Class 10 Elective Hindi Sample Paper – 2 | দশম শ্ৰেণীৰ হিন্দী প্ৰশ্নকাকত

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SEBA Class 10 Elective Hindi Simple Paper and Question Answer

SEBA Class 10 Elective Hindi Sample Paper

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हिंदी प्रश्नपत्र

PART – II

ELECTIVE HINDI

MODEL QUESTION ANSWER

Group – A 

1. एक वाक्य में उत्तर दो :

(क) बदे साहब ने नारद को भोलाराम के दरखास्तों पर वजन रखने की सलाह दी। यहाँ ‘वजन’ शब्द से क्या बोध होता है ? 

उत्तर : रिशवत ।

(ख) ‘सड़क की बात’ पाठ के लेखक कौन है ? 

उत्तर : ‘सड़क की बात’ पाठ के लेखक रवीन्द्रनाथ ठाकुर।

(ग) कवि के अनुसार गुरु कुम्हार है तो शिष्य क्या है ?

उत्तर : कवि के अनुसार गुरु कुम्हार है तो शिष्य कुंभ 

(घ) कबीर की भाषा को क्या नाम दिया गया है ?

उत्तर : कबीर की भाषा को सधुक्कड़ी भाषा कहते हैं। 

(ङ) कवि दिनकर के अनुसार कलम किसका प्रतीक है ?

उत्तर : कलम ज्ञान तथा मानसिक शक्ति का प्रतीक है। 

(च) रीदे और जोते जाने पर मिट्टी भी किस रूप में बदल जाती है ? 

उत्तर : मिट्टी रौंदे और जोते जाने पर भी मातृरूपा हो जाती है। वह अपने पुत्रों को धन-धान्य से भर देती है।

(छ) मिट्टी का खिलौना मृत्तिका का कौन-सा परिवर्तित रूप है ? 

उत्तर : जब बच्चे खिलौनों के लिए मचलते हैं तो मानव परिश्रम द्वारा मिट्टी को नए नए खिलौनों का रूप दे देता है। इससे बच्चे प्रसन्न हो जाती है। इस प्रकार मिट्टी प्रजारूपा हो जाती है।

2. सप्रसंग व्याख्या करो :

(क) माला फेरत जुग भया, फिरा न मनका फेरा । 

      करका मनका डारि दे, मन का मनका फेर ।

अथवा

बुरा जो देखन मैं बला, बुरा न मिलिया कोय। 

जो दिल खोजा आपना, मुझ सा बुरा न कोय।

उत्तर : संदर्थ प्रस्तुत पंक्ति हमारी पाठ्यपुस्कक हिन्दी आलोक भाग-2 से ‘साखी’ नामक पाठ से लिया गया है। इसके रचयिता कबीर दास जी है। 

प्रसंग : कबीर दास जी कहते हैं हाथ का मनका (माला) बहुत दिनों तक फेरने से भी मन की बुराई नहीं गई। 

अतः मन को बुराई की ओर से फेरने की बात कही है। 

व्याख्या : कबीर दास जी कहते हैं माला जप करते-करते युग बीत गया, मनों का गठबंधन नहीं हुआ अर्थात भक्त और भगवान का मिलन नहीं हुआ। अन्तरात्मा के साथ ईश्वर का मिलन होगा, तभी मनों का फेर सार्थक होगा। यहां भी निर्गुण कवि बाहरी आचार पर ध्यान न देकर केवल मन से ईश्वर की आराधना करने के लिए कहा है। यदि माला घूमाने से मन उसमें ही आबद्ध रहे तो बेकार है मन को ईश्वर मुखी करनी चाहिए। भाव यह है पाखण्डी लोग दिखावे के लिए माला जपते हैं पर उनका मन कहीं और रहता है।

अथवा

संदर्भ : प्रस्तुत पंक्ति साखी से लिया गया है इसके रचयिता कबीर दास जी की है। 

प्रसंग : दूसरों की बुराई खोजने से पहले अपनी बुराई का दूर करना चाहिए।

व्याख्या : कबीर दास जी कहते हैं जब मे बुरा आदमी ढूंढने निलका तो एक भी मे बुरा व्यक्ति नहीं मिला, जब मैंने अपने दिल में खोजा तो पाया मुझ जौसा बुरा और कोई नहीं। अर्थात दूसरों की बुराइयों को देखने से पहले अपने की बुराइ अर्थात अहंकार दूर करना चाहिए। अपनी त्रुटियों को दूर करना चाहिए। जब तक मन में अहंकार है ईश्वर को पा नहीं सकते।

3. संक्षेप में उत्तर दो :

(क) ‘आज तुम्हारा खेल जमा नहीं।’ इस प्रश्न के उत्तर में छोटा जादूगर ने क्या कहा ?

उत्तर : उस दिन भी छोटा जादुगर सड़क के किनारे बैठकर खेल दिखा रहा था पर उसकी वाणी में स्वभाव सुलभ प्रसन्नता की तरी नहीं थी, वह औरों को तो हँसा रहा था पर स्वयं उदास था, खेल समाप्त होने के बाद जब लेखक ने कहा- आज तुम्हारा खेल जमा क्यों नहीं, तब लड़के ने कहा- माँ बीमार है, आज तुरन्त चले आने को कहा है और बोली मेरा अन्तिम समय आ गया है।

(ख) श्रीमती के आग्रह पर छोटे जादूगरने किस प्रकार अपना खेल दिखाया ? 

उत्तर : श्रीमती के आग्रह पर छोटे जादूगर ने खिलौने के द्वारा अपना खेल दिखाया। भालु मनाने लगा। बिल्ली रुठने लगी। बंदर घुड़कने लगा। गुड़िया का व्याह हुआ। गुड्डा वर काना निकला। लड़के की वाचालता से ही सारा अभिनय हो रहा था और लोग हंसते-हँसते लोट-पोट ही रहे थे। 

(ग) भोलाराम की पारिवारिक स्थिति पर प्रकाश डालो।

उत्तर : भोलाराम की पारिवारिक स्थिति बहुत ही मार्मिक तथा दयनीय थी, जबलपुर शाहर के धमापुर मुहल्ले में नाले के किनारे एक डेढ़ कमरे के टूटे-फुटे मकान में वह परिवार समेत रहता था। नौकरी से पाँच साल पहले रिटायर हो गया था। उसने अपने मकान का किराया एक साल से नहीं दिया था। परन्तु इससे पहले ही भोलाराम इस संसार को छोड़ कर चला जाता है। 

(घ) ‘मैं किसी का भी लक्ष्य नहीं हुँ।’ – सबका उपाय मात्र हुँ। -सड़क ने ऐसा क्यों कहा है ?

उत्तर : सड़क ने ऐसा इसलिए कहा कि क्योंकि कोई सड़क तक पहुँचने का लक्ष्य नहीं रखता, सड़क के सहारे अपने लक्ष्य तक पहुंचता है। सड़क हर व्यक्ति को उसके लक्ष्य तक ले जाती है। लक्ष्य तक पहुँचने का उपाय बनती है। 

(ङ) सुन्दर श्याम को अपने घर आने का आमंत्रण देते हुए कवयित्री ने उनसे क्या कहा है ?

उत्तर : सुन्दर श्याम को अपने घर आने का निमंत्रण देते हुए मीराँबाई ने कहा कि सुन्दर श्याम आप हमारे घर आए। तुम्हारे आए बिना में सुखी नहीं होऊंगी। तुम्हारे विरह में पके पान के पत्ले की तरह पीली पड़ गई हूं। मुझे तुझ पर ही आशा है, विश्वास है।

(च) ‘अंध कक्ष में बैठ रचोगे ऊंचे मीठे गान’ का आशय स्पष्ट करो। 

उत्तर : प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक आलोक भाग-२ के राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ रचित कलम और तलवार शीर्षक कविता से ली गई है। कवि ने इसमें कलम और तलवार की स्वतंत्र महत्ता एवं सत्ता पर प्रकाश डाला है।

इन पंक्तियों में कवि देशवासियों से यह प्रश्न करते हैं कि कलम लेकर तुम अंध कक्ष में बैठकर केवल मीठे-मीठे गान ही रचोगो या हाथ में तलवार पकड़ कर बाहर का मैदान भी जीतोगे? यानी कि केवल मीठे-मीठे गीतों से मन बहलाओगे या तलवार लेकर दुश्मनों से देश की रक्षा भी करोगे।

4. लेखक ने कंगूरे के गीत गाने के बाज नींव के गीत गाने के लिए क्यों आहवान किया है ?

उत्तर : लेखक ने कंगूरे के गीत गाने के बजाय नींव के गीत गाने का आह्वान करते हैं क्योंकि नींव ही असली चीज होती है। उसी पर पूरी डमारत टिकी रहती है। यह अनाम बलिदान है ताकि इमारत खड़ी रह सके। नीव की मजबूती और पुखतेपन पर ही अस्ति नास्ति टिकी रहती है। मूक शहादत ईंट की हो चाहे मनुष्य की दोनों महान ही है।

अथवा

‘सुन्दर सृष्टि हमेशा बलिदान खोजती है- बलिदान ईट का हो या व्यक्ति का।’- आशाय स्पष्ट करो।

उत्तर : प्रस्तुत पंक्ति हमारी हिंदी पाठ्यपुस्तक आलोक भाग २ के रामवृक्ष बेनीपुरी रचित नींव की ईट शीर्षक पाठ से ली गई है। लेखक ने इसमें नींव की ईट के महत्व पर प्रकाश डाला है।

कोई भी सृष्टि ऐसे ही सुंदर नहीं हो जाती है। उसे सुंदर बनाने के लिए बनाने वाले को खुद का बलिदान देना पड़ता है। कोई भी इमारत सुंदर तभी बनती है, जब उसके नींव को ईंट मजबूट व सख्त होती है। प्रस्तुत पंक्ति इसी प्रसंग में कही गई है।

उद्धत पंक्ति में लेखक के कहने का आशय यह है कि बलिदान ईंट की हो या व्यक्ति को, दोनों ही महत्त्वपूर्ण होते हैं। दोनों ही अनाम और निःस्वार्थ होते हैं। इमारत को मजबूती देने के लिए कंगूरे को चमक देने के लिए नींव की ईंट को अपना बलिदान देना पड़ता है। इसी प्रकार सुंदर, खुशहाल, उन्नत समाज के निर्माण के लिए व्यक्ति को बलिदान देना पड़ता है। निःस्वार्त समाजसेवी समाज को सुंदर बनाने के लिए चुपचाप स्वयं को खपा देते हैं। उनकी शाहादत अनाम होती है।

5. (क) किन्ही दो मुहावरों से बाक्य बनाओ :

नौ दो ग्यारह होना, घड़ी समीप होना, श्रीगणोश करना, दाल न गलना 

उत्तर : नौ दो ग्यारह होना – (चम्पत होना) पुलिस को देखकर चोर नौ दो ग्यारह हो गया।

घड़ी समीप होना – (मृत्यु का समय पास आना) सुरेश की माँ की अन्तिम घड़ी समीप आ गई।

श्रीगणेश करना – (आरम्भ करना) शुभ कार्य को श्रीगणेश करने में देर नहीं लगाना चाहिए। 

(ख) किन्ही चार के स्त्रीलिंग रूप लिखो :

ठाकुर, कवि, नरकौआ, अभिनेता, हाथी, गायक, सम्राट 

उत्तर : ठाकुर – ठकुराइन                कवि – कवियत्री

          नरकौआ – मादा कौआ         अभिनेता – अभिनेत्री

          हाथी – हाथिन                     गायक – गायिका

          सम्राट – सम्राज्ञी

(ग) किन्ही दो के संधि करो :

सत + आचार, एक + एक, रमा + ईश, तप : + वन

उत्तर : सत + आचार = सदाचार          एक + एकृ एकैक 

           रमा + ईश = रमेश                  तप: + वन = तपोवन

(घ) किन्ही चार के विलोम (विपरीतार्थक) शब्द लिखो :

कठोर, निर्यात, प्रकाश, आशा, सगुण, वीर, न्याय

उत्तर : कठोर – कोमल              निर्यात – आयात

          प्रकाश – अंधकार            आशा – निराशा

          सगुण – दुर्गुण                वीर – कापुरुष

          न्याय – अन्याय

(ङ) निम्नांकित उपसर्गों / प्रत्ययों को जोड़कर एक एक शब्द बनाओ:

अभि, परा, अनीय, आवट

उत्तर : अभि + नय = अभिनय सुरेश बहुत अच्छा अभिनय करता है । 

परा + धीन = पराधीन। पराधीन जीवन किसी को अच्छा नहीं लगता ।

अतुलनीय = ताजमहल की सौन्दर्यता अतुलनीय है । 

सजावट = घर की सजावट अच्छा है ।

(च) अनेक शब्दों के लिए एक शब्द लिखो :

जो मांस खाता हो, आकाश में विचरनेवाला, जो दिखाई न दे, शिव का उपासक

उत्तर : जो मांस खाता हो             –     मांसाहारी

           आकाश मे विचरनेवाला    –      नभचर

           जो दिखाई न दे               –      अदृश्य

           शिव का उपासक             –       शैव

(छ) किन्ही दो के पर्यायवाची शब्द लिखो :

हवा, पुस्तक, आकाश, कमल, दुःख 

उत्तर : हवा पवन, वायु, समीर, अनिल       

           पुस्तक – पोथो, किताब

          आकाश -गगन, अंबर, नभ, न्योम 

          कमल-पंकज, नीरज, जलज, शतदल

          दुःख-क्लेश, व्यथा, कष्ट, वेदना

(ज) किन्हीं दो वाक्यों को शुद्ध करो :

(क) आप यहाँ जत बैठो

(ख) सीता ने गीत गाई

(ग) रमेन ने रोटी खाया

(घ) श्रीकृष्ण के अनेकों नाम है 

उत्तर : (क) आप यहाँ मत बैटो – आप यहाँ मत बैठिये।

(ख) सीता ने तीत गाई – सीता गीत गाती है । 

(ग) रमेन ने रोटी खाया – रमेश ने रोटी खायी।

(घ) श्रीकृष्ण के अनेकों नाम है – श्रीकृष्ण के अनेक नाम है।

Group – B 

6. पूर्ण वाक्य में उत्तर दो :

(क)महोदवी वर्मा जब मोर के दोनों बच्चों को घर लाई तो सभी क्या कहने लगे ? 

उत्तर : मोर मोरनी के जोड़े को लेकर महादेवी वर्मा जी घर पहुँची तब सब कहने लगे कि यह मोर नहीं है, तीतर है। दुकानदार ने ठग लिया है।

(ख) विदेशी महिला ने नीलकंठ को क्या उपाधि दी थी ?

उत्तर;: परफैक्ट जेंटिलमैन ।

(ग) गाँवों या गरीब बस्तियों में चिट्ठी या मनिऑर्डर लेकर पहुँचने वाले डाकिये को लोग किस रूप में देखते है ? 

उत्तर : देवदूत के रूप में देखा जाता है ।

(घ) पत्र की कन्नड़ भाषा में क्या कहते हैं ?

उत्तर : पत्र को कन्नड़ में कागद कहते हैं ।

(ङ) ‘जो बीत गई’ कविता में कवि ने बीती बातों को भूलकर किसकी चिन्ता करने का संदेश दिया है ?

उत्तर : वर्तमान की चिन्ता करने का संदेश दिया है। 

(च) ‘कायर मत बन’ कविता के कवि कौन है ? 

उत्तर : कायर मत बन कविता के कवि नरेंद्र शर्मा जी है ।

7. संक्षेप में उत्तर दो :

(क) वसंत ऋतु में नीलकंठ के लिए जालीघर में बंद रहना असहनीय हो जाता था क्यों ?

उत्तर : असल में नीलकंठ को फलों से अधिक अच्छे पल्लवित और पुष्पित बृक्ष लगते थे। यहीं कारण था कि वसंत ऋतु में वृक्ष जब पल्लवित और पुष्पित हो जाते थे तव नीलकंठ उन पेड़ों पर जाने के लिए व्यग्र हो उठता था। तब उसकी जाली घर में बंद रखना असंभव हो जाता था। लेखिका को उसे जाली घर से आजाद कर देना पड़ता था।

(ख) पत्र जैसा संतीष एस एस एस का संदेश क्यों नहीं दे सकता ? 

उत्तर : फोन या एसएमएस के संदेश छोटे होते हैं। नसे कोई सिलसिला आरंभ नहीं होता। इसीलिए पोन या एसएमएस के संदेश पत्र जैसा संतोष नहीं दे सकते। 

(ग) ‘जो मादकता के मारे हैं, वे मधु लूटा की करते हैं।’- इसके द्वारा कवि क्या कहना चाहते हैं ?

उत्तर : इससे कवि यह कहना चाहते हैं कि जिनको जीवन से सच्चा प्यार रहता है वो बीती बातों को भूल कर वर्तमान की चिंता करते हैं। 

(घ) कवि ने कायरता को प्रतिहिंसा से अधिक अपवित्र क्यों कहा है ?

उत्तर : कवि ने कायरता को प्रतिहिंसा से अधिक अपवित्र कहा है क्योंकि कायरता मानवता के विपरीत है। कायर व्यक्ति साहसहीन, निराश एवं दुखी होता है। वह मानवीचित कार्य में पीछे रहता है। इसलिए कायरता को अपवित्र कहा गया है।

8. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दो : 

(क)नीलकंठ के स्वभावगत विशेषताओं का बर्णन करो।

उत्तर : नीलकंठ में उसकी जातिगत विशेषताएं तो थी ही उसका मानवीकरण भी होने लगा था। वह केवल कलाकार ही नहीं था। केवल कलात्मक ढंग से लय ताल से नाचता ही नहीं था, वह वीर भी था। सांपों पर बड़ी भयंकरता से प्रहार करता था। छोटे पशु पक्षियों के प्रति वह सहृदय था। सांप से छुड़ाकर वह खरगोश के घायल छोटे बच्चे को रात भर अपने पंखों की गरमी देता रहा था। फलों के बदले उसे पल्लवित और पुष्पिट बृक्ष अधिक अच्छे लगते थे। घटा देखकर वह अपने पंखों का गोल घेरा बनाकर लय ताल के साथ नाचने लगता था। अपनी नुकीली चोंच से वह लेखिका की हथेली पर रखे भूने चने घड़ी कोमलता से और हौले हौले उठाकर खाता था।

अथवा

कुब्जा और राधा के आचरणों में क्या अंतर है ? 

उत्तर : कुब्जा और राधा के आचरण में ये अंतर परिलक्षित होते हैं कि राधा जहां अपने अंडे को बड़े प्यार से सेती थी वहीं कुब्जा उसे चोंच मार कर तोड़ देती थी। राधा हमेशा नीलकंठ के पास रहना चाहती थी लेखिन कुब्जा उसे मार-मार कर उससे दूर भगा देती थी। राधा शांत और सहृदय थी। पर कुब्जा क्रूर और दुष्ट थी। कुब्जा की किसी पशु-पक्षी के साथ मित्रता नहीं थी। 

(ख)’ जो बोत गई’ कविता में कवि ने मानव जीवन की तुलना किन किन – चोजों से की है ?

उत्तर : उक्त कविता में कवि नेम मानव की तुलना अंबर से टूटे तारों के साथ, उपवन को मुरझा गयी फूलों के साथ, मदिरालय का टूटे प्यालों से की है। जीवन में उतार-चढ़ाव आता रहता है, पर अपने अतीत की परछाई से परेशान न होकर वर्तमान को उज्ज्वल करना चाहिए। जिस प्रकार अंबर टूटे तारों के लिए अनुताप नहीं करता, वह तारा उसके लिए अतीत है, मुरझाए फूलों के लिए उपवन शोर नहीं मचाता, कौन टूटा कौन गिरा इसके लिए मदिसलय ने कभी परचाताप नहीं किया। अतः जीवन के बाकी बचे समय को सुखपूर्वक बीताना चाहिए।

अथवा

कवि ने ‘अंबर के आनन’ को देखने की बात क्यों की है ? 

उत्तर : कवि ने अंबर के आनन को देखने की बात इसलिए की है क्योंकि उससे हम यह शिा ले सकें कि अपने प्रिय जन के बिछुड़ जाने पर कभी हम शोक न करें। वर्तमान में हमारे अपने जो साथ हैं, उनकी चिंता करें।

9. किसी एक विषय पर निबंध लिखो :

(क) विज्ञान के चमत्कार

(ख) समाचार पत्र

(ग) खेलकूद का महत्व

(घ) असम का प्राकृतिक सौन्दर्य

विज्ञान के चमत्कार :

( क ) आधुनिक युग में विज्ञान के नवीन आविष्कारों ने विश्व में क्रांति-सी ला दी है। विज्ञान के बिना मनुष्य के स्वतन्त्र अस्तित्व की कल्पना भी असम्भव प्रतीत होती है। विज्ञान की सहायता से मनुष्य की सबसे बड़ी भौतिक शक्ति है। वह विश्व के संचालन का मूल आधार है। वैज्ञानिक आविष्कारों का सहारा लेकर मानव ने बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान खोज निकाला है। आज जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में विज्ञान के आविष्कारों का प्रभुत्व देखा जा सकता है। आज टेलीफोन, सेल्युलर, टेलीग्राम, पेजर तथा फैक्स के द्वारा क्षण भर संदेश व विचारों का आदान-प्रदान किया जा सकता है। अब एक समाचार, टेलीप्रिण्टर, रेडियो अथवा टेलीविजन द्वारा कुछ ही क्षणों में विश्व भर में प्रेषित किया जा सकता है। आज चन्द्रमा तथा अन्य ग्रहों पर पहुँचे अन्तरिक्ष यात्रियों के संदेश पृथ्वी पर पल भर में प्राप्त किए जा सकते हैं। विज्ञान ने पृथ्वी और आकाश को सारी दूरी समेट ली है। आज पृथ्वी ही नहीं, आज इन वैज्ञानिक साधनों के द्वारा मनुष्य ने चन्द्र-तल पर भी अपने कदमों के निशान बना दिए हैं। विज्ञान ने चिकित्सा की नवीन पद्धतियों के सहारे मनुष्य को दीर्घजीवी बनाया है। 

शिक्षा के प्रसार व प्रचार में विज्ञान ने महत्वपूर्ण योगदान दिया है। छापेखानों तथा अखबारों ने ज्ञानवृद्धि में सहयोग दिया है। विभिन्न प्रकार के उर्वरक, कृत्रिम जल व्यवस्था, बुआई तथा कटाई आदि के आधुनिक साधनों एवं कीटनाशक दवाओं ने खेती को सुविधापूर्ण और सरल बना दिया है। मनोरंजन के आधुनिक साधन विज्ञान की ही देन हैं। सिनेमा, रेडियो तथा टेलीविजन के आविष्कार ने मानव को उच्च कोटि के सरल और सुलभ मनोरंजन के साधन दिए हैं। हमारे दैनिक जीवन का प्रत्येक कार्य विज्ञान पर ही आधारित है। विद्युत का आविष्कार हमारे जीवन का महत्वपूर्ण अंग बन गया। हमारे देश में अनेक छोटे-बड़े कल-कारखानों का संचालन हो रहा है। वस्तुतः विज्ञान ने उद्योगों को प्रगति की ओर अग्रसर किया है। इस युग को परमाणु युग कहा जाता है। आज अणु-शक्ति द्वारा कृत्रिम बादलों के माध्यम से वर्षा की जा सकती है। अणु-शक्ति के द्वारा ही मानव-कल्याण से संबंधित अनेक कार्या किए जा रहे हैं। पृथ्वी और समुद्र से मूल्यवान गैस और खनिज प्राप्त किए जा रहे हैं।

समाचार-पत्र

(ख) जिज्ञासा मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। इसका मुख्य कारण यह है कि अन्य प्राणियों की अपेक्षा मानव में सोचने-समझने की शक्ति अधिक है। उसकी ज्ञान की प्यास कभी नहीं बुझती जितना ज्ञान बढ़ता जाता है उसके ज्ञान की प्यास भी बढ़ती जाती है। साहित्य ही उसके मस्तिष्क की प्यास को बुझा सकता है। इस दृष्टि से देश विदेश के राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक परिवर्तनों को जानने का एक ही साधन है समाचार पत्र वर्तमान युग में कोई भी राष्ट्र समाचार पत्रों के बिना जीवित नहीं सकता। यह मानव की जिज्ञासा को शान्त करने का सरलतम साधन है।

आवश्यकता आविष्कार की जननी है। समाचार पत्रों का जन्म भी आवश्यकता का ही परिणाम है। समाचार पत्र जो आज हमारे दैनन्दिन जीवन के अंग बन चुके हैं। विज्ञान की प्रगति से विश्व को हमारे सामने लाते हैं समाचार पत्र । सर्वप्रथम विश्व में समाचार पत्र का प्रचलन चीन में ही हुआ था। यूरोप में वेनिश शहर में समाचार पत्र का प्रचलन हुआ, उसका नाम था ‘गेजेटा’। इसी से गेजेट शब्द का उद्भव हुआ है। भारत में समाचार पत्र का प्रचलन हुआ था, उसका नाम था ‘इंडिया गेजेट।’ आजकल दैनिक, अर्द्ध साप्ताहिक, अर्द्धमासिक, मासिक, त्रेमासिक, समाचार पत्र निकलते हैं।

‘अरुणोदय’ सर्वप्रथम अर्द्ध असमीया पत्र है। सन १८४६ में अरुणोदय का प्रकाशन हुआ था। इसके बाद मे असमीया भाषा में विभिन्न समाचार पत्रों का प्रकाशन हुआ था।

निष्पक्ष और शुद्ध समाचार का प्रचार करना समाचार पत्र का मुख्य उद्देश्य होना चाहिए। प्रतिदिन विश्व में घटित विभिन्न घटना, संस्कृति, राजनीति, विज्ञान, अर्थनीति शिक्षा, व्यापार, आमोद-प्रमोद, खेल, समाजनीति आदि का शुद्ध और तत्काल प्रचार करने में ही समाचार पत्र सार्थ होती है। हमारे देश में राष्ट्रीय चेतना जाग्रत करने का श्रेय भी समाचार पत्रों द्वारा निरन्तर उपलब्ध कराए गए सुन्दर और श्रेष्ठ साहित्य से हमारे बौद्धिक विकास का क्रम बना रहता है। इनके माध्यम से समाचार पत्रों के द्वारा हम विभिन्न प्रकार के सुझाव, सम्मति तथा आलोचनाओं से अपने राजनीतिक, सामाजिक आर्थिक हितों की रक्षा करते हैं। इस प्रकार समाचार पत्र मनुष्यों के सर्वागीण विकास का प्रमुख माध्यम है।

खेलकूद का महत्व

(ग) व्यायाम और खेल दोनों ही हमारे स्वस्थ और सफल जीवन के अनिवार्य अंग है। खेल हमारे शरीर और मन-मस्तिष्क का समुचित विकास करते हैं। खेलकूद का महत्व केवल बच्चों और किशोरों के लिए ही नहीं, सभी आयु के लोगों के लिए समान रूप से हुआ करता है। तभी तो कहा जाता है कि जीवन में छोता-बड़ा हर काम खेल भावना से करना चाहिए। क्योंकि खेल में एक पक्ष की हार और दूसरे की जीत निश्चित हुआ करती है, इस कारण खेल भावना से काम करने से सफलता का आनन्द तो होता है, पर हार या असफलता का दुःख उतना नहीं है, जितना आमतौर पर हारने वाले को हुआ करता है। हमारे जीवन में खेल का महत्व कई प्रकार से देखा और उसका वर्णन किया जाता है। अपने शरीर का स्वस्थ, सुन्दर, चुस्त-दुरुस्त, गठीला और फुर्तीला बनाने के लिए नियमपूर्वक खेलना आवश्यक होता है। 

खेल खेलने हमारे तन मन की शक्तियाँ तो बढ़ता है। तन-मन से स्वस्थ और बढ़े हुए आत्मविश्वास वाले •व्यक्ति के लिए जीवन में कुछ भी कर पाना कठिन नहीं रह जाता। खेल अनुशासन, संगठन, पारस्परिक सहयोग, साहस, विश्वास, आज्ञाकारिता, सहानुभूति, समरसता आदि गुणों का हममें विकास करके हमें देश का सभ्य तथा सुसंस्कृत बनाते हैं। खेल हमारे अंदर निर्णय लेने की शक्ति का विकास करते हैं। आज के इस युग में तो खेलों का महत्व और भी अधिक बढ़ गया है। आज बहुत बड़ी आवश्यकता इस बात की है कि संसार के विभिन्न देश अपने-अपने मतभेदों को भुलाकर प्रेम और शांति से रहें। सभी देशों के हजारों लोग आपस में मिल बैठते हैं। भाषा, रंग, जाति, धर्म आदि की संकीर्ण मर्यादाएं यहाँ आकर टुट जाती हैं।

असम का प्राकृतिक सौन्दर्य

(घ) भारत के पूर्व भाग में अवस्थित एक छोटा-सा राज्य है-असम। यह प्राकृतिक सम्पदाओं का भण्डार है, साथ ही प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध भी है।

असम प्रकृति की लीला भूमि है। यह राज्य चारों ओर पर्वत पहाड़ो से घिरा हुआ है। प्रकृति का इतना सुन्दर रूप भारत के दूसरे स्थान पर दिखाई नहीं देता। नहीद, पहाड़, वन-जंगलों से घिरा हुआ असम का यह रूप अपूर्व है। लगता है प्रकृति अपने सौन्दर्य को ढालकर असम को सजाया है। असंख्य पहाड़ों से घिरा हुआ यह राज्य है। असम के प्राकृतिक सौन्दर्य का एक प्रधान उपादान है ब्रह्मपुत्र नद। पहाड़ों के बीच ऐसा वृहद नद खूब कम ही दिखाई देता है। ब्रह्मपुत्र का और एक नाम है लुइत। ब्रह्मपुत्र नद की असंख्य शाखा-प्रशाखाओं ने असम को और भी सुन्दर बना दिया है। 

असम के सौन्दर्य का और एक उपादान है, यहाँ का वन-जंगल। इतना घना हरियाली से भरा हुआ वन भूमि सब जगह दिखाई नहीं देता। वनभूमि में शाल, देवदारु, वन वृक्षों से भरा हुआ है। असम के प्रकृति ऋतु परिवर्तन से और भी सुन्दर हो जाता है। ग्रीष्म का प्रखर नाप असम में नही होता, ग्रीष्म में भी असम में हरियाली ही छायी रहती है। चारों ओर फूलों के सुगन्ध वन-जंगलों में पक्षियों का चहचहाना बड़ा ही मनोरम लगता है। ग्रीष्म के बाद वर्षा ऋतु का आगमन होता है साथ ही प्रकृति मानों नये सौन्दर्य से रहस्यमयी हो जाती है। नील पहाड़ों के बीच घने बादल छा जाते हैं। असम में शरद ऋतु बहुत कम समय तक रहती है। वर्षा के शांत होने से पहले ही शीत आ जाती है चारों ओर शीत का प्रभाव पड़ता है। यह समय का श्रेष्ठ ऋतु है, नाना प्रकार के फूलों से असम और भी सुन्दर हो उठता है।

असम के बाहर वालों की धारणा है कि असम जादू का राज्य है, जो एक बार आता है, वे फिर लौटकर नहीं जाते। वे जादू हैं-असम के प्राकृतिक सौन्दर्य के आकर्षण और सुख-सुविधा

10. अपने विद्यालय में कंप्यूटर शिक्षा की व्यवस्था करने के लिए प्रधानाचार्य को एक आवेदन-पत्र लिखो। 

उत्तर : सेवा में

              श्रीयुक्त प्रधानाचार्य महोदय

              राजकीय विद्यालय, पानबाचार

दिनांक………..

मान्यवर महोदय,

              सविनय निवेदन है कि हमारे विद्यालय में कंप्यूटर शिक्षा की व्यवस्था नहीं है। हम सभी छात्र कंप्यूटर सिखना चाहते हैं।

               अत : आपसे विनम्र निवेदन है कि आप विद्यालय में कंप्यूटर शिक्षा की व्यवस्था कर दीजिए।

आपका आज्ञाकारी शिष्य

विनय दास

कक्षा-X (अ)

अथवा

अपने मित्र को मैट्रिक की परीक्षा में प्रथम स्थान पर उत्तीर्ण होने पर एक बधाई पत्र लिखो।

उत्तर : प्रिय मित्र सुरेश

                        सप्रेम नमस्कार,

दिनांक……..

तुम अबकी बार मैट्रिक की परीक्षा में प्रथम स्थान पर उत्तीर्ण हुए हो सुनकर इतना आनन्द हो रहा कि मन कर रहा है अभी तुम्हारे पास चला आऊँ। तुम्हें बहुत-बहुत बधई है मेरा। आशा करता हूँ कि आगे भी ऐसा ही होता। चाचा चाची को मेरा प्रणाम देना। अवसर मिलने पर यहाँ अवश्य आना।

तुम्हारा अभिन्न मित्र

अजय

11. निम्नांकित गद्यांश पढ़कर उसके नीचे दिए गए प्रश्नों के 

उत्तर दोः 

लेखक का काम बहुत-सी बातों में मधुमक्खियों से मिलता है। मधुमक्खियाँ मकरंद संग्रह के लिए मीलों तक चक्कर लगाती है और अच्छे फूलों पर बैठकर उनका रस लेती है, तभी तो उनके मधु में संसोर की सर्वश्रेष्ठ मधुरता है। यदि आप अच्छे लेखक बनना चाहते हैं, तो आपको वही वृत्ति ग्रहण करनी होगी। अच्छे-अच्छे ग्रंथों का खूब अध्ययन कीजिए और उनकी बातों पर मनन कीजिए। फिर आपकी रचनाओं में भी मधु का-सा माधुर्य आने लगेगा। कोई अच्छी उवित, कोई अच्छा विचार भले ही दूसरों से ग्रहण किया गया हो पर यदि यथेष्ट मनन कर आप उसे अपनी रचना में स्थान देंगे तो वह आपका हो जाएगा।

(क) इस गद्यांश का एक उचित शीर्षक बताओ।

उत्तर : इस गद्यांश का उचित शीर्षक लेखक और उसकी रचना।

(ख) अच्छा लेखक बनने के लिए क्या करना चाहिए ? 

उत्तर : अच्छा लेखक बनने के लिए मधुमक्खियों जैसा घूम-घूमकर संसार की अच्छी अच्छी बातों को संग्रह करना चाहिए।

(ग) दूसरों की उक्ति और विचार आपके कैसे बन सकते हैं ?

उत्तर : दूसरों की उक्ति और विचार जब अपने अनुभवों से प्रस्तुत करेंगे तो वह उदित अपना ही होगा।

(घ) लेखक का काम मधुमक्खियों से कैसे मिलता है ?

उत्तर : लेखक का काम मधुमक्खियों से इसलिए मिलता है जिस प्रकार मधुमक्खियाँ मकरंद संग्रह के लिए मिलो चक्कर लगाती है। उसी प्रकार लेखक उपनी लेखनी में भाषा, शैली, अलंकार से परिपूर्णकर अपनी रचनाओं को सर्वश्रेष्ठ कतने हैं।

12. निम्नलिखित में से किन्ही पाँच वाक्यों का हिन्दी में अनुवाद करो :

(a) Ram is a good boy.

उत्तर : राम एक अच्छा लड़का है । 

(b) He reads in class X (ten).

उत्तर : वह दसवीं कक्षा में पढ़ता है।

(c) He lives in Guwahati with his father. 

उत्तर : वह अपने पिता के साथ गोहाटी में रहता है।

(d) His father works in a factory. 

उत्तर : उसके पिता मिल में काम करते हैं।

(e) Assam is famous for tea production. 

उत्तर : असम चाय उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।

(f) Help the poor.

उत्तर : गरीब की सहायता करो।

(g) Always speak truth. 

उत्तर : सदा सत्य बोलो।

(h) Honesty is the best policy. 

उत्तर : ईमानदारी श्रेष्ठ उपाय है।

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