Class 12 Hindi Chapter 13 चार्ली चैप्लिन यानी हम सब

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Class 12 Hindi Chapter 13 चार्ली चैप्लिन यानी हम सब

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चार्ली चैप्लिन यानी हम सब

Chapter – 13

प्रश्नोत्तर

1. लेखक ने ऐसा क्यों कहा है कि अभी चैप्लिन पर करीब 50 वर्षों तक काफी कुछ जाएगा?

उत्तर: हास्य फिल्मों के महान अभिनेता और निर्देशक चार्ली चैप्लिन पर लिखे गए इस पाठ में लेखक ने चार्ली के कलाकर्म की कुछ मूलभूत विशेषताों को रेखांकित किया है। दो महायुद्धों के बाद विश्व सिनेमा ने जिस कौशल से नव-स्वतंत्र देशों का नैतिक भूगोल, औपनिवेशिक दासता का मानसिक अवक्षेपन आदि विषयों को बिंबित किया है, उसके विकास में चैप्लिन का बहुत बड़ा योगदान है। उस समय से ही चैप्लिन की कला दुनिया के सामने है और पाँच पीढ़ियों को मुग्ध कर चुकी है। आज भी चार्ली की फिल्में लाखों भारतीय बच्चों को हँसा रही हैं। इतना ही नहीं वे इन्हें अपने बुढ़ापे तक याद भी रखेंगे। पश्चिम में तो बार-बार चार्ली का पुनर्जीवन हो रहा है। चार्ली चैप्लिन की ऐसी कुछ फिल्में या इस्तेमाल न की गई रीलें भी मिलती हैं जिनके बारे में कोई जानता नहीं था। अत: उनकी विश्व सिनेमा में जो महत्वपूर्ण योगदान रहा हैं, उसको देखते हुए लेखक ने कहा है कि अभी चैप्लिन पर करीब 50 वर्षों तक काफी कुछ जाएगा।

2. चैप्लिन ने न सिर्फ फिल्म कला को लोकतांत्रिक बनाया बल्कि दर्शकों की वर्ग तथा वर्ण-व्यवस्था को तोड़ा। इस पंक्ति में लोकतांत्रिक बनाने का और वर्ण व्यवस्था तोड़ने का क्या अभिप्राय है? क्या आप इससे सहमत हैं?

उत्तर: चैप्लिन के फिल्म जगत में आने से पहले फ़िल्मों को एक वर्ग विशेष के लिए बनाया जाता था। लेकिन चैप्लिन ने अपनी फिल्मों में एक आम आदमी का प्रतिनिधित्व किया। वास्तविक अर्थ में उन्होंने फिल्म कला को लोकतांत्रिक बनाया। इतना ही नहीं उस समय लोगों के बीच जो वर्ण और वर्ग व्यवस्था थी उसे भी उन्होंने अपनी फिल्मों द्वारा तोड़ा। यहीं कारण है कि उनकी किमों को पागलखाने के मरीजों, विकल मस्तिष्क लोगों से लेकर आइन्स्टाइन जैसे महान प्रतिभा वाले व्यक्ति तक कहीं एक स्तर पर और सूक्ष्मतम रसास्वादन के साथ दिख पड़े है। चैप्लिन ने अपनी फिल्मों द्वारा यह दिखाने की कोशिश की है कि राजा और प्रजा दोनों एक समान है।

3. लेखक ने चार्ली का भारतीयकरण किसे कहा और क्यों? गाँधी और नेहरू ने भी उनका सान्निध्य क्यों चाहा?

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उत्तर: चार्ली चैप्लिन की फिल्मों से लोग काफी प्रभावित हो रहे थे, उनकी फिल्में लाखों भारतीय बच्चों को हँसा रही थी। चार्ली के नितांत ही अभारतीय सौंदर्यशास्त्र को इतनी व्यापक स्वीकृति देखकर राजकपूर ने भी भारतीय फिल्मों में सबसे पहले एक साहसिक प्रयोग किया। राजकपूर की फिल्म ‘आवारा’ चैप्लिन की फिल्म ‘दि ट्रेम्प’ का शब्दानुवाद ही नहीं बल्कि चार्ली का भारतीयकरण भी कहा जा सकता है।

लेखक ने राजकपूर की फिल्मों को चाल का भारतीय करण इसलिए भी कहा है, क्योंकि उनके ‘श्री420’, ‘आवारा’ के पहले फिल्मी नायकों पर हँसने की और स्वयं नायकों के अपने पर हँसने की परंपरा नहीं थी।

गाँधीजी तथा नेहरू चार्ली चैप्लिन की फिल्मों से काफी प्रभावित थे। समाज में कुछ लोगों को ‘ अमिताभ बच्चन’ या ‘ दिलीप कुमार’ कहकर ताना दिया जाता हैं, जबकि किसी भी व्यक्ति को परिस्थितियों का औचित्य देखते हुए ‘चार्ली’ या ‘जानी वॉकर’ कहा जाता, है। वास्तव में यह एक स्वीकारोक्ति है कि हमारे बीच नायक कम हैं जबकि हर व्यक्ति दूसरे को विदूषक समझता हैं। चार्ली ने अपनी फ़िल्मों में यह दिखाया है, कि मनुष्य स्वयं ईश्वर या नियति का विदूषक, क्लाउन, जोकर या साइड-किक है। चार्ली ने कला को जो सार्वजनिकता प्रदान किया था, उससे नेहरू तथा गाँधी दोनों ही प्रभावित थे। अतः दोनों ने चार्ली का सानिध्य चाहा था।

4. लेखक ने कलाकृति और रस के संदर्भ में किसे श्रेयस्कर माना है और क्यों ? क्या आप कुछ ऐसे उदाहरण दे सकते हैं, जहाँ कई रस साथ-साथ आए हों?

उत्तर: लेखक ने कलाकृति और रस में से रस को श्रेयस्कर माना हैं। रसों का कलाकृति के साथ पाया जाना श्रेयस्कर माना है। लेखक ने इसे श्रेयस्कर इसलिए माना हैं, क्योंकि आ जीवन में जिस प्रकार हर्ष और विषाद आते रहते है, उसी प्रकार कलाकृति में भिन्न रसों का होना आवश्यक है। भारतीय परंपराओं में करुणा का हास्य रस में परिवर्तित हो जाना नहीं दि मिलता है। रामायण और महाभारत में जो हास्य रस का प्रयोग हुआ है, वह ‘दूसरो’ पर है। और करुणा है, वह सद्व्यक्तियों या कभी-कभार दुष्टों के हुआ है। संस्कृत नाटकों में भी करुणा और हास्य रसों का सामंजस्य नहीं मिलता है। कई रसों का एक साथ आना कलाकृति को और भी मनमोहक बना देता है।

हमारे दैनिक जीवन में ऐसी कई घटनाएं घटित होती रहती है, जो कई रसों से परिपूर्ण होती है। कुछ उदाहरण नीचे दिए जा रहे है। एक बार हमारे स्कूल की ही आठवीं और नवीं • कक्षा के छात्रों के बीच क्रिकेट मैच चल रहा था। खेल पूरे रोमांच पर था। नवीं कक्षा के E छात्रों को जीतने के लिए चार रनों की आवश्यकता थी। सभी उन्हें उत्साहित कर रहे थे। तभी आठवीं कक्षा के छात्र ने आखिरी बोल फेंकी जो बल्ले में न लगकर बल्लेबाज के सिर पर लगी। गेंद इतनी जोरो से लगी की उसका सिर खून से लथपथ हो गया था। अचानक पूरा माहौल बदल गया। उसे अस्पताल पहुंचाया गया।

5. जीवन की जद्दोजहद ने चार्ली के व्यक्तित्व को कैसे संपन्न बनाया? 

उत्तर: जीवन में चार्ली को कई जद्दोजहद से गुजरना पड़ा। एक परित्यकता दूसरे दर्जे की स्टेज अभिनेत्री का बेटा होना, उसके बाद भयावह गरीबी से सामना करना पड़ा। उसके बाद उनकी माता के पागलपन से संघर्ष करना सम्राज्य, औद्योगिक क्रांति, पूंजीवाद तथा सामंतशाही से मगरूर समाज द्वारा दुरदुराया जाना इन सभी परिस्थितियों से चैप्लिन को वे जीवनमूल्य मिलें जो करोड़पति हो जाने के बावजूद भी अंत तक उनमें रहे। इन्हीं विषम परिस्थितियों ने उनके व्यक्तित्व को संपन्न बनाया।

6. चार्ली चैप्लिन की फिल्मों में निहित त्रासदी करुणा / हास्य का सामंजस्य भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र की परिधि में क्यों नहीं आता?

उत्तर : कई रसों का सामंजस्य एक साथ होना भारतीय कला और सौंदर्यशास्त्र की परिधि में नहीं आता है। महाभारत और रामायण में जो हास्य है वह दूसरों पर हैं। संस्कृत नाटकों में भी करुणा और हास्य का सामंजस्य नहीं मिलता है। अपने ऊपर हँसने और दूसरों में भी वैसा ही माद्वा पैदा करने की शक्ति भारतीय विदूषक में कुछ कम ही नजर आती है। अत: भारत में उनके इतने व्यापक स्वीकार का एक अलग सौंदर्यशास्त्रीय महत्व हैं।

7. चार्ली सबसे ज्यादा स्वयं पर कब हँसता है?

उत्तर: चार्ली स्वयं पर सबसे ज्यादा तब हँसता है, जब वह स्वयं को गर्वोन्मत, आत्मविश्वास से लवरेज, सफलता, सभ्यता, संस्कृति तथा समृद्धि की प्रतिमूर्ति, दूसरों से सों का ज्यादा शक्तिशाली तथा श्रेष्ठ अपने ‘बज्रादपि कठोराणि’ अथवा मृदुनि कुसुमादपि क्षण में ना नहीं दिखलाता है।

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