NIOS Class 12 Economics Chapter 25 राष्ट्रीय आय और इसका मापन

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NIOS Class 12 Economics Chapter 25 राष्ट्रीय आय और इसका मापन

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Chapter: 25

पाठगत प्रश्न 25 .1

1. नीचे दिए गए संकेतों से वाक्यांशों/शब्दों का प्रयोग कर रिक्त स्थानों को भरें (प्राथमिक क्षेत्रक, द्वितीयक क्षेत्रक, औद्योगिक क्षेत्रक, स्वउपभोग हेतु उत्पादन का मूल्य)।

(i) मत्स्य पालन __________ का घटक है।

उत्तर: प्राथमिक क्षेत्रक।

(ii) मूल्य वृद्धि विधि से राष्ट्रीय आय के आकलन में पहला कदम विभिन्न आर्थिक गतिविधियों पहचान तथा उनको उनकी प्रकृति के अनुसार अलग-अलग  __________ में वर्गीकरण करना है।

उत्तर: औद्योगिक क्षेत्रक।

(iii)  __________ उत्पादन के मूल्य के आकलन में सम्मिलित करना चाहिए।

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उत्तर: स्व-उपभोग हेतु उत्पादन।

(iv) परिवहन  __________ क्षेत्रक का भाग है।

उत्तर: तृतीयक।

पाठगत प्रश्न 25.2

1. रिक्त स्थान भरें-

(तृतीयक, पारिश्रमिक, अंतरण, निवेश, उपभोग)

(i) उपहार, दान, कर आदि  __________ भुगतान हैं।

उत्तर: अंतरण।

(ii)  __________ व्यय के लिए ऋणों पर ब्याज भुगतान साधन आय नहीं होता।

उत्तर: उपभोग।

(iii) गैर-नकद हितलाभ भी कर्मचारियों के  __________ का हिस्सा होता है।

उत्तर: पारिश्रमिक।

(iv) एक उत्पादक इकाई द्वारा फर्नीचर के खरीद पर व्यय  __________ का हिस्सा है।

उत्तर: निवेश।

(v) घरेलू नौकर रखना  __________ क्षेत्रक का अंग होगा।

उत्तर: तृतीयक।

पाठांत प्रश्न

1. राष्ट्रीय आय के चक्रीय प्रवाह की तीन अवस्थाएं समझाइए।

उत्तर: (i) अर्थव्यवस्था में राष्ट्रीय आय का प्रवाह तीन मूल अवस्थाओं में निरंतर चलता है – उत्पादन, आय और व्यय।

(ii) पहली अवस्था में विभिन्न उत्पादन-इकाइयाँ वस्तुओं और सेवाओं का उत्पादन करती हैं।

(iii) दूसरी अवस्था में उत्पादन के बदले उत्पादन-कारक—श्रम, पूँजी, भूमि एवं उद्यम—अपनी सेवाओं का प्रतिफल प्राप्त करते हैं, जिसे आय कहा जाता है।

(iv) तीसरी अवस्था में परिवार प्राप्त आय को वस्तुओं एवं सेवाओं की क्रय पर व्यय करते हैं।

(v) इस प्रकार उत्पादन से आय और आय से व्यय का यह चक्र बिना रुके चलता रहता है तथा यही राष्ट्रीय आय के चक्रीय प्रवाह को दर्शाता है।

2. प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रकों के स्वरूप और कार्य को समझाइए।

उत्तर: अर्थव्यवस्था की गतिविधियों को सामान्यतः तीन क्षेत्रकों में विभाजित किया जाता है: प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक।

(i) प्राथमिक क्षेत्र: इस क्षेत्र में वे गतिविधियाँ आती हैं जो सीधे प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर होती हैं, जैसे—कृषि, खनन, पशुपालन, मत्स्य-पालन आदि। इसका मुख्य कार्य उत्पादन के लिए आवश्यक कच्चे माल की आपूर्ति करना है।

(ii) द्वितीयक क्षेत्र: इस क्षेत्र में उद्योग और विनिर्माण से जुड़ी गतिविधियाँ सम्मिलित रहती हैं। यह क्षेत्र प्राथमिक क्षेत्र से प्राप्त कच्चे माल को तैयार माल में परिवर्तित करता है।

(iii) तृतीयक क्षेत्र: यह सेवा-आधारित क्षेत्र है जिसमें परिवहन, व्यापार, संचार, बैंकिंग, बीमा आदि की सेवाएँ शामिल हैं।

इसका मुख्य कार्य उत्पादन एवं वितरण प्रक्रिया को सुगम बनाना है।

3. मूल्य वृद्धि विधि से राष्ट्रीय आय के मापन के सोपानों को समझाइए।

उत्तर: मूल्य-वृद्धि विधि में राष्ट्रीय आय के मापन हेतु निम्न सोपान अपनाए जाते हैं:

(क) अर्थव्यवस्था को विभिन्न उत्पादनात्मक क्षेत्रों—प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक—में विभाजित किया जाता है।

(ख) प्रत्येक उत्पादन-इकाई की मूल्य-वृद्धि ज्ञात की जाती है – मूल्य-वृद्धि = उत्पादन का मूल्य – मध्यवर्ती उपभोग।

(ग) सभी क्षेत्रकों की मूल्य-वृद्धि को जोड़कर सकल घरेलू उत्पाद प्राप्त किया जाता है।

(घ) इसके बाद अप्रत्यक्ष करों को घटाकर और सब्सिडी को जोड़कर GDP at FC निकाला जाता है।

(ङ) अंत में विदेशों से प्राप्त शुद्ध कारक-आय को जोड़कर राष्ट्रीय आय प्राप्त की जाती है।

4. मूल्य वृद्धि विधि से राष्ट्रीय आय की गणना में क्या मुख्य सावधानियां आवश्यक हैं?

उत्तर: मूल्य-वृद्धि विधि से राष्ट्रीय आय का मापन करते समय निम्न सावधानियाँ आवश्यक हैं:

(क) मध्यवर्ती वस्तुओं को अंतिम वस्तुओं में सम्मिलित न किया जाए, ताकि दोहरी-गणना न हो।

(ख) स्व-उपभोग वस्तुओं तथा स्वामित्व-आवास का मूल्यांकन उचित रूप से किया जाए।

(ग) पुरानी वस्तुओं एवं वित्तीय परिसंपत्तियों के क्रय-विक्रय को उत्पादन में सम्मिलित न किया जाए।

(घ) मशीनीकरण एवं टिकाऊ वस्तुओं की पुनः-बिक्री को उत्पादन नहीं माना जाएगा।

(ङ) अवैध तथा गैर-पंजीकृत उत्पादन को राष्ट्रीय आय में सम्मिलित नहीं किया जाता।

5. आय वितरण विधि से राष्ट्रीय आय की गणना के सोपनों को समझाइए।

उत्तर: आय-वितरण विधि में राष्ट्रीय आय की गणना हेतु निम्न सोपान अपनाए जाते हैं:

(क) अर्थव्यवस्था के सभी उत्पादन-कारकों – श्रम, भूमि, पूँजी और उद्यम की पहचान की जाती है।

(ख) प्रत्येक क्षेत्र में उत्पादन-कारकों को दिए गए कारक-भुगतानों का आँकलन किया जाता है, जैसे – मजदूरी, किराया, ब्याज और लाभ।

(ग) विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त समस्त कारक-आयों को जोड़कर शुद्ध घरेलू उत्पाद प्राप्त किया जाता है।

(घ) विदेशों से प्राप्त शुद्ध कारक-आय को जोड़कर राष्ट्रीय आय की गणना की जाती है।

6. आय वितरण विधि से राष्ट्रीय आय की गणना में क्या मुख्य सावधानियां आवश्यक हैं?

उत्तर: आय-वितरण विधि से राष्ट्रीय आय की गणना करते समय निम्न सावधानियाँ आवश्यक हैं:

(क) केवल कारक-आय को शामिल किया जाए; पेंशन, छात्रवृत्ति, अनुदान जैसे अंतरण भुगतान शामिल न हों।

(ख) अवैध गतिविधियों से प्राप्त आय को राष्ट्रीय आय में सम्मिलित नहीं किया जाए।

(ग) स्व-रोज़गार व्यक्तियों की मिश्रित आय का सही अनुमान लगाया जाए।

(घ) उत्पादन से असंबंधित आय का अभिलेखन न किया जाए।

(ङ) मूल्यह्रास तथा अप्रत्यक्ष करों का उचित समायोजन किया जाए।

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