Class 9 Ambar Bhag 1 Chapter 9 दु:ख

Join Telegram channel

Class 9 Ambar Bhag 1 Chapter 9 दु:ख answer to each chapter is provided in the list so that you can easily browse throughout different chapter Assam Board Class 9 Hindi Ambar Bhag 1 Chapter 9 दु:ख and select needs one.

Class 9 Hindi (MIL) Ambar Bhag 1 Chapter 9 दु:ख

Also, you can read the SCERT book online in these sections Solutions by Expert Teachers as per SCERT (CBSE) Book guidelines. These solutions are part of SCERT All Subject Solutions. Here we have given Assam Board Class 9 Ambar Bhag 1 Chapter 9 दु:ख Solutions for All Subject, You can practice these here…

दु:ख

पाठ – 9

Group – A: गद्य खंड

लेखक – परिचय:

यशपाल जी एक प्रसिद्ध कहानीकार रहे हैं। श्रेष्ठ कहानीकारों में प्रेमचन्द के बाद सबसे महत्वपूर्ण स्थान यशपाल जी को प्राप्त है। आपका जन्म सन् 1903 में फिरोजपुर छावनी में हुआ था। आपने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा स्थानीय विद्यालय से ही प्राप्त की। बाद में आपने लाहौर से उच्च शिक्षा ग्रहण की। आपने स्वतंत्रता आन्दोलन में भी सक्रिय रूप से भाग लिया तथा अमर शहीद भगत सिंह के साथ मिलकर अपनी मातृभूमि को आजाद कराने के लिए निरन्तर संघर्ष किया। आपने कई वर्षों तक ‘विप्लव’ नामक पत्रिका का सफल सम्पादन भी किया। सन् 1977 में आपका स्वर्गवास हो गया।

यशपाल जी ने कई रचनाएँ की हैं। आपके द्वारा लिखित उपन्यासों में ‘देशद्रोही’, ‘दादा कामरेड’, ‘झूठा सच’, ‘दिव्या’ और ‘तेरी–मेरी उसकी बात’ प्रमुख हैं। उनके कहानी संग्रहों में ‘ज्ञानदान’, ‘तर्क का तूफान’, ‘पिजड़े की उड़ान’, ‘फूलों का कुर्ता’ और ‘उत्तराधिकारी’ विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। आपकी आत्मकथा सिंहावलोकन के नाम से जानी जाती है। आपकी भाषा प्रसादयुक्त और शैली कलात्मक है। आपकी कहानियों में एक ओर मन की कोमल एवं यथार्थ अनुभूतियों का वर्णन मिलता है तो दूसरी ओर वास्तविक तथ्यों का भी चित्रण प्राप्त होता है। आपको “तेरी–मेरी उसकी बात” नामक उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

प्रस्तुत पाठ ‘दुःख’ एक भावना–प्रधान कहानी है। यह कहानी मानव–मन की यथार्थ अनुभूतियों पर आधारित है। कहानीकार यशपाल जी ने दुःख के बनावटी एवं स्वाभाविक स्वरूप का बड़े ही रोचक ढंग से वर्णन किया है। इससे कहानीकार की सूक्ष्म–दृष्टि एवं गंभीर चिन्तन–शक्ति का परिचय मिलता है।

लेखक–संबंधी प्रशव एवं उत्तर:

7. यशपाल जी ने किसके साथ स्वतंत्रता–आन्दोलन में काम किया था? 

उत्तर: यशपाल जी ने अमर शहीद भगत सिंह के साथ स्वतंत्रता–आन्दोलन में काम किया था।

2. यशपाल जी का जन्म कब और कहाँ हुआ था? 

उत्तर: यशपाल जी का जन्म सन् 1903 में फिरोजपुर छावनी में हुआ था।

3. यशपाल जी का स्वर्गवास कब हुआ?

उत्तर: यशपाल जी का स्वर्गवास सन् 1977 में हुआ।

4. यशपाल जी की प्रारंभिक शिक्षा कहाँ हुई थी? 

उत्तर: यशपाल जी की प्रारंभिक शिक्षा स्थानीय विद्यालय में हुई थी।

5. यशपाल जी ने अपनी उच्च शिक्षा कहाँ से ग्रहण की? 

उत्तर: यशपाल जी ने अपनी उच्च शिक्षा लाहौर से ग्रहण की।

6. यशपाल जी के विचार कैसे थे?

उत्तर: यशपाल जी के विचार क्रान्तिकारी थे।

7. यशपाल जी किस पत्रिका के संपादक थे? 

उत्तर: यशपाल जी ‘विप्लव’ नामक पत्रिका के संपादक थे।

8. यशपाल जी द्वारा लिखित कहानी संग्रह में कौन–कौन से नाम आते हैं?

उत्तर: यशपाल जी द्वारा लिखित कहानी संग्रह में क्रमश: ‘ज्ञानदान’, ‘तर्क का तूफान’, ‘पिजड़े की उड़ान’, ‘फूलों का कुर्ता’ तथा ‘उत्तराधिकारी’ के नाम आते हैं।

9. ‘सिंहावलोकन’ क्या है?

उत्तर: ‘सिंहावलोकन’ यशपाल जी की आत्मकथा है।

10. यशपाल जी को किस पुरस्कार से सम्मानित किया गया था? 

उत्तर: यशपाल जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

11. यशपाल जी को किस रचना के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था?

उत्तर: यशपाल जी को उनकी रचना ‘तेरी–मेरी उसकी बात’ नामक उपन्यास के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

12. यशपाल जी द्वारा रचित उपन्यासों में कौन–कौन से नाम आते हैं?

उत्तर: यशपाल जी द्वारा रचित उपन्यासों में क्रमशः ‘देशद्रोही’, ‘दादा कामरेड’, ‘झूठा सच’, ‘तेरी मेरी उसकी बात’ और ‘दिव्या’ के नाम आते हैं।

13. दुःख किस प्रकार की कहानी है?

उत्तर: ‘दुःख’ एक भावना–प्रधान कहानी है। इसका आधार मानव–मन की यथार्थ अनुभूतियाँ हैं।

14. ‘दुःख’ शीर्षक कहानी का मुख्य उद्देश्य क्या है? 

उत्तर: ‘दुःख’ के बनावटी एवं स्वाभाविक स्वरूप को चित्रित करना ही ‘दुःख’ शीर्षक कहानी का मुख्य उददेश्य है।

सारांश:

‘दुःख’ एक भावना–प्रधान कहानी है। यह मानव–मन की कोमल अनुभूतियों पर आधारित है। इसके लेखक प्रसिद्ध कहानीकार यशपाल जी हैं। यशपाल जी ने इसमें दुःख के बनावटी एवं स्वाभाविक स्वरूप को बड़ी सूक्ष्मता तथा सजीवता के साथ चित्रित किया है।

दिलीप इस कहानी का नायक है। हेमा उसकी धर्मपत्नी है। दिलीप हेमा का बहुत सम्मान करता है। वह उसके प्रति हृदय से अनुरक्त है। उसने उसे पूर्ण स्वतंत्रता दे रखी है। एक दिन दिलीप के उसकी सहेली के साथ सिनेमा देख आने के कारण हेमा रूठ जाती है। वह दिनभर रूठी रहकर अगले दिन अपने मायके चली जाती है। हेमा के इस व्यवहार से दिलीप का दिल टूट जाता है। उसका मन वितृष्णा से भर जाता है। वह स्वयं को अपमानित और तिरस्कृत समझता है।

सितम्बर का अन्तिम सप्ताह है। वर्षा ऋतु बीत जाने पर भी उस दिन दिनभर बारिश होती है। दिलीप चुपचाप बैठकखाने में बैठ जाता है। वितृष्णा और ग्लानि में समय गुजारना मुश्किल हो जाता है। समय बिताने के लिए वह सोने का असफल प्रयत्न करता है। इसी बीच उसका भाई उससे मोटरसाइकिल ले जाने की अनुमति माँगता है। दिलीप इशारे से उसे अनुमति दे देता है। तभी दीवार पर टँगी पड़ी शाम के छह बज जाने की सूचना देती है। बारिश भी थम जाती है। किसी के आने और कोई अप्रिय चर्चा प्रारम्भ करने के भय से वह भाई को साइकिल लेकर गली की कीचड़ तथा लोगों की निगाहों से छिपता हुआ मिंटो पार्क पहुँच जाता है। अपने अशान्त मन को शान्त करने के उददेश्य से वह सिर से अपनी टोपी उतारकर एक बेंच पर लेट जाता है और ख्यालों में डूब जाता है। वह सोचता है कि सर्दी की इस रात में यदि ठंड लग जाने से वह बीमार हो जाए तो वह शहीद की तरह चुपचाप अपने दुःख को अकेला ही सह लेगा। एक दिन मृत्यु दबे पाँव आएगी और उसको हमेशा के लिए शांत कर चली जाएगी। उस दिन हेमा अपने व्यवहार के लिए पछताएगी। हेमा के लिए यही उचित प्रतिशोध होगा।

इस प्रकार स्वयं से ही अन्याय के प्रतिकार की एक संभावना देख उसका मन हल्का हो जाता है। समीप के मुख्य रेलवे लाइन से तूफान वेग से तीव्र कोलाहल करती हुई फ्रंटियर मेल के गुजरने से वह समझ जाता है कि रात के साढ़े नौ बज चुके हैं। वह घर लौटने के लिए पैदल ही पैदल चलकर भाटी दरवाजे पहुँचता है। कुछ कदम आगे बढ़ने पर उसे एक लड़का दिखाई देता है जो उस सुनसान सड़क पर खोमचा बेचने के लिए बैठा हुआ है। दिलीप सर्द हवा में सिकुड़कर बैठे उस लड़के के पास जाता है। उससे बातचीत करके दिलीप को उसकी आर्थिक बदहाली का आभास हो जाता है। वह एक रुपया देकर सारा सौदा (खोमचा) खरीद लेता है। लड़का खोमचे का टोटल मूल्य आठ पैसे बताता है। किन्तु उसके पास लौटाने के लिए पैसे नहीं होते। लड़के से यह जानकर कि उसका घर पास ही गली में है, दिलीप के मन में उसका घर देखने का कौतूहल जाग उठता है। दिलीप बाइसाइकिल को थामे लड़के के साथ चल देता है। रास्ते में लड़के से बातचीत के क्रम में वह उसकी पारिवारिक स्थिति को भी जान जाता है। 

लड़के के घर को बदहाली तथा उसको भूखी माँ की दर्दभरी दास्तान सुनकर दिलीप का हृदय द्रवित हो जाता है। उसका मन हमदर्दी और सहानुभूति से भर जाता है। लड़के की माँ के पास भी दिलीप को लौटाने के लिए पैसे नहीं होते। इसलिए वह पैसा रखना नहीं चाहती है। किन्तु अन्त में दिलीप के अनुनय पर बच्चे के मिठाई खाने के नाम पर पैसा रख लेती है। वह बेटे को सूखी रोटी खिलाकर स्वयं भूखे पेट सो जाती है। दिलीप के लिए और कुछ देख पाना संभव नहीं होता। वह दाँतों से होंठ दबा घर लौट आता है। मिट्टी के तेल की ढिबरी के प्रकाश में देखा वह दृश्य तथा भूखी माँ का वह वास्तविक दुःख उसकी आँखों से ओझल नहीं होता। उसे हेमा का दुःख बनावटी लगने लगता है। तभी दिलीप का छोटा भाई हेमा का एक पत्र उसे देता है। वह पत्र की पहली लाइन पढ़कर उसे फाड़कर फेंक देता है। पत्र की पहली पंक्ति है–’मैं इस जीवन में दुःख ही देखने के लिए पैदा हुई हूँ ….’। दिलीप को वास्तविक दुःख की अनुभूति हो जाती है। वह समझ जाता है कि हेमा जिसे दुःख कह रही है वह वास्तविक नहीं बल्कि बनावटी दुःख है। इसलिए वह कहता है: ‘काश ! तुम जानती, दुःख किसे कहते हैं। …. तुम्हारा यह रसीला दुःख तुम्हें न मिले ”तो जिन्दगी दूभर हो जाए’।

शब्दार्थ:

सर्वापेक्षा : (सर्व + अपेक्षा) = अधिक अपेक्षा करना

तिरस्कार : अनादर, अपमान

वितृष्णा : विरक्ति, विराग

अनुरक्त : आसक्त, अधिक चाहनेवाला

क्षोभ : क्रोध, अस्थिरता, दुःख

ग्लानि : पशचात्ताप, खेद

यातना : दुःख, कष्ट

विघ्न : बाधा

पछवा : पशचम की ओर से बहनेवाली हवा

व्याकुलता : बेचैनी

व्यथा : दुःख, दर्द

सांत्वना देना : सहानुभूति दिखाना

फर्लांग : दूरी मापने की एक छोटी इकाई, जो अब प्रचलित नहीं है (अभी दूरी को हम मील अथवा किलोमीटर में मापते हैं)

कोलाहल : शोर, हल्ला–गुल्ला

शैथिल्य : शिथिलता

निष्काम : इच्छाहीन, बिना किसी कामना या अभिलाषा के

निर्विकार : दोष रहित, विकार रहित

अदभुत : अनोखा, विचित्र

निरन्तर : लगातार, अनवरत

शवेत : सफेद

क्षुद्र : छोटा

ढिबरी : दीपक के काम आनेवाली टीन, शीशे, मिट्टी आदि की बनी डिबिया

तराजू : वस्तुएँ तौलने का एक उपकरण

सौदा : वस्तु बेचे जाने वाले सामान

महाब्राह्मण : ब्राह्मणों की एक विशेष शाखा जो लोगों के श्राद्ध आदि कार्य सम्पन्न कराते हैं।

क्षीणकाय : दुबली–पतली

विस्मय : आशचर्य

रसीला : रसदार

अंगोछा : गमछा, देह पोंछने का कपड़ा

दूभर : कठिन, भारी, असह्य

लिफाफा : कागज का थैला जिसमें चिठ्ठियाँ इत्यादि रखकर भेजते हैं

विद्रूपता : मुँह की विरूपता

खींझना : झुंझलाना, क्रुद्ध होना

भद्रपुरुष : भला आदमी, शरीफ

माथे पर बल पड़ना : चेहरे से रोप, अप्रसन्नता प्रकट होना

अनिच्छा : इच्छा का न होना

दाँतों से होंठ दबाना : क्रोध, रोष प्रकट करना

ऐंठना : मरोड़, घुमाव देना, बल पड़ना

रूखी : सूखा, नीरस, कठोर

पुलकित : खुश, प्रसन्न

रीझना : खुश होना, मोहित होना

मुरझाना : सूखने लगना, कुम्हलाना

कुम्हलाना : मुरझाना, सूखने लगना

ईंधन : जलावन, जलाने की लकड़ी

धुंधला : धुएँ के रंग का, अस्पष्ट

द्रवित : पिघला हुआ

प्रफुल्लता : खुशी, प्रसन्नता

सौदागर : व्यापारी

पाठयपुस्तक संबंधित प्रशन एवं उत्तर:

बोध एवं विचार:

1. सही विकल्प का चयन कीजिए:

(क) दिलीप अपने भाई की साइकिल लेकर कहाँ पहुँचा?

(i) डलहौजी पार्क।

(ii) मिन्टो पार्क।

(iii) गाँधी पार्क।

(iv) राजाजी पार्क।

उत्तर: (ii) मिन्टो पार्क।

(ख) लगातार फर्स्ट और सेकेंड क्लास के डिब्बों से निकलने वाले तीव्र प्रकाश से दिलीप समझ गया कि:

(i) पंजाब मेल जा रही है।

(ii) कालका एक्सप्रेस जा रही है।

(iii) फ्रंटियर मेल जा रही है।

(iv) ब्रह्मपुत्र मेल जा रही है।

उत्तर: (ii) फ्रंटियर मेल जा रही है।

(ग) लड़के के मुख पर खोमचा बेचनेवालों की चतुरता न थी, बल्कि उसकी जगह थी एक–

(i) कायरता।

(ii) उदारता।

(iii) प्रसन्नता।

(iv) उदासीनता।

उत्तर: (i) कायरता।

(घ) “मैं इस जीवन में दुःख ही देखने के लिए पैदा हुई हूँ”। यह उक्ति है–

(i) बच्चे की माँ की।

(ii) जगतू की माँ की।

(iii) हेमा की।

(iv) रम्भा की।

उत्तर: (ii) हेमा की।

2. निम्नलिखित प्रशनों के उत्तर एक वाक्य में दीजिए:

(क) दिलीप क्यों दुःखी था?

उत्तर: अपनी पत्नी हेमा की सहेली के साथ सिनेमा देख आने के कारण हेमा दिनभर रूठी रहकर दूसरे दिन अपनी माँ के घर चली गयी थी। दिलीप हेमा के इस व्यवहार से दुःखी था।

(ख) समय न बीतता देख दिलीप ने क्या प्रयत्न किया? 

उत्तर: समय न बीतता देख दिलीप ने खीझकर सो जाने का प्रयत्न किया।

(ग) छोटे भाई ने दिलीप से किस बात की अनुमति माँगी? 

उत्तर: छोटे भाई ने दिलीप से मोटरसाइकिल ले जाने की अनुमति माँगी।

(घ) लड़के की माँ क्या काम करती थी? 

उत्तर: लड़के की माँ एक बाबू के यहाँ चौका–बर्तन करती थी।

3. निम्नलिखित प्रशनों के संक्षिप्त उत्तर दीजिए: 

(क) ‘दुःख’ कहानी के नायक दिलीप को अपने घर का दुःख क्यों बनावटी–सा लगने लगा?

उत्तर: खोमचेवाले लड़के, उसकी भूखी माँ तथा उसके घर की बदहाली को देखकर दिलीप को अपने घर का दुःख बनावटी–सा लगने लगा। अपनी आँखों से उनकी दयनीय अवस्था को देखकर दिलीप को वास्तविक दुःख की अनुभूति हुई। लड़के और उसकी भूखी माँ का दुःख वास्तविक था जबकि उसकी पत्नी हेमा का दुःख बनावटी था।

(ख) ‘दुःख’ कहानी का मूल उददेश्य क्या है, स्पष्ट कीजिए। 

उत्तर: ‘दुःख हृदय की कोमल अनुभूतियों पर आधारित एक भावना–प्रधान कहानी है। दुःख के बनावटी एवं स्वाभाविक स्वरूप को चित्रित करना ही इस कहानी का मूल उददेश्य है। कहानीकार ने हेमा तथा भूखी माँ के दुःख के माध्यम से अपने उददेश्य को सार्थक बनाने में पूर्ण सफलता प्राप्त की है। इसमें कहानी के नायक दिलीप की पत्नी हेमा के दुःख को बनावटी तथा भूखी माँ के दुःख को स्वाभाविक दुःख के रूप में चित्रित किया गया है। हेमा का बनावटी दुःख पाठकों को प्रभावित नहीं करता। किन्तु भूखी माँ का वास्तविक दुःख पाठकों को उसको शोचनीय अवस्था पर सोचने के लिए विवश करता है।

(ग) “इस जीवन में दुःख झेलने के लिए पैदा हुई हूँ”–हेमा ने ऐसा क्यों कहा? 

उत्तर: “इस जीवन में दुःख झेलने के लिए पैदा हुई हँ” यह कथन ‘दुःख’ कहानी के नायक दिलीप की पत्नी हेमा का है। अपने बनावटी दुःख को व्यक्त करने के उददेश्य से हेमा ने ऐसा कहा है। 

हेमा के इस दुःख का कारण दिलीप का उसकी सहेली के साथ सिनेमा देखने जाना है। इस छोटी–सी बात पर वह रूठ जाती है और अपने मायके चली जाती है। वह इसे दुःख मान रही है। जबकि वह स्वयं इस दुःख का मूल कारण है। उसने स्वयं इस दुःख को आमन्त्रित किया है। इसलिए उसका यह दुःख बनावटी है। उसे वास्तविक दुःख की अनुभूति नहीं है।

(घ) हेमा की चारित्रिक विशेषताएँ बताइए। 

उत्तर: हेमा ‘दुःख’ कहानी के नायक दिलीप की धर्मपत्नी है। स्वतंत्र जीवन–शैली, स्वच्छन्द आचरण, शंकालु स्वभाव तथा छोटी–छोटी बात पर रूठना आदि उसके चरित्र की मुख्य विशेषताएँ हैं। उसे अपने प्यार पर विश्वास नहीं है। दिलीप के उसकी सहेली के साथ सिनेमा देख आने के कारण वह रूठ जाती है और दिनभर रूठी रहकर अगले दिन अपने मायके चली जाती है। उसका यह आचरण उसकी उक्त चारित्रिक विशेषताओं का सूचक है। दिलीप उसके प्रति हृदय से अनुरक्त है। वह उससे बेहद प्यार करता है। हेमा के इस व्यवहार से उसे बेहद दुःख होता है। वह स्वयं को अपमानित और तिरस्कृत समझता है। उसका मन वितृष्णा से भर जाता है। परन्तु हेमा को अपने इस आचरण पर कोई पछतावा नहीं होता। वह इसे अपना दुःख मान लेती है। उसका यह मनोभाव कहानी के अंत में उसके द्वारा दिलीप को लिखित एक पत्र में पूरी तरह प्रकट हो जाता है।

4. आशय स्पष्ट कीजिए:

“मनुष्य–मनुष्य में कितना भेद होता है। किन्तु मनुष्यत्व एक चीज है, जो कभी–कभी भेद की सब दीवारों को लाँघ जाती है।”

उत्तर: ईश्वर की सृष्टि विचित्र है। यहाँ विभिन्न प्रकार के लोग रहते हैं। किन्तु जाति, धर्म, रूप–रंग तथा आकृति आदि से सभी एक–दूसरे से भिन्न हैं। किसी का किसी के साथ कोई मेल नहीं। परन्तु इन मनुष्यों में मनुष्वत्य अर्थात् मानवता नामक एक ऐसी चीज है, जो सभी को एक मंच पर लाकर खड़ी कर देती है। हृदय में मानवता की भावना जागृत होते ही लोग भेद की सभी दीवारों को लाँघकर एक–दूसरे के प्रति खींचे चले आते हैं। सारे भेदों को भुलाकर एक–दूसरे के सुख–दुःख में सम्मिलित होते हैं। मनुष्यत्य की इसी भावना से प्रेरित होकर कहानी का नायक दिलीप भी भेद की सब दीवारों को लाँघकर सिर्फ खोमचेवाले उस गरीब, असहाय लड़के के पास ही नहीं जाता, बल्कि अँधेरी रात में पानी और कीचड़ भरे संकरे रास्ते से गुजरता हुआ उसके घर पहुँच जाता है।

भाषा एवं व्याकरण:

1. कोष्ठक में दिए गए शब्दों से भाववाचक संज्ञा बनाकर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:

(क) ठंड से बचने के लिए लड़के ने अपनी _______ तेज कर दी। (चलना)

(ख) राहुल की _______ साफ है। (लिखना)

(ग) कुतुबमीनार की _______ अधिक है। (ऊँचा)

(घ) आजकल _______ पाना बहुत कठिन है। (नौकर) 

(ङ) जब मैं विनीत के घर पहुँचा, वह दीवार की _______ कर रहा था। (पोतना)

(च) इस कमरे की _______ सुन्दर है।(सजाना)

(छ) कारगिल की ________ में भारतीय सिपाहियों ने बड़ी वीरता दिखाई। (लड़ना)

(ज) हवाई पट्टी से साथ कई हवाई जहाज ________ भर रहे थे।(उड़ना)

(झ) 200 मीटर ________ में रोहित को प्रथम स्थान मिला। (दौड़ना )

(अ) उसने दो मित्रों के बीच ________ घोल दी (कड़वा )

उत्तर: (क) चाल।

(ख) लिखावट।

(ग) ऊंचाई।

(घ) नौकरी।

(ङ) पोताई।

(च) सजावट।

(छ) लड़ाई।

(ज) उड़ान।

(झ) दौड़।

(ञ) कड़वाहट।

2. निम्नलिखित शब्दों की सहायता से रिक्त स्थानों को भरिए:

प्रेमपूर्वक, नियमपूर्वक, जल्दी, अचानक, ऊँचा, झटपट, सावधानी से, ध्यानपूर्वक, धीरे, प्यार से, दूर–दूर से, सहसा, धीरे–धीरे। 

(क) सोनपुर के मेले में ________ व्यापारी आते हैं।

(ख) उसकी तबीयत ________ बिगड़ गई।

(ग) बच्चों को ________ समझाओगे तो वे अवश्य मान जायेंगे। 

(घ) गंगी बड़ी ________ ठाकुर के कुएँ से पानी भरने गई थी।

(ङ) हमें ________ किसी बात का निर्णय नहीं लेना चाहिए।

(च) ________ एक तौर आकर श्रवण कुमार के सीने में लगी।

(छ) ________ देखो! यह उसी रम्भा का तस्वीर है।

(ज) ________ चलो, वरना गाड़ी छूट जाएगी।

(झ) तुम इतना ________ क्यों बोलना हो? चाहिए।

(ञ) हमें सबसे ________ बोलना चाहिए।

उत्तर: (क) दूर–दूर से।

(ख) अचानक।

(ग) प्यार से।

(घ) सावधानी से।

(ङ) झटपट।

(च) सहसा।

(छ) ध्यानपूर्वक।

(ज) जल्दी।

(झ) धीरे।

(ञ) प्रेमपूर्वक।

3. निम्नलिखित का संधि–विच्छेद कीजिए: 

वेदान्त, भावार्थ, विद्यार्थी, कवीन्द्र, रवीश, भानूदय, हिमालय, रेखांकित।

उत्तर: वेदान्त  – वेद  + अन्त  = वेदान्त (अ+ अ-आ)

भावार्थ – भाव  + अर्थ  = भावार्थ (अ+ अ-आ)

विद्यार्थी – विद्या + अर्थी  = विद्यार्थी (आ+अ-आ)

कवीन्द्र – कवि   + इन्द्र   =  कवीन्द्र (इ+इ=ई)

रवीश – रवि      +  ईश    = रवीश (इ+ई=ई)

भानूदय – भानु  + उदय   = आलय भानूदय (उ+उ=ऊ)

हिमालय – हिम + आलय  = हिमालय (अ+आ-आ)

रेखांकित – रेखा  + अंकित  = रेखांकित (आ+अ-आ)

अतिरिक्त प्रशन एवं उत्तर:

1. बाबू की घरवाली ने लड़के की माँ को काम से क्यों हटा दिया?

उत्तर: लड़के की माँ बाबू से अढ़ाई रुपया महीना लेती थी। जगतू की माँ ने बाबू से कहा कि वह दो रुपये में सब काम कर देगी। इसलिए बाबू की घरवाली ने जगतू की माँ को रखकर लड़के की माँ को काम से हटा दिया।

2. खोमचेवाले के पास कितनी ढेरियाँ थीं? एक–एक ढेरी का मूल्य क्या था?

उत्तर: खोमचेवाले के पास कुल आठ ढेरियाँ थीं। एक–एक ढेरी का मूल्य एक–एक पैसा था।

3. दिलीप ने बच्चे से कितनी ढेरियाँ खरीदी और उसके लिए कितने पैसे दिए?

उत्तर: दिलीप ने बच्चे से आठ ढेरियाँ खरीदी और उसके लिए उसने बच्चे को एक रुपया दिया।

4. दिलीप बच्चे के साथ उसके घर क्यों गया?

उत्तर: बच्चे को देखकर दिलीप ने सोचा कि जो बच्चा आठ पैसे का खोमचा बेचने इस सर्दी में निकला है, उसके घर की क्या अवस्था होगी। इस जिज्ञासा के कारण बाकी पैसे लेने के बहाने वह बच्चे के साथ उसके पर चला गया।

5. दिलीप की आँखों के सामने से कौन–सा दृश्य नहीं हट रहा था? 

उत्तर: दिलीप ने मिट्टी के तेल की ढिबरी के प्रकाश में खोमचेवाले बच्चे के घर का जो दुःखद एवं दर्दनाक दृश्य देखा था, वही दृश्य उसकी आँखों के सामने से नहीं हट रहा था।

6. पाठ के आधार पर लड़के के घर का दृश्य चित्रित कीजिए।

उत्तर: लड़के का घर एक पतली गली में अवस्थित था। उसमें आदमी के कद की ऊँचाई की एक छोटी–सी पुरानी कोठरी थी। उसमें मिट्टी के तेल को एक ढिबरी जल रही थी, जिससे कोठरी में धुंधला लाल प्रकाश फैला हुआ था । उसमें श्राद्ध के अवसर पर महाब्राह्मणों को दान में देने योग्य एक छोटी–सी चारपाई थी, जो उस कोठरी की काली दीवार के सहारे खड़ी थी। चारपाई के पाये से दो–एक गन्दे कपड़े लटक रहे थे। उसमें दुबली–पतली आधी उम्र की एक औरत मैलो–सी धोती में शरीर लपेटे बैठी हुई थी।

7. मिंटो पार्क में बेंच पर लेटा दिलीप क्या सोच रहा था?

उत्तर: अपनी पत्नी हेमा के व्यवहार से दुःखी दिलीप सर्दी की रात में मिंटो पार्क में बेंच पर लेटा सोच रहा था कि यदि ठंड लगने से वह बीमार हो जाए, उसकी हालत खराब हो जाए, तो वह चुपचाप शहीद की तरह अपने दुःख को अकेला ही सह लेगा। किसी को अपने दुःख का सहभागी नहीं बनाएगा। एक दिन मृत्यु दबे पाँव आएगी और उसके हृदय की व्यथा एवं रोग को लेकर उसे शान्त कर चली जाएगी। उस दिन रोनेवालों में हेमा भी होगी। उस समय हेमा अपने नुकसान का अनुमान कर अपने व्यवहार के लिए पछताएगी। दिलीप के चुपचाप दुःख सहते रहने का यही उचित प्रतिशोध होगा।

8. आशय स्पष्ट कीजिए:

(क) “मनुष्य के बिना भी संसार कितना व्यस्त और रोचक है”?

उत्तर: उक्त पंक्ति में लेखक का आशय यह है कि संसार में परिवर्तन के नियम सार्वभौम और शाश्वत हैं तथा अबाध गति से निरन्तर चलते रहते हैं। जैसे–सूर्य का उगना और डूबना, सुबह–शाम होना, ऋतु परिवर्तन होना, वृक्षों में फल–फूल लगना, पतझड़ आना आदि। संसार के इन परिवर्तनों का प्रभाव प्रकृति के स्वरूप पर भी पड़ता है चाहे उसका द्रष्टा या अनुभवकर्ता कोई मनुष्य हो या न हो।

9. व्याख्या कीजिए:

(क) “काश! तुम जानती, दुःख किसे कहते हैं।—— तुम्हारा यह रसीला दुःख तुम्हें न मिले तो जिंदगी दूभर हो जाए”।

उत्तर: सन्दर्भ: प्रस्तुत पंक्तियाँ हमारी पाठ्यपुस्तक” अंबर” भाग-1 में संकलित ‘दुःख’ शीर्षक कहानी से उद्धृत की गयी हैं। इसके लेखक यशपाल जी हैं। 

प्रसंग: अपनी पत्नी हेमा के प्रति कहानी के नायक दिलीप की यह उक्ति है। 

व्याख्या: दुःख हृदय की एक आन्तरिक अनुभूति है। इसे अमीरी–गरीबी के तराजू पर नहीं तौला जा सकता। पारस्परिक वैमनस्य तथा आपसी मनमुटाव से उत्पन्न मानसिक पीड़ा को दुःख की संज्ञा नहीं दी जा सकती। इस प्रकार का दुःख बनावटी या स्व–निर्मित दुःख कहा जाता है। हेमा जिसे अपना दुःख मान रही है, दरअसल वह दुःख बनावटी दुःख है। उसने स्वयं इस दुःख की सृष्टि की है। उसे वास्तविक दुःख की अनुभूति नहीं है। उसका दुःख तो प्रतिशोध की भावना से किसी को अपमानित तथा तिरस्कृत करने के लिए है इसलिए वह रसीला है। आनन्ददायक है। वास्तविक दुःख से दुःखी जनों के प्रति हमदर्दी तथा सहानुभूति पैदा करता है। लोग उसके दुःख को देखकर सोचने और कुछ करने के लिए मजबूर हो जाते हैं। इस दृष्टि से भूखी माँ का दुःख वास्तविक दुःख है। जिसे देखकर दिलीप का हृदय द्रवित हो जाता है। उसका मन हमदर्दी और सहानुभूति से भर जाता है। वह हेमा का पत्र पढ़कर उक्त पंक्तियों में अपने इसी अनुभव को प्रकट करता है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top