बीत गयी’ नामक पाठ से लिया गया है।

प्रसंग : कवि मनुष्य को अपने बीते हुए दुख को भुलाकर वर्तमान की चिंता करने को कहा है।

जाओगे। कलम के द्वारा ज्ञान का दीप जलाकर चारों ओर प्रकाश फैलाओगे या हाथ में तलवार पकड़ हिंसक पशुओं से आत्मरक्षा हेतु घर की रखवाली हेतु घर की रखवाली करोगे। अर्थात कलम मन में उठने वाले तरल भावों की प्रतीक है और तलवार शक्ति की। कुछ पाने के लिए शक्ति की आवश्यकता पड़ती है, न कि कलम की। किसी दुश्मन के आक्रमण से अपनी रक्षा करने के लिए तलवार उपयोगी है न कि कलम।

3. संक्षेप में उत्तर दो :

(क) आज देश के तौजवानों के समक्ष चुनौती क्या है ?

उत्तर : आज देश के नौजवानों की आवश्यकता है, जो सच्चे हृदय से, प्रचार से दूर रहकर और उत्साह के साथ देश को नया रूप प्रदान कर सके। किसी भवन का कंगूरा या कलश बनने की इच्छा से प्रेरित न होने वाले बलिदानी युवकों की इस देश को आवस्यकता है। चुपचाप बलिदान देने वाले षे युवक आज कहाँ है, जिन पर विकास की भव्य इमारत खड़ी हो सके ? देश की यह पुकार देश के हर युवक के लिए एक चुनौती है।”

(ख) ‘हाँ, शहादत और मौन-मूक! समाज की आधारशिला यही होती है’- का आशय बताओ।

उत्तर : मौन बलिदान से ही समाज का निर्माण होता है। जिच वास्तविक बलिदान पर समाज का विशाल भवन टिका हुआ है, वह बलिदान मूक ही होता है। जिन्होंने राष्ट्र और समाज कल्याण के लिए चुपचाप अपना बलिदान कर दिया है। बलिदान करते समय उन लोगों के मन में इच्छा भी नहीं थी कि उन्हें सम्मान मिलेगा। जिस प्रकार की नींव की ईंट के बिना कोई भवन खड़ा नहीं हो सकता। उसी प्रकार मौन वलिदान के बिना किसी समाज रुपी भवन का निर्माण नहीं हो सकता। और ये मौन बलिदान करने वाले ही समाज की आधारशिला है। अर्थात् उनके हृदय बलिदान की भावना से भरे हुए हैं, वे लोग मानव समाज के भवन का निर्माण करने के लिए स्वयं को समर्पित कर देते हैं। 

(ग) अपने माँ-बाप से संबंधित प्रश्नों के उत्तर में छोटे जादूगर ने क्या-क्या कहा था ?

उत्तर : लेखक के पूछने पर छोटा जादूगर अपने माँ-बाप के बारे में बताया- माँ और बाबुजी है माँ बहुत बीमार है और बाबुजी देश के लिय जेल में है। मैं भी जेल जाना चाहता था, पर माँ के कारण ज न पाया। मेरे जाने के बाद माँ को कौन देखेगा। मुझे भी इच्छा होती है, देश की सेवा करने की, पर माँ भी तो मातृभूमि जैसी ही प्यारी है। एक माँ की सेवा न कर पाया तो क्या हुआ अपनी माँ की सेवा तो कर पाऊँगा। मैं यह खेल तमाशा

दिखाकर जो कुछ पैसे ले जाऊँगा, तो माँ को पथ्य दूंगा। वह गर्व से बोला था। 

(घ ) नीलकंठ के मरने के बाद दूसरे जीवों के आचरण का एक शब्द चित्र प्रस्तुत करों।

उत्तर : नीलकंठ के मरने के बाद चिड़ियाघर के जीव-जंतु उदास रहने लगे। कुब्जा ने कोलाहल के साथ खोज-ढूंढ आरंभ की और राधा नीलकंठ के न रहने पर निश्चेष्ट सी कई दिन कोने में बैठी रही। वह प्रतीक्षा के भाव से द्वार पर दृष्टि लगाए रहती थी। आषाढ़ में जब आकाश मेघाच्छन्न हो जाता है तब वह कभी ऊंचे झले पर और कभी अशोक की डाली पर अपनी केका को तीव्रतर करके नीलकंठ को बुलाती रहती है।

(ङ) श्रीमती के आग्रह होने पर छोटे जादूगर ने किस प्रकार अपना खेल दिखाया ? 

उत्तर : श्रीमती के आग्रह पर छोटे जादूगर के सभी खिलौने उसके खेल में अपना अभिनय करने लगे। बिल्ली रूठती है। भालू उसे मनाता है। बंदर घुड़कने लगा। गुड़िया का व्याह हुआ। गुड्डा वर कानां निकला। यह सब वह खिलौने से अभियन करके दिखा रहा था। लड़के ने अपनी बातों से और खेल दिखाकर सबका मन जीत लिया था।

(च) ‘कलम और तलवार’ शीर्षक कविता के आधार पर कलम की ताकत को रेखांकित करो।

उत्तर : कलम राष्ट्र की शक्ति होती है। यह दिल ही नहीं दिमादों में भी क्रांति की आग भड़का देती है। कलम में जो शक्ति है, जो चिनगारी है वह कलम की उगली हुई अक्षर आग के समान समाज में नही चेतना पैदा कर सकता है। कलम में विचारों के शक्ति के द्वारा समाज में नयी चेतना पैदा कर सकता है। कलम में विचारों के जो जलते अंगारे है उससे समाज को स्वस्थ दिशा की ओर मोड़ सकते हैं। 

4. “आप साधु है, आपको दुनियादारी समझ में नहीं आती।” – यहां ‘दुनियादारी’ का प्रसंग क्यों उठाया गया है ?

उत्तर : ‘आप साधु हैं आपको दुनियादारी समझ में नहीं आती।’ यहां दुनियादारी का प्रसंग इसलिए उठाया गया है, कारण आज भ्रष्टाचार लगभग हर सरकारी विभाग में व्याप्त है तथा इससे समाज का हर वर्ग प्रभावित है। रिश्वत के बिना कोई काम नहीं होता। पांच वर्षों तक पेंशन के लिए कार्यालय का चक्कर लगाने वाला भोलाराम को मृत्यु के बाद पेंशन नहीं मिली कारण वह रिश्वत नहीं दिया था। इस लिए दफ्तर के बाबू ने कहा था आप साधु है, आपको दुनियादारी समझ में नहीं आती। दरख्वास्तें पेपरवेट से नहीं दबती। भोलाराम ने दरख्वास्तों तो भेजी थी पर उन पर वजन नहीं रखा था, इसलिए कहीं उड़ गई होगी।

अथवा

‘कलम और तलवार’ कविता का सारांश लिखो। 

उत्तर : ‘कलम और तलवार’ नामक प्रस्तुत कविता में राष्ट्रकवि दिनकर ने कलम और तलवार दोनों की स्वतंत्र सत्ता तथा महत्ता पर प्रकाश डाला है। दिनकर ने हमारे समक्ष एक विकट प्रश्न रखा हैं। हमारे सामने कलम और तलवार रख दी जाए, और पूछा आप कि इन दोनें में एक का चुनाव करना हो तो हम किसका चुनाव करेंगे ? गलम मन में उठने वाले भावों की प्रकीक हे और तलवार शक्ति की। किसी दुश्मन के आक्रमण से अपनी रक्षा करने के लिए तलवार उपयोगी है न कि कलम। यह बात सही है कि कलम राष्ट्र की शक्ति होती है। यह हृदय में अनेक भावों को जागृत करने वाली है तथा यह दिल ही नहीं दिमागों में भी क्रांति की आग भड़काने वाली है। कलम विचारों के जलते अंगारे पैदा करती है और जिस राष्ट्र में विचारों हो उस राष्ट्र को कोई परास्त नहीं कर सकता। कलम के द्वारा मनुष्य ज्ञान का दीप जला सकता है तथा विचारों की शक्ति के द्वारा समाज में नई चेतना पैदा कर सकता है। वहीं दूसरी ओर युद्ध में विजयी होने के लिए तथा हिंसक पशुओं से आत्मरक्षा हेतु तलवार की आवस्यकता पड़ती है।

5. (क) किन्ही दो मुहावरां से वाक्य बनाओ : 

अंधे की लकड़ी, आग में घी डालना, हाथ धोना, तु तु मैं मैं करना

उत्तर : अंधे की लकड़ी (एकमात्र सहारा) : यह छोटी सी दूकान ही मेरे लिए अंधे की लकड़ी है।

आग में घी डालना (झगड़ा बढ़ाना): दोपक बात यही समाप्त करो और क्यों आग मे धी डाल रहे हो। 

हाथ धोना : सोच समझाकर काम करो, नही तो किसी दिन नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा।

तु-तु मैं-मैं कतना : तुम दोनो दोस्त होकर भी तु-तु मैं-मै करते हो । 

(ख) किन्हीं चार के स्त्रीलिंग रूप लिखो :

(हाथी, ठाकुर, धोबी, दूल्हा, सभापति, शिक्षक, कवि)

उत्तर : हाथी-हथिनी                ठाकुर-ठकुराइन

           धोबी-धोबिन                दूल्हा-दुल्हन

           सभापति-सभानेत्री        कवि-कवयित्री

            शिक्षक-शिक्षिका

(ग) किन्ही दो के संधि करो : 

(हिम+आलय, मन+रथ, परम+ईशवर, जगत+नाथ) 

उत्तर : हिम+आलय = हिमालय             मन+रथ = मनोरथ

           परम+ईशवर = परमेशवर           जगत+नाथ = जगन्नाथ

(घ) किन्हीं चार के विलोम (विपरीतार्थक) :

(अवनति, प्राचीन, पाताल, आस्तिक, मानव, अंत, लेन)

उत्तर : अवनति – उन्नति           प्राचीन – अर्वाचीन

           पाताल – स्वर्ग                आस्तिक – नास्तिक

           मानव – दानव                अंत – आदि

           लेन – देन

(ङ) वचन परिवर्तन करो :

(नदी, बाला, बकरी, लता) 

उत्तर : नदी – नदियाँ            बाला – बालाएँ

          बकरी – बकरियाँ        लता – लताएँ

(च) अनेक शब्दो के लिए एक शब्द लिखो :

जो पूर्व समय मे हुआ हो, सूर्योदय के पूर्व का समय,जी अभिनय करता है, जो शिव को उपासना करता है।

उत्तर : जो पूर्व समय मे हुआ हो- भूतपूर्व

           सूर्योदय के पूर्व का समय- उषा 

           जो अभिनय करता है- अभिनेता 

          जो शिव को उपासना करता है- शैव

(छ) किन्ही दो के पर्यायवाची शब्द लिखो : 

अश्व, आकाश, गृह, घर, जल

उत्तर : अश्व – घोड़ा, हय, तुरंग, घोटक   

           आकाश – अम्बर, गगन, अम्बु

           गृह – आलय, आगार, धाम, भवन 

           घर – गृह, निकेतन, आलय

           जल – नीर, पय, उदक, तोप, अमृत

(ज) किन्ही दो वाक्यो को शब्द्ध करो : 

(क) तुमने किताब पढ़ रहे हो।

उत्तर : तुमने किताब पढ़ रहे हो- तुम किताब पढ़ रहे हो।

(ख) आज प्रधानमंत्री का दर्शन हुआ।

उत्तर : आज प्रधानमंत्री का दर्शन हुआ- आज प्रधानमंत्री के दर्शन हुए।

(ग) उसने माना, पर तुमने नहीं माना। 

उत्तर : उसने माना, पर तुमने नहीं माना- उसने माना, पर तुमने नही।

(घ) महेन्द्र को चित्रकला सिखाता है। 

उत्तर : महेन्द्र को चित्रकला सिखाता है- महेन्द्र चित्रकला सीखता है।

Group -B

6. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो :

( क ) कवि नरेंद्र शर्मा का जन्म कहाँ हुआ था ? 

उत्तर : कवि नरेंद्र शर्मा का जन्म सन् 1913 में उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर जिलांतर्गत जहाँगीरनामक स्थान में हुआ था।

(ख) कवि नरेंद्र शर्मा आकाशवाणी के किस कार्यक्रम के संचालक नियुक्त हुए थे ?

उत्तर : कवि नरेंन्द्र शर्मा आकाशवाणी में विविध कार्यक्रम के संचालक नियुक्त हुए थे।

(ग) मानवता ने मनुष्य को किस प्रकार सींचा है ? 

उत्तर : युगों से संचित मानवता व्यक्ति को खून-पसीने से सींचती है।

(घ) सही विकल्प का चयन करो :

कवि हरिवंश राय बच्चन का जन्म हुआ था-

(अ) सन् 1905 में

(आ) सन् 1906 में 

(इ) सन् 1907 में

(ई) सन् 1908 में

उत्तर : (इ) सन् 1907 में 

(ङ) कवि ने इस कविता में बीती बात को भुलाकर क्या करने का संदेश दिया है-

(अ) वर्तमान की चिंतां

(आ) भविष्य की चिंता

(इ) अतीत की चिंतां

(ई) सुख की चिंता

उत्तर : (अ) वर्तमान की चिंता।

(च) विश्व डाक संघ ने पत्र लेखन की प्रत्रियोगिता शुरू की-

(अ) सन् 1970 से

(आ) सन् 1971 से

(इ) सन् 1972 से

(ई) सन् 1973 से

उत्तर : (इ) सन् 1972 से

7. संक्षेप में उत्तर दो :

(क) मयुर को कलाप्रिय वीर पक्षी क्यों कहा गया है ? स्पष्ट करो।

उत्तर : मयुर कलाप्रिय वीर पक्षी है, वह सुन्दर और कोमल स्वभाव का होता हैं, पर विपत्ति में दूसरों की रक्षा भी कर सकता है। जरूरत पढ़ने पर अपनी नुकीली पैनी चोंच से भयंकर विषधर सांप को खंड-खंड भी कर सकता है। इसीलिए तो कार्तिकेय ने मयूर को अपना वाहन चुना था। वह युद्ध में झपट पड़ता था और अपनी पैंती चौच से शत्रुओं पर संहार करता।

(ख) नीलकंठ और राधा के नृत्य का वर्णन अपने शब्दों में करो। 

उत्तर : नीलकंठ में उसकी जातिगत विशेषताएँ थी। मेघों की साँवली छाया में अपने इंद्रधनुष के गुच्छे जैसे पंशों को मंडलाकार बनाकर जब वह नाचता था, तब उस नृत्य में एक सहजात लय-ताल रहता था। आगे-पीछे, दाहिने-बाएँ क्रम मेम घूमकर वह किसी अलक्ष्य सम पर ठहर-ठहर जाता था।

राधा नीलकंठ के समान नहीं नाच सकती थी, परंतु उसकी गति में भी एक छंद रहता था। वह नीलकंठ की दाहिनी ओर के पंख को छूती हुई बाई ओर निकल आती थी ओर बाएँ पंख को स्पर्श कर दाहिनी ओर। इस प्रकार उसकी परिक्रमा में भी एक ताल-परिचय मिलता था।

(ग) मदिरालय कभी भी क्यों नहीं पछताता है, स्पष्ट करो। 

उत्तर : मदिरालय का आंगन जहां मधु के घट है, मधुप्याले हैं। यहां कितने प्याले हिल जाने हैं, अर्थात थोड़ी सी चोट लगते ही गिर कर मिट्टी में मिल जाते हैं। ये कोमल मिट्टी के बने होते हैं। क्योंकि उसका जीवन ही छोटा होता है। पर एक बार जो गिरते हैं वे कब उठ पाते हैं। इन टूटे प्यालों पर मदिरालय कब पछताता है। एक प्याला टुटता है तो दूसरा आ जाता है। यही प्रकृति का नियम है। एक बार जो जीवन से छूट जाता है वह कभी वापस नहीं आता।

(घ) पत्र ऐसा क्या काम कर सकता है, जो संचार का आधुनिक साधन भी नहीं कर सकता ?

उत्तर : संचार के तमाम उन्नत साधनों के बाद भी पत्र की हैसियत बरकरार है। इसी उपयोगिता हमेशा से बनी है। पत्र जो काम कर सकते है, वह संचार का •आधुनिकतम साधन नहीं कर सकता है। पत्र जैसा संतोष फोन या एसएमएस का संदेश भी नहीं दे सकता, जो अनुभूति और भाव पत्रों से जुड़े से जुड़े होते हैं, वे आधुनिक संचार माध्यमों में नहीं होता। पत्र में कुछ ऐसे गुण होते में कुछ ऐसे गुण होते हैं, जो नए, संचार माध्यमों में परिलक्षित नहीं होते। पत्र के द्वारा की चिट्ठियों को सहेज और संजोकर विरासत के रूप में रखे जा सकते हैं। 

8. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दो :

(क) नीलकंठ के स्वभाव की विशेषताएँ अपने शब्दों में वर्णन करो। 

उत्तर : नीलकंठ देखने में जितना सुंदर था, उसका स्वभाव भी उतना ही कोमल। चिड़ियाघर के निवासी जीव-जंतुओं का रखवाली करता। सवेरे ही वह सब खरगोश, कबूत्तर आदि की सेना एकत्र कर उस ओर ले जाता, जहाँ दाना दिया जाता है। कोई गड़बड़ करने पर तीखे चोंच से दंड भी देता दंडविधान के समान ही उन जीव-जन्तुओं के प्रति उसका प्रेम थी असाधारण था। खरगोश के बच्चे को साँप के मुख से बचा कर रातभर उसे अपने पंखों के नीचे रखे उष्णता देता रहा। नीलकंठ जानता था लेखिका को उसका नृत्य अच्छा लगता है। उन्हें देखते ही वह सतरंगी मंडलाकार छाता तानकर नृत्य की भंगिमा में खड़ा हो जाता।

अथवा 

‘जो बीत गयी’ कविता का भावार्थ लिखो।

उत्तर : ‘जो बीत गयी’ कविता हरिवंश राय बच्चन द्वारा रचित बड़ी ही रोचक और शिक्षाप्रद है। जिस प्रकार अपने टूटे तारों पर अंबर शोक नहीं मनाता अथवा अपने “प्रिय फूलों के सूखने अथवा मुरझा जने पर मधुवन कभी शोर नहीं मचाता। उसी प्रकार मनुष्य को अपने बीते हुए दुख को भुलाकर वर्तमान की चिंता करनी चाहिए। अपने दुखों को यादकर शोक मनाने से अच्छा है जीवन के बाकी बचे समय को सुखपूर्वक विताया जाए। कवि यहां मानव जीवन के साथ टूटे हुए नारों के साथ तुलना की है। जीवन में भी ऐसा ही प्रिय तारा होता है जो उसे बहुत प्यारा था पर जब वह तारा डूब जाता है अर्थात खो जाता है उसके लिए शोक मनाने से क्या वह वापस आ सकता है। जो टूट कर बिखर जाते है वह कभी वापस नहीं आते। जिस प्रकार मदिरालय अपने टूटे प्यालो पर शोक नहीं करता क्योंकि उसका जीवन ही छोटा होता है। उसी प्रकार मनुष्य का जीवन भी पलभर का है। अतः अपने दुखों को यादकर शोक मनाने से अच्छा है कि जीवन के बाकी बचे समय को सुखपूर्वक बिताना चाहिए। जीवन का भरपूर आनंद उठाना चाहिए।

(ख) ‘कायर मत बन’ कविता का सारांश लिखो।

उत्तर : संकलित ‘कायर मत बन’ शीर्षक कविता शर्मा की उत्कृष्ट रचनाओं में से अन्यतम है। इस प्रसिद्ध कविता में कवि ने नमुष्य मात्र से यह आग्रह किया है कि वह और कुछ भी बने पर कायर कभी मत बने। मनुष्य को चाहिए कि उसके मार्ग पर आने वाली बाधाओं से वह साहस और दृढ़ता के साथ लड़े कभी भी उनसे समझोता न करे। निराशा होकर माथा न पटके, रोए गिड़गिड़ाए नहीं, कभी दुःख के आँसू न पीए। लड़ाई करो कहकर अगर कोई दुष्ट और नीचे व्यक्ति सामने आ जाए, तो मनुष्य को चाहिए कि या तो प्यार के बल पर उसे जीत ले, नहीं तो उसकी हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा से दें। किसी भी स्थिति में अहिंसा की दुहाई देते हुए पीठ फेर कर वह न भागे। कवि ने माना है कि हिंसा के बदले में की जाने वाली हिंसा मनुष्य की कमजोरी को दर्शाती है। परंतु कायरता उससे अधिक अपवित्र है। कवि ने कहा कि हे कि मानवता अमूल्य है, उसकी रक्षा के सामने व्याक्ति की सुरक्षा का कोई मुल्य नहीं है। सत्य यह है कि व्यक्ति के आत्म बलिदान से मानवता अमर बनती है। युगों से संचित मानवता व्यक्ति को खून-पसीने से सींचती है। अतः मनुष्य के लिए उचित यही है कि वह कभी कायर न बने और अपना अथवा कुछ मानवता पर न्योछावर कर दे।

अथवा

मदिरालय कभी भी क्यों नहीं पछताता है, स्पष्ट करो। 

उत्तर : मदिरालय का आंगन जहां मधु के घट है, मधुप्याले है। यहां कितने प्याले हिल जाते हैं, अर्थात थोड़ी सी चोट लगते ही गिर कर मिट्टी में मिल जाते हैं। ये कोमल मिट्टी के बने होते हैं। क्योंकि उसका जीवन ही छोटा होता है। पर एक बार जो गिरते हैं वे कब उठ पाते हैं। इन टूटे प्यालों पर मदिरालय कब पछताता है। एक प्याला टूटता है तो दूसरा आ जाता है। यही प्रकृति का नियम है। एक बार जो जीवन से छूट जाता है वह कभी वापस नहीं आता।

9. किसी एक विषय पर निबंध लिखो : 

(i) लोकप्रिय गोपीनाथ बरदलै

अथवा

अपना प्रिय नेता

उत्तर : हमारे देश के प्रसिद्ध नेताओं में लोकप्रिय गोपीनाथ बरदलै जी का नाम सम्मानपूर्वक लिया जाता है। दुनिया में समाज सेवक तो बहुत हैं, पर सच्चे समाज सेवक बिरले होते हैं। सच्चे समाज सेवक बड़े ही लगन से कर्त्तव्य निभाते हैं, अपनी जाति और समाज तथा अपने देश की उन्नति के लिए अपने को खपाते हैं। ऐसे ही बहु-गुण सम्पन्न महान पुरूष थे गोपीनाथ बरदलैजी। उनके नाम आगे च्लोकप्रिय उपाधि उनके सफल नेतृत्व, स्वदेशप्रेम तथा लोकप्रियता का प्रमाण है।

लोकप्रिय गोपीनाथ बरदलै जी का जन्म नगाँव जिले के रोहा नामक गाँव में हुआ था। उनके पिताजी बुद्धेश्वर बरदलै एक अच्छे वैद्य थे। माँ-बाप के जीवित रहते समय उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की थी। बचपन से ही गोपीनाथ बरदले शांत स्वभाव के थे। उनके जीवन पर पिता बुद्धेश्वर बरदलै समाज-प्रिय तथा समाज सेवक थे। समाज के मुखिया लोग उनसे मिलकर समाज तथा देश की उन्नति के बारे में आलोचना करते थे। उसी से गोपीनाथ बरदलै में देश-प्रेम की भावना पैदा हुई। स्कूल में पढ़ने के समय से ही वे देश की उन्नति के बारे में सोचने लगे थे। उनकी धारणा थी कि जनसाधारण को संगठन के द्वारा ही समाज तथा देश की उन्नति की जा सकती है।

उस समय हमारा देश अंग्रेज सरकार के अधीन था। हमारे देश के लोग अंग्रेज सरकार के खिलाफ लड़ रहे थे। महामानव महात्मा गाँधी के नेतृत्व में देश को स्वतंत्रता की पुकार हुई। असहयोग आन्दोलन आरंभ हुआ। गोपीनाथ बरदलै भी गांधीजी के नेतृत्व में देश की स्वतंत्रता की पुकार में अनुगामी बनकर असहयोग आन्दोलन में कूद पड़े। वे असम की जनता में गांधीजी की वाणियों का प्रसार-प्रचार करने लगे, जिससे असहयोग आन्दोलन को और अधिक बल मिला। इस संदर्भ में उन्हें बार जेल जाना पड़ा। अनेक कष्टों को सरते हुए भी उन्होंने देश की सेवा की। इस तरह उन्होंने जनता को सच्चा पथ दिखाया।

अंग्रेजों के जमाने में ही बरदलै जो असम के प्रधानमंत्री बने। उन्होंने प्रधानमंत्री बन कर शिक्षा-दीक्षा, उद्योग व्यावसाय आदि की उन्नति के लिए काम करना शुरू किया। उनके नेतृत्व में हमारा राज्य के पथ पर अग्रसर हुआ। 

सन् १९४७ में हमारे देश को अंग्रेजो ने स्वतंत्र कर दिया। महात्मा गाँधी चाहते थे कि सभी सम्प्रदाय के लोग मिलजुल कर रहें। पर गांधीजी की बातों पर ध्यान न देकर अखंडित भारतवर्ष को भारत और पाकिस्तान इन दो भागों में बाँट दिया गया। कुछ लोग असम को भी पाकिस्तान में मिलाना चाहते थे। परन्तु गोपीनाथ बरदलै के सबल नेतृत्व मे वह हो नहीं पाया, अतः असम भारतवर्ष का अंग बना रहा।

स्वतंत्रता मिलने के पश्चात् गोपीनाथ बरदलै जी पुनः असम के मुख्यमंत्री बने। उन्होंने असम के हर प्रांत के जाति-जनजाति व अन्य पिछड़े हुए लोगों की उन्नति के लिए यथासंभव सहयोग प्रदान किया।

बरदलैजी को जाति भेद से तफरत था। उनके अनुसार हिन्दू-मुसलमान-सिक्ख ईसाई आदि विभिन्न सम्प्रदाय के लोगों में किसी तरह का भेद नहीं है, सभी बराबर हैं। उनके लिए एक ही पहचान है-असमीया।

असम को शिक्षा में आगे बढ़ाने के लिए गोपीनाथ बरदलै जी ने भरसक प्रयत्न किया। उन्हीं के प्रचार से कामरूप एकाडेमी स्कूल तथा गुवाहाटी विश्वविद्यालय को स्थापना हुई।

गांधीजी के निर्देशानुसार असम में राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार का उत्तरदायित्व भी लोकप्रिय गोपीनाथ बरदलै जी ने ले लिया। इसलिए बरदलैजी ने असम में भाषा हिन्दी के प्रचार के लिए असम राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना की।

सरल जीवन व्यतीत करते थे। उनके रहन-सहन में बड़ी सादगी थी। दूसरों की सेवा करना ही उनके जीवन का लक्ष्य था। देश की सेवा में ऐसे मग्न रहते थे कि वे अपने परिवार को भी भूल गये थे। उनके के प्रयत्न से ही असम की प्रगति हुई। इसीलिए बरदलै जी को असम का निर्माता तथा कलाकार कहा जाता है।

(ii) ” राष्ट्रभाषा का महत्त्व “

उत्तर : जब-जब मैं पक्षियों को कूंजते हुए, सिंहो को दहाड़ते हुए, हाथियों को चिंघाड़ते हुए, कुत्तों को भौकते हुए और घोड़ों को हिनहिनाते हुए सुनता हूँ तो अचानक मुझे ख्याल आता है कि ये सब अपनी भाषा में कुछ कहना चाहते हैं, बात चीत करना चाहते हैं। अपने प्रेम, क्रोध, घृणा अथवा ईर्ष्या के भावों को अभिव्यक्त करना चाहते हैं, किन्तु में इनकी भावनाओं को पूरी तरह नहीं समझ पाता, तब मैं यह भी सोचने लगता हूँ कि मानव कितना महान है कि उसे अपनी बात कहने के लिए भाषा का वरदान मिला है। किसी भी देश में सबसे अधिक बोली एवं समझी जानेवाली भाषा ही वहाँ की राष्ट्रभाषा होती है। प्रत्येक राष्ट्र अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रखता है, उसमें अनेक जातियों, धर्मो एवं भाषाओं के बोलने वाले लोग रहते हैं, अतः राष्ट्रीय एकता को दृढ़ बनाने के लिए एख ऐसी भाषा की आवश्यकता होती है, जिसका प्रयोग प्रत्येक नागरिक कर सके। राष्ट्र के महत्त्वपूर्ण तथा सरकारी कार्य उसी के माध्यम से किए जा सकें। दूसरे शब्दों में राष्ट्रभाषा से तात्पर्य है जनता की भाषा, मनुष्य के मानसिक और बौद्धिक विकास के लिए एक राष्ट्रभाषा आवस्यक है। अतः राष्ट्रीय एकता को बनाए रखने के लिए राष्ट्रभाषा की ही आश्यकता होती है। स्वतन्त्र भारत के संविधान में हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में अंगीकार की गयी हिन्दी, भारत के विस्तृत क्षेत्र में बोली जानेवाली भाषा है, जिसे देश के लगभग ३५ करोड़ व्याक्ति बोलते है। हिन्दी पूरे भारत को एखता-सूत्र में बांधने वाली भाषा है, यही भाषा राष्ट्री की आशा आकांक्षाओं की भाषा है, यह राष्ट्रीयता और भारत की सांस्कृतिक परम्पराओ को सुरक्षित रखने वाली भाषा है, यही भाषा हमारी सफलता प्रगति और विजय की भाषा है। भिन्नता रहते हुए समस्त भारत की जड़ अखण्ड है। भाषा और संस्कृति के क्षेत्र में इस सत्य की प्रतीक हिन्दी है।

(iii) मध्याह्न भोजन योजना

अथवा

दोपहर भोजन योजना

उत्तर : राष्ट्रीय प्राथमिक शिक्षा पोषणिक समर्थन योजना 15 अगस्त 1994 को प्रारम्भ की गई थी। मध्याह्न भोजन योजना हमारे देश में महत्वपूर्ण योजना है जिसके तहत स्कूली बच्चों को सभी कार्य दिवसों पर मुफ्त भोजन प्रदान की जाती है। इस योजना के सफल कार्यान्वयन से जहां एक ओर बच्चों में कूपोषण की समस्या कम हुई है, वहीं दूसरी ओर यह विभिन्न सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि में सामाजिक संतुलन स्थापित करने में मदद कर रही है तथा रोजगार के प्रावधान के माध्यम से महिलाओं और वंचित सामाजिक के सशक्तिकरण में भी सार्थक साबित हो रही हैं। केन्द्र द्वारा प्रायोजित इस योजना की पहले देश के 2408 ब्लाकों में शुरू किया गया। वर्ष 1997 98 के अंत तक एन.पी.एन.एस.पी.ई. को देश के सभी ब्लाकों में लागू कर दिया गया। 2002 में इसे बढ़ाकर स्थानीय स्कूलों के कक्षा एक से पाँच तक के बच्चों में पढ़ रहे बच्चों को भी इसके अंतर्गत शामिल कर लिया गया। इस योजना के अंतर्गत शामिल है। प्रत्येक स्कुल दिवस प्रति ब्लाक 100 ग्राम खाद्यान्न तथा खाद्यान्न सामग्री को लाने-ले जाने के लिए प्रति क्वंटल 50 रुपए की अनुदान सहायता। सितंबर 2004 में इस योजना में संशोधन कर सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों और ई.जी.एम./ए.आई.ई. केन्द्रों में पढ़ाई कर रहे कक्षा एक से पाँच तक के सभी को 300 कैलोरी और 8-10 ग्राम प्रोटीन वाला पका हुआ मध्याह्न भोजन प्रदान करने की व्यवस्था की गई। सुखी प्रभावित क्षेत्रों में गर्मियों की छुट्टी के दौरान मध्याहन भोजन उपलब्ध कराने का प्रावधान किया। सरकारी, स्थानीय निकाय तथा सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों और ईजीएस तथा एआईइ केन्द्रों में कक्षा एक से पाँचवी तक पढ़नेवाले बच्चों की पोषण स्थिति में सुधार।

(iv) मेरे जीवन का लक्ष्य 

उत्तर : लक्ष्यहीन जीवन और पतवार विहीन नाव कभी सार्थकता का किनारा स्पर्श नहीं कर सकता। मानव महत्वाकांक्षी प्राणी है, उसका लक्ष्य अपने जीवन को सार्थक बनाना है। जिसके हृदय में दृढ़ संकल्प, अदम्य साहस और काम करने की लगन होती है वह अपने जीवन के लक्ष्य को पूरा कर लेता है। मानव जीवन सोना उगाने के लिए एवं उसके लिए ठीक बीज रोपण और कठोर परिश्रम व साधना की आवश्यकता होती है और जीवन के । पर चलने के लिए आवश्यक है निर्दिष्ट सुपरिकाल्पित पथ संकेत। इसलिए जीवन के प्रारम्भ में ही लक्ष्य दृढ़ स्थिर होना चाहिए।

मुझे अपने भावी जीवन के लिए ऐसा लक्ष्य चुनना होगा, जिससे न सिर्फ अपने जीवन को सुख-शान्ति मिले बल्कि समाज तथा राष्ट्र का भी हित हो सके। मेरी चिर अभिलाषा आदर्श अध्यापक बनने की रही है। शिक्षण काल से ही मेरी पढ़ने-पढ़ाने की रुचि रही है। तभी से मैंने अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर लिया कि मुझे आदर्श अध्यापक बनना है, शिक्षक जीवन के प्रति मेरा आकर्षण का कारण है, एक शिक्षक, जो किसी भी श्रेणी का क्यों न हो, वह अपने कर्त्तव्य एवं दायित्व पालन में प्रतिज्ञाबद्ध है। बच्चे व युवक-युवतियों के सामने विश्य के ज्ञान भंडाल का द्वार खोलने का गौरवपूर्ण कृतित्व वे ही प्राप्त कर सकते हैं। शिक्षा का मार्गदर्शक ये शिक्षक ही जाति का मेरुदण्ड निर्माण करते हैं। शिक्षक अपने प्रत्येक छात्र में आदर्श का बीज रोपण करते हैं। वही कालक्रम में फूलों जैसे विकासित होकर पूरी जाति व देश के कल्याण में लगा देते हैं।

आदर्श अध्यापक बनने के पूर्व मुझे आदर्श विद्यार्थी बनना होगा। इसके लिए मुझे कठिन साधना करनी पड़ेगी, तभी इच्छित सिद्धि प्राप्त हो पाएगी। मुझे तपस्वी के समान तपस्या, सैनिक के समान अनुशासन और धरा के समान सहनशीलता अपनानी होगी। वह गुरुता और महिमा की प्रतिभा विद्या का प्रकाश स्तम्भ है। उसका पुनीत कर्तव्य है, शिष्यों के अज्ञानांधकार को दूर करना है। मेरा विचार है कि विद्या ही सर्वोतम धन है, इसका दान ही सबसे बड़ा दान है। मेरे जीवन की सार्थकता तभी होगी, जब मैं नश्वर देह को आजीवन विद्या दान करते पाऊँगा, कोशिश करूँगा हजारों-लाखों अन्धकारमय जीवन में शिक्षा की ज्योति यूर्यलोक ढोकर लाने में यदि एक प्राण को भी आलोकमय कर सका तो अपने को सार्थक मानूँगा।

10. अपने प्राथमिक विद्यालय की स्वर्ण जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित वाद विवाद प्रतियोगिता में तुम्हें भाग लेना है। इसके लिए एक दिन की छुट्टी की प्रार्थना करते हुए अपने विद्यालय के प्रधान शिक्षक/शिक्षिका के नाम पर एख पत्र लिखो।

सेवा में,

प्रधानाचार्य महोदय,

केंद्रीय विद्यालय

मालीगांव

माननीय महोदय, 

सादर अभिवादन ।

सविनय निवेदन है कि मुझे विद्यालय की स्वर्ण जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित वाद-विवाद प्रतियोगिता में भाग लेना है। इसके लिए मुझे एक दिन की छुट्टी चाहिए। 

अत : आपसे विनम्र निवेदन है कि मुझे एक दिन की छुट्टी देने की कृपा करे।

आपका आज्ञाकारी शिष्य

आनंद कुमार

कक्षा-X (अ)

अथवा

विद्यार्थियों के लिए दूरदर्शन की आवश्यकता को दर्शाते हुए (अपने) पिताजी के नाम पर एख पत्र लिखो।

आदरणीय पिताजी,

सादर प्रणाम,                                        

सेंट जेवियर स्कूल 

अरुणाचल

 दिनांक : १०.०४.२०२४

मेरी पढ़ाई ठीक चल रही है। आपकी तबीयत कैसी है। पिताजी आजकल दूरदर्शन में शिक्षा के विषय में बहुत कुछ दिखाया जाता है। पढ़ाई के साथ-साथ विद्यार्थियों को दूरदर्शन के प्रोग्राम भी देखना चाहिए क्योंकि दूरदर्शन से बहुत कुछ हम सीख सकते हैं। आपका क्या विचार है, मुझे बताईएगा। मां को मेरा प्रणाम दीजिएगा।

आपका आज्ञाकारी पुत्र

विनोद

11. निम्नलिखित गद्यांश को पढ़कर दिये गये प्रश्नों के उत्तर दो :  

उत्तर : मातृभाषा के अतिरिक्त राष्ट्रभाषा अथवा अंटर्राष्ट्रीय भाषा भी शिक्षा का माध्यम होती है, इनमें से राष्ट्रभाषा उस भाषा को कहते हैं, जो किसी राष्ट्र की विभिन्न भाषाओं में प्रधान होती है। वह अपने क्षेत्र अथवा प्रान्तों की भाषा तो होती है, इनमें से राष्ट्रभाषा उस भाषा को कहते हैं, जो किसी राष्ट्र की विभिन्न भाषाओं में प्रधान होती है। वह अपने क्षेत्र अथवा प्रान्तों की भाषा तो होती है, परन्तु राजकीय कार्यों में तथा सार्वजनिक क्षेत्र में समस्त देश में प्रयुक्त होने के कारण सारे देश में सांझी भाषा बन जाती है। आज हिन्दी को भारतवर्ष में वहीं गोरव प्राप्त है। इसी प्रकार जिस भाषा का विभिन्न राष्ट्रों के आपसी व्यापार तथा राजकीय कार्यों में प्रयोग होता है, उसे अन्तर्राष्ट्रीय भाषा कहते है। आजकल अंग्रेजी अन्तर्राष्ट्रीय भाषा है। अंग्रेजी शासनकाल में भारत में शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी को बना दिया गया था, जो बहुत अंशों में अब भी विद्यमान है। 

प्रश्नावली :

(क) राष्ट्रभाषा किसे कहते है ?

उत्तर : राष्ट्रभाषा उस भाषा को कहते हैं, जो किसी राष्ट्र की विभिन्न भाषाओं में प्रधान होती है।

(ख) भारत की राष्ट्रभाषा कौन सी है ? 

उत्तर : भारक की राष्ट्रभाषा हिन्दी है।

(ग) अन्तराष्ट्रीय भाषा और राष्ट्रभाषा में क्या अंतर है ?

उत्तर : अन्तर्राष्ट्रीय भाषा विभिन्न राष्ट्रों के आपसी व्यापार तथा राजकीय कार्यों में प्रयोग होता है, और राष्ट्रभाषा अपने क्षेत्र में अथवा प्रान्तों की भाषा तो होती ही है, तथा राजकीय कार्यों में तथा सार्वजनिक क्षेत्र में समस्त देश में प्रयुक्त होते के कारण सारे देश में साँझी भाषा बन जाती है।

(घ) अन्तर्राष्ट्रीय भाषा का नाम लिखो।

उत्तर : अन्तराष्ट्रीय भाषा अंग्रेजी है। 

12. हिन्दी में अनुवाद करो :

(i) She knows how to speak English. 

वह जानती है अंग्रेजी कैसे बोली जाती है। वह अंग्रेजी बोलना जानती है।

(ii) How are you? Ram asked to Rana. 

तुम कैसे ही ? राम ने राणा से पूछा।

(iii) Bihu is our national festival. 

बिहु हमारा जातीय उत्सव है।

(iv) Do as you like it. 

तुम्हे जो पसन्द हो करो।

(v) Kutchu is a good farmer. 

कुस्चु एक अच्छा किसान है।

(vi) He will have reached home before the sun sets.

वह सूर्य अस्त होने से पहले घर पहुँचेगा। 

(vii) They are serving tea to the guests.

वे अतिथियों को चाय परिवेशन कर रहे हैं। 

(viii) I am a student of class X. 

मैं कक्षा दशवीं का छात्र हूँ।

Leave a Reply

error: Content is protected !!
Scroll to Top