NIOS Class 12 Painting Chapter 15 लोक एवं आदिवासी कला

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NIOS Class 12 Painting Chapter 15 लोक एवं आदिवासी कला

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Chapter: 15

Part – 1: सिद्धांत
पाठगत प्रश्न 15.1

A. सर्वाधिक उपयुक्त विकल्प चुनकर पूछे गए प्रश्नों के उत्तर दीजिए:

1. वार्ली चित्र भारत के किस राज्य में बनाए जाते हैं? 

(i) महाराष्ट्र का ठाणे जिला। 

(ii) मध्य प्रदेश का झाबुआ जिला। 

(iii) बिहार का मधुबनी जिला। 

(iv) कोलकाता का कालीघाट। 

उत्तर: (i) महाराष्ट्र का ठाणे जिला।

2. वार्ली चित्र शैली में बनाई जाने वाली ‘पालघाट देवी का चौक’ के कलाकार का नाम है: 

(i) गंगा देवी। 

(ii) रवींद्रनाथ टैगोर। 

(iii) जीव्य सोमा माशे।

(iv) इनमें से कोई नहीं। 

उत्तर: जीव्य सोमा माशे।

पाठगत प्रश्न 15.2

1. पिथोरा चित्र भारत के किस राज्य में और किन आदिवासियों द्वारा बनाए जाते हैं? 

उत्तर: मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के भील एवं भिलाला आदिवासियों तथा गुजरात के वडोदरा जिले के राठवा आदिवासियों में पिथोरा चित्र बनाने की परंपरा है।

2. पिथोरा चित्र किस देवता को समर्पित होता है? 

उत्तर: ये चित्र पिथोरा देव को समर्पित होते हैं, इसलिए इन्हें पिथोरा चित्र कहा जाता है। 

3. भील एवं राठवा आदिवासियों द्वारा बनाए जाने वाले पिथोरा चित्रों में क्या अंतर है? 

उत्तर: रंग-योजना की दृष्टि से भीलों द्वारा बनाए जाने वाले पिथोरा चित्र अधिक पुरातन, सादे एवं सीमित रंगों से बने होते हैं, जबकि राठवाओं द्वारा ये चित्र अधिक विवरणात्मक, आलंकारिक एवं चटक रंगों से बनाए जाते हैं। 

4. पारंपरिक पिथोरा चित्र कौन बनाता है और इन्हें बनाने में कौन सी सामग्री प्रयोग की जाती है? 

उत्तर: परंपरागत पिथोरा चित्र बनाने वाले चित्रकार को ‘लखिंद्रा’ कहा जाता है। ये चित्र अपने आस-पास सहज उपलब्ध प्राकृतिक रंगों से घर की अंदरूनी दीवार पर बनाए जाते हैं।

पाठगत प्रश्न 15.3

1. कोहबर क्या है? उसमें बनाए जाने वाले अभिप्राय एवं चरित्र कौन से हैं? 

उत्तर: कोहबर घर वह कमरा है जिसमें विवाह के उपरांत नव दंपत्ति धार्मिक अनुष्ठान (गौरीपूजन) संपन्न करते हैं। कोहबर चित्रों में उर्वरता एवं मंगल प्रतीकों तथा अभिप्रायों के साथ इष्ट देवी-देवताओं का भी निरूपण किया जाता है। 

2. मधुबनी शैली के चित्रों की विशेषताएँ क्या हैं? 

उत्तर: मधुबनी चित्र अत्यधिक विस्तृत होते हैं। इनमें हिंदू महाकाव्यों के प्रसंगों को दर्शाया जाता है। मुखाकृति में चेहरे, जीवंत प्राकृतिक रंग और खाली जगहों पर ज्यामितीय अलंकरण इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं। 

3. मधुबनी चित्रों के मुख्य विषय क्या हैं? 

उत्तर: मधुबनी चित्रों में पौराणिक आख्यान, रामायण, कृष्णलीला, उर्वरता एवं मंगल प्रतीकों तथा अभिप्रायों के साथ देवी-देवताओं का निरूपण किया जाता है।

पाठगत प्रश्न 15.4

1. कालीघाट चित्रों के पारंपरिक खरीदार कौन थे? 

उत्तर: कालीघाट चित्रों के पारंपरिक खरीदार वे हज़ारों तीर्थयात्री थे जो दर्शनार्थ काली मंदिर आते थे। 

2. कालीघाट चित्र किस माध्यम और सामग्री से बनाए गए? 

उत्तर: कालीघाट चित्र मिल में बने कागजों पर जल-रंगों (Watercolors) द्वारा बनाए गए हैं। 

3. कालीघाट चित्रों के प्रमुख विषय क्या थे? 

उत्तर: आमतौर पर हिंदू देवी-देवताओं के चित्र सबसे लोकप्रिय थे। इसके साथ ही कालीघाट चित्रकारों ने दैनिक जीवन की घटनाओं का भी चित्रण किया।

पाठगत प्रश्न 15.5

A. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें:

1. कलमकारी में ____________ रंग प्रयुक्त किए जाते हैं। 

उत्तर: कलमकारी में प्राकृतिक एवं सब्जियों के (वनस्पति) रंग प्रयुक्त किए जाते हैं। 

2. काले रंग का रेखांकन करने से पहले कपड़े को ____________ घोल में डालना आवश्यक है। 

उत्तर: काले रंग का रेखांकन करने से पहले कपड़े को हरड़ घोल में डालना आवश्यक है। 

3. कलमकारी कपड़ों का निर्यात भारत से ____________, ____________ देशों में किया जाता है। 

उत्तर: कलमकारी कपड़ों का निर्यात भारत से ईरान, इंडोनेशिया देशों में किया जाता है। 

पाठान्त प्रश्न

1. विवाहोत्सव के अवसर पर बनाई गई वार्ली पेंटिंग को क्या कहा जाता है? यह किसे समर्पित होता है? 

उत्तर: परंपरागत रूप से विवाह अनुष्ठान के अवसर पर घर के अंदर की मुख्य दीवार पर बनाए जाने वाले वार्ली चित्र को ‘पालघाट देवी का चौक’ कहा जाता है। यह चित्र मुख्य रूप से पालघाट देवी को समर्पित होता है और इसमें देवी की आकृति के नीचे शुभ रंग भी अंकित किया जाता है।

2. धान की फसल आने के समय उत्सव मनाने के लिए वार्ली चित्रण क्या कहलाती है? 

उत्तर: जब वार्ली कृषक नई फसल से प्राप्त धान को अपने आदिवासी देवता ‘कणसारी’ को समर्पित करते हैं, तब वे खलिहान, घर की बाहरी दीवारों और धान रखने की कोठरियों आदि पर जो चित्र बनाते हैं, उन्हें ‘पश्ती’ (Pashti) चित्र कहा जाता है।

3. पारंपरिक रूप से वार्ली चित्र कौन बनाता है? इसके लिए किस सामग्री का उपयोग किया जाता है? 

उत्तर: पारंपरिक रूप से वार्ली चित्र विवाहित महिलाओं द्वारा बनाए जाते हैं, और बाद में उत्साही युवतियाँ बाकी दीवार का कार्य पूरा करके काल्पनिक दृश्यों का एक कोलाज बनाती हैं। इन चित्रों को बनाने के लिए आदिवासी अपने बाँस के ढाँचे वाले घरों की दीवारों पर लाल मिट्टी में गोबर मिलाकर लिपाई करते हैं। चित्र बनाने के लिए चावल के आटे में पानी मिलाकर सफ़ेद पेस्ट तैयार किया जाता है। ब्रश के रूप में सलाती नामक घास की जड़ों या ताड़ वृक्ष की पत्तियों के मध्य भाग की लकड़ी के सिरे को कूची (ब्रश) जैसा बनाकर इस्तेमाल किया जाता है।

4. वार्ली चित्रकला की तीन विशेषताओं का वर्णन कीजिए। 

उत्तर: वार्ली चित्रकला की तीन प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

सरल और पुरातन स्वरूप: इन चित्रों की विशेषता उनके सरल, सहज और पुरातन स्वरूप में निहित है, जो प्राचीन गुफाचित्रों के समान दिखते हैं।

ज्यामितीय आकृतियाँ: इनमें मानव, पशु-पक्षी और अन्य आकृतियाँ मुख्य रूप से त्रिभुजों के विमुखी (उल्टे-सीधे) संयोजन से बनाई जाती हैं।

रंगों की सादगी: गहरे भूरे (लाल मिट्टी और गोबर) रंग की पृष्ठभूमि पर केवल सफ़ेद रंग से बने ये चित्र बहुत ही सादगीपूर्ण लेकिन जीवंत होते हैं।

5. एक पारंपरिक वार्ली चित्र में रूपांकनों की सूची बनाइए। 

उत्तर: एक पारंपरिक वार्ली चित्र (जैसे ‘पालघाट देवी का चौक’) में मुख्य रूप से निम्नलिखित रूपांकनों (motifs) को चित्रित किया जाता है, जिनकी सूची इस प्रकार है:

(i) सूर्य और चंद्रमा की आकृतियाँ (चित्र के शीर्ष दो कोनों पर)।

(ii) दुल्हन और दूल्हे द्वारा पहने जाने वाला औपचारिक मुकुट।

(iii) घोड़ी पर सवार दूल्हा।

(iv) नाचते हुए पुरुष और महिलाएँ।

(v) शिकार करने और खेती के दृश्य।

(vi) ताड़ी के पेड़, विभिन्न वनस्पतियाँ और जीव-जंतु।

6. लोक और जनजातीय कला की क्या परिभाषा है? 

उत्तर: लोककला मूलतः जनसामान्य की कला है। अपने परंपरागत स्वरूप में आदिवासी लोक-चित्रकला किसी क्षेत्र-विशेष या समुदाय-विशेष के जनसामान्य द्वारा किया गया वह कलाकर्म है, जो जनहित और व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए होता है। यह कलाकर्म किसी अवसर-विशेष (जैसे विवाह, फसल कटाई आदि) से जुड़े अनुष्ठानों एवं आवश्यकताओं को संपन्न करने के लिए किया जाता है।

7. आदिवासी भित्ति चित्रकला की विभिन्न शैलियों और उनके राज्यों के नाम लिखिए। 

उत्तर: भित्ति (दीवार) पर बनाई जाने वाली आदिवासी चित्रकला की प्रमुख शैलियाँ और उनके राज्य इस प्रकार हैं:

वार्ली चित्रकला: महाराष्ट्र (थाणे, डहाणू और जव्हार क्षेत्र)।

पिथोरा चित्रकला: मध्य प्रदेश (झाबुआ जिला) और गुजरात (वडोदरा जिला)।

मधुबनी (कोहबर) चित्रकला: बिहार (मिथिला क्षेत्र)।

8. वार्ली चित्रकला के रूपांकनों के बारे में लिखिए। 

उत्तर: वार्ली चित्रकला के रूपांकन (motifs) बहुत ही सरल और सहज होते हैं, जो मुख्य रूप से वार्ली आदिवासियों के दैनिक जीवन, उनके प्राकृतिक परिवेश और उनकी रोज़मर्रा की गतिविधियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। विवाह जैसे विशेष अवसरों पर बनाए जाने वाले ‘पालघाट देवी का चौक’ में, देवी की आकृति के चारों ओर पूरा चित्र शादी के दृश्यों और रोजमर्रा के काम-काज से घिरा होता है। इन रूपांकनों में उल्लास का माहौल दिखाने के लिए घोड़ी पर सवार दूल्हा और नाचते हुए पुरुष-महिलाओं को चित्रित किया जाता है। इसके अलावा, वार्ली लोगों के जीवन और आजीविका की झलक दिखाने के लिए शिकार करने, खेती करने, ताड़ी के पेड़, वनस्पतियों और पशु-पक्षियों के दृश्यों को भी इन चित्रों में प्रमुखता से दर्शाया जाता है। प्रकृति के सम्मान और शुभता के प्रतीक के रूप में सूर्य और चंद्रमा को भी इन चित्रों में विशेष स्थान दिया जाता है।

9. भारत के किस राज्य में मधुबनी चित्र की उत्पत्ति हुई? इसके धार्मिक और सामाजिक महत्व का वर्णन कीजिए और कोहबर के रूपांकनों के नाम लिखिए। 

उत्तर: मधुबनी चित्रकला की उत्पत्ति भारत के बिहार राज्य (विशेषकर मिथिला क्षेत्र) में हुई। 

धार्मिक और सामाजिक महत्व:  इसका उद्गम कोहबर घर में बनाए जाने वाले भित्तिचित्रों से हुआ है, जो विवाह एवं सुखद दांपत्य जीवन से जुड़े होते हैं। इसमें धार्मिक अनुष्ठानों (जैसे गौरीपूजन) और देवी-देवताओं के साथ-साथ उर्वरता और मंगल प्रतीकों का निरूपण किया जाता है। 

कोहबर के प्रमुख रूपांकन: तोते, पालकी में जाते हुए वर-वधू, कलश, कमल के फूल, बाँस, पान की बेल, लौंग का वृक्ष, मछली, कछुआ, लटपटिया सुआ, नैना जोगिन, राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती, चंद्र-सूर्य, सर्प, चिड़िया, मोर, दशावतार और सुहाग-प्रतीक आदि।

10. कलमकारी क्या है? भारत में इसकी कौन-सी दो प्रमुख शैलियाँ हैं? इन शैलियों के अंतर स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर: ‘कलमकारी’ (कलम + कारी) वह शिल्प विधा है जिसके द्वारा कलम (पेन) एवं रंगों की सहायता से कपड़ों पर चित्रकारी की जाती है। 

भारत (मुख्यतः दक्षिण भारत) में इसकी दो प्रमुख शैलियाँ हैं:

श्री कालहस्ती शैली: इस शैली में केवल ‘कलम’ के द्वारा चित्रित कलमकारी की जाती है और इसमें मुख्य रूप से हिंदू धार्मिक विषयों पर चित्र बनाए जाते हैं।

मछलीपट्टनम शैली: इस शैली में ब्लॉक प्रिंटिंग (ठप्पे) और कलम द्वारा चित्रकारी, दोनों के मिश्रण से कपड़ों को अलंकृत किया जाता है।

11. कालीघाट चित्र बनाने वाले चित्रकार कौन थे? इस शैली की विशेषताएँ बताते हुए इसमें चित्रांकित विषयों की एक सूची बनाइए। 

उत्तर: कालीघाट चित्र मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों से आए ‘पटुआ’ चित्रकारों द्वारा बनाए गए, जो मूलतः कथाचित्र और खिलौने रंगने का काम करते थे। 

विशेषताएँ: (i) कागज पर जलरंगों (Watercolors) का बेधड़क (bold) प्रयोग और आकृतियों का सरलीकरण। 

(ii) शरीर की मांसलता एवं गोलाई दर्शाने के लिए बाह्य रेखाओं के पास हल्के नीले या लाल रंग से छाया-प्रकाश (Shading) का प्रभाव देना। 

चित्रांकित विषय: देवी-देवताओं के चित्र, दैनिक जीवन की छोटी-बड़ी घटनाएँ, सामाजिक बुराइयों पर कटाक्ष करने वाले चित्र, नृत्यांगना, संगीतकार, बाल सँवारती स्त्री, हाथ में लाल गुलाब लिए स्थूलकाय स्त्री, सर्प, बिल्ली, मछली, झींगा आदि।

12. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए:

(अ) लोक एवं आदिवासी चित्रों में प्रयुक्त होने वाली सामग्री।

(ब) कोहबर घर।

(स) पश्ती चित्र।

उत्तर: (अ) लोक एवं आदिवासी चित्रों में प्रयुक्त होने वाली सामग्री: ये चित्र प्राकृतिक रंगों से दीवार या जमीन पर बनाए जाते हैं। ब्रश के लिए किसी वृक्ष की टहनी या कपड़े के टुकड़े का प्रयोग होता है। रंगों में पीली मिट्टी, गेरू, खड़िया, काजल, चावल का आटा, हल्दी, सिंदूर, महावर, नील, गोबर और फूल-पत्तियों से प्राप्त प्राकृतिक रस का प्रयोग होता है। 

(ब) कोहबर घर: यह कन्या पक्ष के घर का वह कमरा है जिसमें विवाह संस्कार के बाद वर अपनी ससुराल में रुकने तक रहता है। इसी कमरे में नव दंपत्ति धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। सुहागन स्त्रियाँ विवाह गीत गाते हुए इसकी दीवारों पर चावल के आटे और प्राकृतिक रंगों से मंगल और उर्वरता के चित्र बनाती हैं। 

(स) पश्ती चित्र: वार्ली आदिवासियों द्वारा नई धान की फसल आने के अवसर पर उत्सव मनाते समय खलिहानों, घर की बाहरी दीवारों और धान रखने की कोठरियों पर ये चित्र बनाए जाते हैं। यह चित्र कणसारी देवता को समर्पित होते हैं।

13. मधुबनी चित्रकला को मिथिला-चित्र के नाम से क्यों जाना जाता है? 

उत्तर: चूँकि मधुबनी चित्रकला मुख्य रूप से बिहार के मिथिला क्षेत्र की लोक चित्रकला है और इसका उद्गम वहीं से हुआ है, इसलिए इसे ‘मिथिला लोकचित्र’ के नाम से भी जाना जाता है।

14. पारंपरिक मधुबनी चित्रण बनाने के लिए आवश्यक सामग्री और रंगों की सूची बनाइए। 

उत्तर: पारंपरिक मधुबनी चित्रों को बनाने के लिए निम्नलिखित प्राकृतिक सामग्री और रंगों का प्रयोग होता है:

दीवार पोतने के लिए: चावल का आटा और पानी।

रेखांकन के लिए: कोयला या बाँस की पतली सींक/तीली।

रंग भरने के लिए: सींक के सिरे पर लिपटी रुई।

रंग: दीपक की कालिख (काले रंग के लिए), हल्दी या बरगद के रस के साथ नींबू (पीले रंग के लिए), पलाश के फूल/केसर, गोबर (हरे रंग के लिए), पीपल की छाल (लाल रंग के लिए), स्याही या नील (नीले के लिए) और महावर (गहरे गुलाबी रंग के लिए)।

15. कालीघाट चित्रकला की दो विशेषताओं का वर्णन कीजिए। 

उत्तर: (i) इस शैली में आकृतियों का बहुत ही सरलीकरण किया जाता है और जलरंगों का एकदम बेधड़क (स्पष्ट और चटक) इस्तेमाल किया जाता है। 

(ii) मानव शरीर की गोलाई और मांसलता को उभारने के लिए बाहरी रेखाओं (Outlines) के पास हल्के नीले या लाल रंग से छाया-प्रकाश (Shading effect) दिया जाता है।

16. कालीघाट चित्रकला की उत्पत्ति कहाँ और किस काल में हुई थी? 

उत्तर: कालीघाट चित्रकला की उत्पत्ति 19वीं सदी में औपनिवेशिक काल के दौरान कोलकाता के कालीघाट (काली मंदिर के पास वाले) क्षेत्र में हुई थी। उस समय हो रही सामाजिक एवं सांस्कृतिक उथल-पुथल के परिणामस्वरूप यह कला विकसित हुई।

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