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NCERT Class 12 Fine Art Chapter 7 आधुनिक भारतीय कला
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आधुनिक भारतीय कला
Chapter: 7
भारतीय कला का परिचय: भाग – 2
अभ्यास
1. पटचित्र ‘ऑडियो-विजुअल’ स्टोरी का एक रूप है, जो भारत के कुछ हिस्सों में अभी भी प्रचलित है। कहानी कहने के इस पारंपरिक रूप की तुलना 1980 के दशक के बाद से कुछ बड़ौदा कलाकारों द्वारा अपनाई गई आधुनिक कथाकारिता से करें।
उत्तर: पटचित्र एक पारंपरिक चित्रकला है, जो कहानी कहने की कला से जुड़ी होती है। इसमें चित्रों की एक श्रंखला होती है जो किसी पौराणिक, धार्मिक या सामाजिक कथा को दर्शाती है। इन चित्रों को दिखाते हुए गायक कहानी को गाकर या पढ़कर सुनाते है, जिससे यह एक जीवंत ‘ऑडियो-विजुअल’ अनुभव होती है। यह परंपरा मुख्य रूप से बंगाल, ओडिशा और आंध्र प्रदेश में प्रचलित होती है। 1980 के दशक के बाद बड़ौदा के कुछ कलाकारों ने इस पारंपरा से प्रेरणा लेते हुए समकालीन संदर्भों में नई कथात्मक शैलियाँ अपनाईं थी। जैसे गुलाम मोहम्मद शेख, भूपेन खख्खर जैसे कलाकारों ने चित्रकला को एक कथा कहने वाले माध्यम में परिवर्तित किया, जिसमें आधुनिक सामाजिक, राजनीतिक और व्यक्तिगत विषयों को चित्रों में समाहित किया गया। इन कलाकारों की रचनाएँ पारंपरिक दृष्टिकोण को आधुनिक अभिव्यक्ति के साथ जोड़ती हैं, जिससे कला केवल देखने की चीज़ नहीं रह जाती, बल्कि सोचने और अनुभव करने का एक माध्यम बन जाती है।
2. वीडियो और डिजिटल मीडिया जैसी नई तकनीक समकालीन कलाकारों को नए विषयों के साथ प्रयोग करने के लिए कैसे प्रोत्साहित करती है? वीडियो कला, संस्थापन कला और डिजिटल कला जैसे विभिन्न कला रूपों पर टिप्पणी करें।
उत्तर: नई तकनीकें जैसे वीडियो और डिजिटल मीडिया ने समकालीन कलाकारों के लिए अभिव्यक्ति के नए द्वार खोल दिए हैं। कलाकार अब केवल पारंपरिक कैनवास या मूर्तिकला तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे गति, समय, ध्वनि और अंतरक्रियाशीलता को अपनी रचना में शामिल करते हैं। वीडियो कला कलाकार को घटनाओं, विचारों या भावनाओं को क्रमिक दृश्य माध्यम से प्रस्तुत करने की आज़ादी देती है। संस्थापन कला एक समग्र अनुभव होता है जिसमें दर्शक किसी स्थान में जाकर खुद को उस कला का हिस्सा महसूस करता है। डिजिटल कला ने कलाकार को सॉफ्टवेयर, प्रोजेक्शन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और इंटरनेट जैसी तकनीकों से जोड़ दिया है, जिससे वह वैश्विक स्तर पर प्रयोग और संवाद कर सकता है। इन सभी रूपों में कलाकार अपने विचारों को न केवल दिखा सकता है, बल्कि दर्शक को उसमें भागीदार भी बना सकता है। यह समकालीन कला को अधिक प्रासंगिक, जीवंत और सामाजिक संवाद के योग्य बनाता है।
3. आप ‘सार्वजनिक कला’ से क्या समझते हैं? अपने निवास या स्कूल और उनके आसपास रहने वाले विभिन्न समुदायों के बारे में जानकारी प्राप्त करें और उनकी कला की समझ को जानिए। यदि आपको एक सार्वजनिक स्मारक तैयार करनी है, तो आप इसे कैसे डिज़ाइन करेंगे कि लोग इसके साथ अपनी संबद्धता स्थापित कर सकें?
उत्तर: सार्वजनिक कला वह कला होती है जो सार्वजनिक स्थलों पर स्थापित होती है और लोगों के जीवन, संस्कृति, स्मृति और पहचान से सीधा जुड़ाव रखती है। यह कला न केवल देखने के लिए होती है, बल्कि उसमें समाज की भागीदारी भी होती है। मेरे निवास और स्कूल के आसपास के समुदायों में लोक परंपराओं का प्रभाव देखा जा सकता है। दीवारों पर धार्मिक या सांस्कृतिक चित्र, स्थानीय त्योहारों के समय बनाई गई रांगोली, पूजा पंडालों की सजावट जैसी चीज़ें लोगों की कला समझ को दर्शाती हैं। यदि मुझे एक सार्वजनिक स्मारक बनाना हो तो मैं ऐसा स्मारक तैयार करना चाहूँगा जो वहाँ के लोगों की पहचान, संघर्ष और उम्मीदों को दर्शाए। वह स्मारक ऐसी जगह पर हो जहाँ लोग रोज़ आते-जाते हों, और उसकी संरचना में स्थानीय कलात्मक रूपों, भाषाओं और सांस्कृतिक संकेतों का समावेश हो ताकि लोग उसे देखकर खुद को उससे जुड़ा महसूस कर सकें। उसमें सहभागिता का अवसर भी हो जैसे किसी दीवार पर समुदाय अपने विचार लिख सके या उस पर समय-समय पर रंग या चित्र बदले जा सकें।
4. आप कला की दुनिया को कैसे समझते हैं? कला की दुनिया के विभिन्न घटक क्या हैं और ये कला बाज़ार से किस प्रकार संबंधित हैं?
उत्तर: कला की दुनिया एक जटिल और बहुआयामी संरचना है जिसमें कलाकार, कला शिक्षण संस्थाएँ, गैलरी, संग्रहालय, क्यूरेटर, आलोचक, दर्शक, संग्रहकर्ता और कला बाज़ार शामिल हैं। कलाकार कला का सृजन करते हैं, लेकिन उस रचना को समाज तक पहुँचाने में इन सभी घटकों की अहम भूमिका होती है। गैलरी और क्यूरेटर कला को प्रस्तुत करते हैं, आलोचक उसकी व्याख्या और मूल्यांकन करते हैं, संग्रहकर्ता उसे संजोते हैं और कला बाज़ार उसे आर्थिक मूल्य देता है। आज के समय में कला एक सांस्कृतिक संवाद का हिस्सा भी है और एक आर्थिक वस्तु भी, इसलिए कला की दुनिया और कला बाज़ार एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। कला की कीमत, उसकी पहचान और उसकी प्रतिष्ठा इन सभी कारकों से प्रभावित होती है। यह संबंध कभी-कभी कला को सीमित भी करता है, लेकिन अगर ईमानदारी से चलाया जाए तो यह कलाकार को प्रोत्साहन और पहचान भी प्रदान करता है।
कला की दुनिया में कलाकार, कला दीर्घाएं, संग्रहालय, क्यूरेटर, कला समीक्षक, कला व्यापारी, नीलामी घर, संग्राहक और दर्शक प्रमुख घटक होते हैं। ये घटक कला कृतियों के सृजन, प्रदर्शन, मूल्यांकन और व्यापार में सहायक होते हैं। कला बाजार इन घटकों के बीच आर्थिक और सांस्कृतिक संबंध स्थापित करता है।

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