NCERT Class 9 Hindi Chapter 8 रैदास के पद

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NCERT Class 9 Hindi Chapter 8 रैदास के पद

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Chapter: 8

काव्य खंड
अभ्यास

रचना से संवाद

मेरे उत्तर मेरे तर्क

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

1. “अब कैसे छूटै राम रट लागी” पंक्ति का भाव है?

(क) नाम उच्चारण की कठिनाई।

(ख) नाम रटकर याद करना।

(ग) आराध्य का नाम जपना।

(घ) मित्रों का नाम रटना।

उत्तर: (ग) आराध्य का नाम जपना।

कारण: “राम रट लागी” का अर्थ है कि कवि को अपने आराध्य भगवान राम के नाम का स्मरण करने (जपने) की गहरी लगन लग गई है, जो अब किसी भी तरह से छूट नहीं सकती।

2. “प्रभु जी तुम चंदन हम पानी” पंक्ति में आराध्य और भक्त का संबंध किस रूप में व्यक्त हुआ है?

(क) एकाकार और समरूप।

(ख) तरल और तीव्र सुगंध।

(ग) आश्रय और आश्रित।

(घ) द्रव और ठोस।

उत्तर: (क) एकाकार और समरूप।

कारण: जिस प्रकार पानी में चंदन घिसने से पानी और चंदन एकाकार हो जाते हैं और चंदन की सुगंध पानी के कण-कण में समा जाती है (“जाकी अंग-अंग बास समानी”), उसी प्रकार भक्त और भगवान का संबंध अटूट और एकाकार हो जाता है।

3. “तुम दीपक, हम बाती” से रैदास का क्या भाव है?

(क) दीपक और बाती का कोई मेल नहीं होता है।

(ख) दीपक बिना बाती भी जल सकता है।

(ग) भक्त आराध्य से अधिक महत्त्वपूर्ण है।

(घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।

उत्तर: (घ) भक्त का आराध्य से मेल जीवन को आलोकित करता है।

कारण: दीपक और बाती मिलकर ही प्रकाश (ज्योति) फैलाते हैं (“जाकी जोति बरै दिन राती”)। रैदास स्वयं को बाती और भगवान को दीपक मानते हैं, जिनके मिलन से ही भक्त के जीवन में ज्ञान और भक्ति का प्रकाश निरंतर जलता रहता है।

4. “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” पंक्ति में रैदास का क्या आशय है?

(क) परोपकारी भक्ति भाव।

(ख) आराध्य से अटूट संबंध।

(ग) सांसारिक मोह।

(घ) कर्मकांड पर बल।

उत्तर: (ख) आराध्य से अटूट संबंध।

कारण: इस पंक्ति में रैदास अपने आराध्य से कहते हैं कि यदि आप मुझसे नाता तोड़ भी लें, तब भी मैं यह संबंध नहीं तोडूंगा (“तुम सौ तोरि कवन सौं जोरौ”)। यह भक्त और भगवान के बीच निष्ठा और अटूट संबंध को दर्शाता है।

5. “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा” पंक्ति से आप क्या समझते हैं?

(क) तीर्थ और व्रत आवश्यक नहीं हैं।

(ख) तीर्थ और व्रत सब आवश्यक हैं।

(ग) तीर्थ जाने से मुक्ति निश्चित है।

(घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।

उत्तर: (घ) आराध्य के चरणों में सच्चा आश्रय है।

कारण: रैदास स्पष्ट करते हैं कि वे बाहरी आडंबरों जैसे तीर्थ यात्रा या व्रत रखने की चिंता (अंदेसा) नहीं करते, क्योंकि उनका एकमात्र सच्चा भरोसा और आश्रय अपने आराध्य के चरण-कमलों में है (“तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां”)।

6. सर्वव्यापक ईश्वर की अवधारणा किस पंक्ति में व्यक्त होती है?

(क) “जहँ जहँ जाओ तुम्हारी पूजा”।

(ख) “जाकी जोति बरै दिन राती”।

(ग) “तुम दीपक, हम बाती”।

(घ) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा”।

उत्तर: (क) “जहँ जहँ जाओ तुम्हारी पूजा”।

कारण: इस पंक्ति का अर्थ है कि भक्त जहाँ कहीं भी जाता है, वहाँ उसे ईश्वर विद्यमान मिलते हैं और वह उन्हीं की आराधना करता है। यह पंक्ति स्पष्ट रूप से ईश्वर के कण-कण में विद्यमान होने (सर्वव्यापकता) को दर्शाती है।

अर्थ और भाव

1. नीचे दी गई पंक्तियों का अर्थ समझाते हुए भाव स्पष्ट कीजिए।

(क) “प्रभु जी तुम घन बन, हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा।”

उत्तर: अर्थ: हे प्रभु! यदि आप आकाश में छाए हुए घने काले बादल (घन) हैं, तो मैं जंगल (बन) का वह मोर हूँ जो आपको देखकर खुशी से नाच उठता है। जिस प्रकार चकोर पक्षी अपने प्रिय चंद्रमा को एकटक निहारता रहता है, ठीक उसी प्रकार मैं भी निरंतर आपके दर्शन की चाह में आपको ही देखता रहता हूँ।

भाव: इन पंक्तियों में कवि रैदास जी ने आराध्य (ईश्वर) और भक्त के बीच के अटूट संबंध को प्रकृति के सुंदर उदाहरणों (बादल-मोर और चाँद-चकोर) से दर्शाया है। इसका मूल भाव भगवान के प्रति अनन्य भक्ति और पूर्ण समर्पण है, जिसमें यह बताया गया है कि भक्त किसी भी हाल में अपने ईश्वर से अलग नहीं रह सकता।

(ख) “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां।”

उत्तर: अर्थ: हे ईश्वर! मुझे अब किसी भी तीर्थ यात्रा पर जाने या कोई व्रत रखने की कोई चिंता, आशंका या दुविधा (अंदेसा) नहीं है। मुझे इन सब बाहरी चीज़ों की आवश्यकता नहीं है क्योंकि मेरा एकमात्र और पक्का भरोसा केवल आपके चरण-कमलों में ही है।

भाव: इस पंक्ति का भाव यह है कि सच्ची भक्ति बाहरी दिखावे या आडंबरों (जैसे तीर्थ और व्रत) में नहीं है। इसमें ईश्वर के चरणों के प्रति भक्त की सच्ची निष्ठा, अटूट विश्वास और अडिग भक्ति के भाव को बड़ी ही सरलता से प्रकट किया गया है।

मेरी समझ मेरे विचार

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए—

1. “जो तुम तोरौ राम मैं नहिं तोरौ” पंक्ति में रैदास की अपने आराध्य में अटूट निष्ठा का भाव है। इससे आप क्या समझते हैं? विस्तार से लिखिए।

उत्तर: इस पंक्ति का अर्थ है कि भक्त रैदास का अपने भगवान के प्रति प्रेम और विश्वास इतना गहरा और पक्का है कि वह किसी भी परिस्थिति में समाप्त होने वाला नहीं है। रैदास जी अपने आराध्य से कहते हैं कि हे राम! यदि आप मुझसे अपना नाता (संबंध) तोड़ भी लें, तब भी मैं आपसे अपना नाता कभी नहीं तोडूंगा, क्योंकि आपको छोड़कर मैं और किससे जाकर रिश्ता जोड़ूँ। इससे यह समझ में आता है कि एक सच्चा भक्त ईश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पित होता है। भले ही ईश्वर उसकी परीक्षा लें या उसे दूर कर दें, लेकिन भक्त कभी अपने आराध्य का आश्रय नहीं छोड़ सकता क्योंकि इस पूरे संसार में भगवान के अलावा उसका कोई दूसरा सच्चा हितैषी और रक्षक नहीं है।

2. रैदास ने तीर्थ और व्रत के स्थान पर किस साधन को भक्ति का प्रमुख आधार माना है? आपके विचार से भक्ति के क्या आधार हो सकते हैं?

उत्तर: रैदास जी ने बाहरी आडंबरों, जैसे— तीर्थ यात्रा करना या तरह-तरह के व्रत (उपवास) रखने के स्थान पर ईश्वर के ‘चरण-कमलों’ में पक्के विश्वास और समर्पण को भक्ति का प्रमुख आधार माना है। वे स्पष्ट कहते हैं कि “तीरथ बरत न करूँ अंदेसा, तुम्हरे चरन कमल एक भरोसां,” अर्थात् वे तीर्थ और व्रत की चिंता छोड़कर केवल ईश्वर के चरणों में अपना सच्चा आश्रय ढूँढ़ते हैं। भगवान से अपने मन को जोड़ना ही उनके लिए सबसे बड़ी आराधना है।

भक्ति के आधार (मेरे विचार से): मेरे विचार से सच्ची भक्ति का आधार पवित्र मन, निस्वार्थ प्रेम और पूर्ण समर्पण होना चाहिए। भक्ति के लिए बाहरी दिखावे (तीर्थ, व्रत, कर्मकांड) से ज़्यादा ज़रूरी यह है कि इंसान मन, वचन और कर्म से शुद्ध हो, सर्वव्यापक ईश्वर पर विश्वास रखे और संसार के हर प्राणी में ईश्वर का रूप देखे।

3. दोनों पदों में भक्त और आराध्य के संबंध को किन-किन प्रतीकों/उपमाओं से व्यक्त किया गया है? लिखिए।

उत्तर: कवि रैदास जी ने अपने पदों में भक्त और आराध्य (ईश्वर) के कभी न टूटने वाले संबंध को दर्शाने के लिए प्रकृति और दैनिक जीवन के कई सुंदर प्रतीकों व उपमाओं का प्रयोग किया है।

ये प्रतीक निम्नलिखित हैं:

(i) चंदन और पानी: ईश्वर चंदन हैं और भक्त पानी, जिसमें चंदन की सुगंध मिल जाती है।

(ii) घन (बादल) और मोर: ईश्वर काले घने बादल हैं और भक्त उन्हें देखकर खुश होने वाला मोर है।

(iii) चाँद और चकोर: ईश्वर चंद्रमा हैं और भक्त उसे एकटक निहारने वाला चकोर पक्षी है।

(iv) दीपक और बाती: ईश्वर दीपक हैं और भक्त उसमें जलने वाली बाती है।

(v) मोती और धागा: ईश्वर बहुमूल्य मोती हैं और भक्त उन्हें पिरोने वाला धागा है।

(vi) सोना और सुहागा: ईश्वर सोना हैं और भक्त उसमें निखार लाने वाला सुहागा है।

(vii) स्वामी और दास: ईश्वर मालिक (स्वामी) हैं और भक्त उनका सेवक (दास) है।

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