Class 9 Ambar Bhag 1 Chapter 17 वैचित्र्यमय असम

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Class 9 Hindi (MIL) Ambar Bhag 1 Chapter 17 वैचित्र्यमय असम

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आहोम

पाठ – 17

वैचित्र्यमय असम

सारांश:

आहोम असम की एक मुख्य जनगोष्ठी है। आहोम लोग मूलतः ताई जाति से संबंधित है। असम में आने के बाद से ही उन्हें आहोम नाम से संबोधित किया गया। इन लोगों का मूल निवास चौन देश के दक्षिण–पशिमम अंचल, वर्तमान यूनान के मूंगमाठ राज्य में था। इनके पूर्वज 13वीं शताब्दी में चुकाफा राजा के नेतृत्व में पाटकाई पर्वत पार कर पूर्वी असम या तत्कालीन सौमार में आए और राज्य की स्थापना की। बाद में धीरे–धीरे पशिचम की तरफ ‘मनाह’ तक राज्य का विस्तार कर प्रायः 600 वर्षों तक राज्य का शासन किया। आहोम लोगों की मूल भाषा ताई या शान थी, परंतु वक्त बीतने के साथ–साथ उन्होंने अपनी भाषा की जगह असमीया भाषा को स्वीकार किया। यद्यपि प्राचीन पूजा–पाठ, रीति–नीति संबंधी कई कार्य उनके पंडित पुरोहित ताई भाषा में ही करते आ रहे हैं। एक सर्वेक्षण के अनुसार असम में आहोम लोगों की संख्या प्रायः 25 लाख है।

पाठ्यपुस्तक संबंधित प्रश्न एवं उत्तर:

1. आहोम लोग पहले किस जाति के थे? 

उत्तरः आहोम लोग पहले ताई जाति के थे।

2. आहोम लोगों का मूल निवास स्थान कहाँ था?

उत्तरः आहोम लोगों का मूल निवास स्थान चीन देश के दक्षिण–पशचम अंचल, वर्तमान यूनान के मूंगमाउ राज्य में था।

3. आहोम लोगों ने कितने सालों तक असम पर शासन किया? 

उत्तरः आहोम लोगों ने 600 सालों तक असम पर शासन किया।

4. आहोम लोगों की मूल भाषा क्या थी?

उत्तरः आहोम लोगों की मूल भाषा ताई या शान थी।

5. आहोम लोगों के कुछ उत्सवों के नाम लिखो?

उत्तरः आहोम लोगों के कुछ प्रमुख उत्सव हैं–मे–दाम–मे–फी, उमफा, साइफा, रिकखम, जासिंगफा, लाईलौगखाम आदि।

6. संक्षेप में टिप्पणी लिखो:

(क) लाचित बरफुकन।

उत्तरः असम के इतिहास में देशप्रेमी, वीर के तौर पर प्रसिद्ध लाचित बरफुकन का जन्म 1612 में हुआ था। उनके पिता का नाम मोमाई तामुली बरबरुवा था। वे चार भाई थे, जिनमें वे सबसे छोटे थे। उनके पिता राजा स्वर्गदेव के राजदरबार में कार्य करते थे इसीलिए पिता के साथ उन्हें राज कार्य का निरीक्षण कर बहुत कुछ सीखने का मौका मिला था। कम समय में अपनी दक्षता के बलबूते पर लाचित को राजशाही में नियुक्त किया गया था। तब लाचित दिखौमुख में दुश्मन की सेना से लड़े थे और अपनी दक्षता का प्रदर्शन किया था। जिसके परिणामस्वरूप आहोम राजा चक्रधर सिंह ने लाचित को सेनापति बनाया था और बरफुकन के पद पर नियुक्त किया था। इसके कुछ दिनों पशचात् 20 अगस्त, 1667 को आहोम–मुगल के बीच युद्ध की शुरुआत हुई। 

मुगलों के साथ हुए इस युद्ध में जीत हासिल हुई और इस जीत से असमीया सेना का आत्मविश्वास बढ़ गया। सेनापति के तौर पर लाचित बरफुकन की भी सराहना की गई। असमीया सेना के हाथ हुई मुगलों की पराजय की खबर से सम्राट औरंगजेब को शर्म और अपमान महसूस हुआ और उसने बदला लेने का निशचय किया। उसने राम सिंह को एक विशाल सेना के साथ असम पर फिर आक्रमण करने के लिए भेजा। इसी बीच उन्होंने पूरे राज्य में यह निर्देश जारी किया कि अगर कोई अपने दायित्व का ठीक से पालन नहीं करेगा तो पता चलते ही उसका सिर कलम कर दिया जाएगा। लाचित ने अमीनगाँव के पास एक दुर्ग बनाने का दायित्व अपने मामा को सौंपा था, किन्तु मामा की लापरवाही की वजह से दुर्ग के निर्माण का काम अधूरा रहने पर लाचित क्रोधित हो उठे और तलवार निकालकर एक ही झटके में मामा का सिर काटकर बोले ‘देश से बढ़कर मामा बड़ा नहीं होता’। इसी दौरान मुगलों ने मार्च में 1671 आक्रमण कर दिया और आहोम एवं मुगलों के बीच घमासान युद्ध हुआ। इस युद्ध में आहोम सैनिकों ने लाचित बरफुकन के नेतृत्व में मुगल सेना को पराजित किया, जिसे शराईघाट युद्ध के नाम से जाना जाता है। बीमारी की गम्भीर हालत में भी युद्ध करने की वजह से युद्ध के कुछ दिनों बाद गुवाहाटी में लाचित बरफुकन की मृत्यु हो गई। लाचित बरफुकन जब तक जीवित रहे, उन्होंने निःस्वार्थ भाव से देश और समाज की सेवा की।

(ख) सती जयमती।

उत्तरः सती जयमती कुंवरी के समय असम में चारों ओर राजनीतिक अराजकता फैली हुई थी। मंत्री लालूक सोला का उस समय अत्यंत बोलबाला था। उसने दूसरे उपयुक्त राजकुमारों के रहते सरू गोहाईं को सन् 1679 में असम का राजा बना दिया। उसका नाम आहोम के लोगों ने सुलिकफा और हिन्दू लोगों ने रत्नध्वज सिंह रखा था। लालूक सोला को राजा बनने की लालसा उत्पन्न हो गई थी जिसके चलते उसने राजा स्वर्गदेव सुदेफा तथा आतन बूढ़ागोहाईं को परिवार सहित मार डाला। उसने अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए लड़ा राजा को रिश्ते की डोर में बांधा। उसने अपनी पाँच वर्ष की पुत्री का विवाह 14 साल के राजा के साथ कर दिया। उसने राज परिवार के राजकुमारों को अंग–भंग कर उनके राजा बनने की योग्यता को समाप्त कर दिया। किन्तु उन राजकुमारों में से एक राजकुमार लांगी गदापानी बच गया। 

गदापानी पकड़ में नहीं आ रहा था इसीलिए लालूक सोला ने गदापानी को पकड़ने हेतु उसकी पत्नी जयमती कुंवरी को पकड़ लिया और उससे गदापानी के विषय में पूछताछ की गई। किन्तु जयमती ने अपना मुँह नहीं खोला। लालूक ने जल्लाद को आदेश दिया कि जयमती को जेरेंगा के इलाके में निर्जन स्थान पर रखकर किसी भी तरह से जयमती के मुँह से गदापानी की खबर निकाले। जल्लाद ने अनेक तरीके से समझाकर डराकर, फुसलाकर, उकसाकर गदापानी के ठिकाने के बारे में जयमती से पूछने की कोशिश की और जब कुछ पता नहीं चला तो जल्लाद कुंवरी को दंडित करने लगा। जयमती सभी दंड को सहते हुए 14 दिनों के बाद सन् 1679 में देह का त्याग कर दिया। इस प्रकार जयमती कुंवरी ने देश, समाज और पति की रक्षा के लिए अपने प्राणों की बलि चढ़ा दी।

(ग) टेंगाई महन।

उत्तर: पंडित टेंगाई महन का जन्म सन् 1715 में चराईदेउ के महंग माइसेऊ परिवार के तकन्वरी के घर में हुआ था। आहोम शासन के अंत समय में बुद्धिजीवियों को संकटों का सामना करना पड़ा था। इसकी वजह से आहोम दरबार में आहोम भाषा के स्थान पर असमीया भाषा का वर्चस्व बढ़ता जा रहा था और आहोम भाषा धीरे–धीरे उपेक्षित होने लगी थी। ऐसे में बुद्धिजीवियों को आहोम भाषा को लेकर चिंता होने लगी कि कहीं आहोम भाषा पूरी तरह से लुप्त न हो जाए। इसी कारण भविष्य की पीढ़ी आहोम भाषा सीख सके इसके लिए उन्होंने आहोम शब्दकोश रचने का काम हाथों में लिया। सन् 1795 में गौरी नाथ सिंह के शासन के अंतिम हिस्से में उन्होंने ‘बड़काकत ह मूंग पूथी’ नामक इस शब्दकोश की रचना की। इसमें प्रत्येक आहोम शब्द के सामने सम्भावित असमीया अर्थ दिए गए हैं। सन् 1912 में कोच बिहार के कैलाश चंद्र सेन नामक एक बाबू से हेमचंद्र गोस्वामी ने टेंगाई महन के लिखे बड़काकत हू मूंग ग्रंथ का उद्धार किया और इतिहास एवं पुरातत्व विभाग को सौंप दिया। सन् 1932 में नंदनाथ फुकन ने इस पुस्तक को प्रकाशित करने के लिए सम्पादन का कार्य शुरू किया। महन के ग्रंथ का संपादित रूप असम इतिहास और पुरातत्व विभाग द्वारा 1964 में प्रकाशित आहोम लेक्सिकन का एक भाग है।

टेंगाई महन को असम का प्रथम शब्दकोश प्रणेता माना जाता है। आहोम भाषा की पुस्तकों का अनुवाद करने के लिए अंग्रेजी अधिकारी भी उनको विदेश ले गए थे। इस महान शब्दकोशकार का देहांत सन् 1823 में डिब्रुगढ़ जिले के खुवांग में हुआ।

(घ) पंडित प्रवर डंबरूधर देऊधाई फुकन।

उत्तरः पंडित प्रवर डंबरूधर देऊधाई फुकन का जन्म अक्टूबर, 1912 में एक शुभ क्षण में चराईदेऊ महकमा के अन्तर्गत खालैघोगूरा मौजा के अन्तर्गत आखैया देऊधाई गाँव में हुआ। इनके पिता का नाम गंगाराम फुकन और माता का नाम सादई फुकन था। डंबरूधर देऊधाई फुकन ने एम. वी. स्कूल की पढ़ाई करने के बाद आगे की पढ़ाई न करते हुए ताई भाषा–संस्कृति का अध्ययन करना शुरू किया। घर में रहकर खेतीबारी करते हुए ताई भाषा का अध्ययन करते समय असम इतिहास और पुरातत्त्व विभाग के प्रमुख डॉ. सूर्यकुमार भूइयाँ सन् 1931 में भाषा के विशेषज्ञ के तौर पर उनको आहोम इतिहास का अनुवाद करने के लिए गुवाहाटी लेकर गए। 4 वर्ष तक कार्य करने के पशचात् अवकाश लेकर 1935 में वे घर लौट आये। 1964 में ताई भाषा संस्कृति के उद्धार के लिए उन्होंने लकड़ी, बाँस से एक विद्यालय का निर्माण करवाया।यही बाद में केन्द्रीय ताई अकादमी, पारसको बना। 

उन्होंने सन् 1981 में दिल्ली में आयोजित प्रथम अंतर्राष्ट्रीय ताई शिक्षा सम्मेलन में भाग लेकर 19 देशों के ताई पंडितों के साथ आहोम भाषा के संबंध में विचार–विमर्श किय था। सन् 1994 में बैंकाक में आयोजित द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय ताई शिक्षा सम्मेलन में आमंत्रित होकर एक महीने तक थाईलैंड के सियांगमाई शहर में रहकर ताई भाषा–संस्कृति को साधना की। इसी प्रकार विभिन्न देशों में भ्रमण कर तथा असम के एक कोने से दूसरे कोने तक ताई भाषा-संस्कृति का विकास करते हुए उनका देहांत 15 फरवरी, 1993 को हुआ। ताई भाषा–संस्कृति के विकास में उनका योगदान अतुलनीय है।

(ङ) पदमनाथ गोहाईं बरुवा।

उत्तरः पदमनाथ गोहाईं बरुवा का जन्म 24 अक्टूबर, 1871 को उत्तर लखीमपुर के नकारिगाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम घिणाराम और माता का नाम लक्ष्मी देवी था। उन्होंने उत्तर लखीमपुर से छात्रवृत्ति परीक्षा में उत्तीर्ण होकर शिवसागर हाईस्कूल में दाखिला लिया। किन्तु बाद में कोहिमा हाईस्कूल से सन् 1890 में एंट्रस परीक्षा उत्तीर्ण की। उच्च शिक्षा हेतु वे कोलकाता गये और वहाँ से कानून की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने सर्वप्रथम कोहिमा मध्य अंग्रेजी विद्यालय में प्रधानाचार्य के पद पर कार्य किया। बाद में तेजपुर नॉर्मल स्कूल में आकर वहाँ पर स्थायी रूप से रहने लगे। उन्होंने कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास आदि कई विधाओं में लेखनी चलाकर अपना अहम् योगदान दिया। उनके द्वारा रचित काव्य संकलनों में जुरणि, लोला, फूलर चानेको आदि शामिल हैं तथा इतिहास प्रसिद्ध नाटकों में जयमती, गदाधर, साधना, लाचित बरफुकन आदि एवं प्रहसन नाटकों में गाँवबूढ़ा, टेटोन तामुली, भूत ने भ्रम आदि प्रख्यात है। उपन्यासों में भानुमती व लाहरी तथा आत्मजीवनी में मोर सोंवरणी आदि प्रसिद्ध हैं। इसके अलावा उन्होंने भूगोल दर्पण, नीतिशिक्षा, शिक्षा विधान समेत कई पुस्तकों की रचना की। वे असम के शिवसागर जिले में हुए असम साहित्य सभा के प्रथम अधिवेशन 1917 के अध्यक्ष भी रहे। ऐसे महान साहित्यकार की मृत्यु 7 अप्रैल, 1946 को हुई।

(च) कृष्णकांत संदिकै।

उत्तरः कृष्णकांत संदिकै का जन्म सन् 1898 में जोरहाट जिले में हुआ था। उनके पिता का नाम राधाकांत संदिकै तथा माता का नाम नारायणी संदिकै था। उन्होंने सन् 1913 में जोरहाट सरकारी हाईस्कूल से प्रथम विभाग में एंट्रेस परीक्षा पास कर कॉटन कॉलेज में दाखिला लिया। वहाँ से उन्होंने आई. ए. की परीक्षा प्रथम विभाग में उत्तीर्ण कर उच्च शिक्षा हेतु कोलकाता गए। वहाँ से उन्होंने बी. ए., एम. ए. की शिक्षा प्राप्त की। उसके पशचात् विलायत शिक्षा प्राप्त करने हेतु गये। कृष्णकांत संदिकै संस्कृत भाषा के पंडित थे। उन्होंने श्रीहर्ष रचित नैषध चरित का अंग्रेजी अनुवाद तथा टीका संबंधी पुस्तक ‘निषेध चरित’ (1934), सोमदेव द्वारा रचित यशगान संबंधी पुस्तक’ यशस्तिलक एंड इंडियन कल्चर’ (1949) का अनुवाद किया। सन् 1951 में उन्होंने भारतीय प्राच्यविद्या सम्मिलन के लखनऊ अधिवेशन को अध्यक्षता की। 

सन् 1953 को वाटलेयर में आयोजित आंतः विश्वविद्यालय समिति के अध्यक्ष भी रहे। उनकी रुचि असमीया भाषा साहित्य में भी पर्याप्त थी, इसीलिए वे समय–समय पर बाँही, मिलन, आवाहन, चेतना आदि पत्र–पत्रिकाओं में लिखते रहे। ‘कृष्णकांत संदिकैर रचना संभार’ में उनको सभी रचनाएँ संगृहोते हैं। भारत सरकार ने उन्हें सन् 1955 में पदमश्री तथा सन् 1967 में पदमभूषण उपाधि से विभूषित किया था। इस प्रकार उन्होंने जीवन भर असमीया और आहोम साहित्य समाज के विकास के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया।

अतिरिक्त प्रशन एवं उत्तर:

1. ताई लोगों का असम आगमन कब और कैसे हुआ? 

उत्तरः ताई लोगों का असम आगमन 13वीं शताब्दी में चुकाफा राजा के नेतृत्व में पाटकाई पर्वत पार कर पूर्वी असम यानी तत्कालीन सौमार में हुआ और उन्होंने अपने राज्य की स्थापना की।

2. ताई लोग असम में आकर किस नाम से जाने जाने लगे? 

उत्तरः ताई लोग असम में आने के बाद आहोम कहलाने लगे।

3. वर्तमान समय में ताई भाषा–भाषी कहाँ–कहाँ रहते हैं? 

उत्तरः वर्तमान समय में ताई भाषा–भाषी असम से लेकर म्यांमार, दक्षिण चीन, थाईलैंड, लाओस, कंबोडिया एवं वियतनाम में रहते हैं।

4. असम में ताई जनगोष्ठियाँ क्या–क्या हैं? 

उत्तरः असम में आहोम के अलावा और पाँच ताई जनगोष्ठियाँ हैं, वे हैं–खामती, फाके, खामयांग, आइतन और तुकंग।

5. वर्तमान असम में आहोम लोगों की जनसंख्या कितनी हैं? 

उत्तरः वर्तमान असम में आहोम लोगों की जनसंख्या लगभग 25 लाख है।

6. असम में आहोम लोग कहाँ–कहाँ रह रहे हैं? 

उत्तरः असम में आहोम लोग मुख्य तौर पर चराईदेव, शिवसागर, डिब्रुगढ़, जोरहाट, गोलाघाट, लखीमपुर, धेमाजी और तिनसुकिया जिले में रह रहे हैं। इसके अलावा गुवाहाटी शहर सहित अन्य शहरों में भी आहोम लोग रहते हैं।

7. आहोम लोग अपने पूर्वजों की पूजा किस प्रकार करते हैं? 

उत्तरः आहोम लोग अपने पूर्वजों की अवस्थिति पर विशवास करते हैं और पूर्वजों की पूजा–आराधना करना अपना धर्म मानते हैं। वे मृत माता–पिता सहित 14 पुरखों की डाम के रूप में नियमित पूजा करते हैं।

कछार की जनगोष्ठियाँ:

सारांश:

असम के दक्षिणी हिस्से में तीन जिले हैं– कछार, हैलाकांदी और करीमगंज । इन तीनों जिले के बीच से बराक नदी गुजरती है। बराक नदी से संबंधित होने के कारण इन तीनों जिले को एक साथ बराक घाटी कहा जाता है। बराक घाटी में विभिन्न जातियों और उपजातियों के लोग रहते हैं। सामाजिक–आर्थिक–राजनीतिक क्षेत्र में समय–समय पर घटित घटनाओं के कारण भारत के अलग–अलग क्षेत्रों से लोग आकर बराक घाटी में बसते रहे हैं। बराक घाटी में बंगाली, मणिपुरी, असमीया, राजवंशी, हिंदीभाषी, नागा, मार, कार्बी, मिजो, नेपाली, चकमा, कुकी, खासिया, रियांग आदि जनगोष्ठी के लोग रहते आ रहे हैं। प्रत्येक जनगोष्ठी के लोग अपनी भाषा–संस्कृति का संरक्षण करते आ रहे हैं। अलग–अलग भाषा और संस्कृति के लोगों के सह–अस्तित्व के कारण बराक घाटी को ‘नृतत्व का बगीचा’ कहा जाता है। यहाँ हर प्रकार के पर्व–उत्सव का आयोजन होता है। दुर्गापूजा, ईद, बिहू, क्रिसमस आदि बराक घाटी के प्रमुख उत्सव हैं।

पाठयपुस्तक संबंधित प्रश्न एवं उत्तर:

1. नृतत्वविदों ने बराक घाटी को क्या कह कर संबोधित किया है? 

उत्तरः नृतत्वविदों ने बराक घाटी को एंथ्रोपोलॉजिकल गार्डन (Anthropological garden) यानी ‘नृतत्व का बगीचा’ कह कर संबोधित किया है।

2. बराक घाटी में रहने वाली विभिन्न जनगोष्ठियों के नाम क्या–क्या हैं? 

उत्तर: बराक घाटी में रहने वाली विभिन्न जनगोष्ठियों के नाम इस प्रकार हैं – मणिपुरी, मणिपुरी विष्णुप्रिया, बंगीय समाज, भोजपुरी, असमीया, राजवंशी, राजस्थानी, बर्मन (डिमासा), रंगमाई नगा आदि।

3. बराक घाटी के लोगों की मुख्य जीविका क्या है? 

उत्तरः बराक घाटी के लोगों की मुख्य जीविका खेती–बारी, व्यवसाय और नौकरी है।

4. द बैकग्राउंड ऑफ असामीज कल्चर (The Background of Assamese Culture) पुस्तक की रचना किसने की थी?

उत्तर: ‘द बैकग्राउंड ऑफ असामीज कल्चर’ (The Background of Assamese Culture) पुस्तक की रचना ‘राज मोहन नाथ’ ने की थी।

5. हैदराबाद में आयोजित संतोष ट्रॉफी फुटबॉल प्रतियोगिता में असम फुटबॉल टीम के मैनेजर कौन थे? 

उत्तर: हैदराबाद में आयोजित संतोष ट्रॉफी फुटबॉल प्रतियोगिता में असम फुटबॉल टीम के मैनेजर थे–सुनील मोहन।

6. संक्षिप्त टिप्पणी लिखो:

(क) राजमोहन नाथ।

उत्तरः राजमोहन नाथ ने असम के इतिहास और पुरातत्व गवेषणा के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। बचपन से हो उन्हें इतिहास के अध्ययन में अत्यंत रूचि थी। इस बात का प्रमाण उनका उल्लेखनीय ग्रंथ है ‘द बैकग्राउंड ऑफ असामीज कल्चर’ (The Background of Assamese Culture)। उनके इस ग्रंथ का प्रकाशन सन् 1948 में हुआ था। सन् 1958 में तिनसुकिया में असम साहित्य सभा का तेरहवाँ अधिवेशन हुआ था, जिसमें राजमोहन नाथ इतिहास शाखा के अध्यक्ष थे।

(ख) कमालुद्दीन अहमद।

उत्तर: इतिहासकार के रूप में प्रसिद्ध कमालुद्दीन अहमद करीमगंज कॉलेज के इतिहास विभाग के विभागाध्यक्ष थे। बाद में वे प्राचार्य के पद पर भी आसीन हुए। उन्होंने साहित्य की भी रचना की थी। उनके द्वारा सम्पादित साहित्यिक–पत्र का नाम ‘दिग्वलय’ था। उन्होंने असम के शिल्प और स्थापत्य के संबंध में पुस्तक लिखी थी, जिसका नाम ‘द आर्ट एंड आर्किटेक्चर ऑफ असम’ (1994) (The Art and Architecture of Assam (1994) था। उन्होंने उपन्यास, शोध पत्र आदि के अतिरिक्त अन्य रचनात्मक साहित्य की भी रचना की थी।

(ग) नन्दलाल बर्मन।

उत्तर: बराक घाटी के बर्मन समाज के राजमंत्री वंश के नंदलाल बर्मन एक प्रसिद्ध समाज सेवक थे। इसके अतिरिक्त उन्होंने एक प्रभावशाली व्यवसायी के रूप में समाज में एक अलग पहचान भी बनाई थी। वर्मन समाज के लोग उन्हें आदर के साथ ‘मिलाउ’ तथा अन्य समाज के लोग ‘महाजन’ कह कर संबोधित करते थे। ग्रामीण विद्यार्थियों की शिक्षा के लिए कछार जिले के बरखोला में सन् 1901 में एक स्कूल की स्थापना की थी। इस प्रकार नंदलाल बर्मन ने बराक घाटी के लोगों के विकास के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

(घ) नलिनींद्र कुमार बर्मन।

उत्तरः नलिनींद्र कुमार बर्मन एक शिक्षक के रूप में प्रसिद्ध थे। उन्होंने सन् 1930 में दीमा हसाओ जिले के सदर हाफलांग मिशन स्कूल से शिक्षक की नौकरी शुरू की थी। उन्होंने डिमासा जाति की विरासत और परम्परा के संबंध में गहरा अध्ययन किया था तथा उससे संबंधित कई किताबों की रचना भी की थी। इससे संबंधित उनको एक कृति का नाम The Queen of Cachar or Herambo and History of the Cacharis है। डिमासा समाज में श्राद्ध का आवश्यक अंग कीर्तन है, जिसे उन्होंने कीर्तन पदावली के एक संकलन के रूप में प्रकाशित किया था। उस पुस्तक का नाम है ‘हैडिंबराज गोविंदा चंद्र कृत हिन्दू शास्त्रीय श्राद्धादि कीर्तन गीतिका’। इस प्रकार देखा जाए तो डिमासा जाति के लिए उन्होंने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था।

(ङ) इरुंगवम चंद्र सिंह।

उत्तर: इरुंगबम चंद्र सिंह मणिपुरी समाज के प्रथम अर्थशास्त्र विज्ञान के पाण्मासिक स्नातक थे। उन्होंने समाज व देशहित के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किये।

ग्रामीण विद्यार्थियों की शिक्षा के लिए उन्होंने कई सार्थक कदम उठाए थे। गरीब विद्यार्थियों की मदद करने के लिए उन्होंने एक स्कूल की स्थापन की थी। स्कूल का वर्तमान नाम ‘खेलम हाईस्कूल’ है। इस प्रकार उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

(च) बिपिन सिंह।

उत्तर: मणिपुरी विष्णुप्रिया समाज के गुरु विपिन सिंह नृत्य कला के क्षेत्र में अविस्मरणीय व्यक्तित्व हैं। नृत्य कला में योगदान की वजह से गुरु बिपिन सिंह को सन् 1966 में ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ प्रदान किया गया था। परवर्ती समय में उनको मध्य प्रदेश सरकार का ‘कालिदास सम्मान’ भी मिला था। उन्होंने कोलकाता में ‘मणिपुरी नर्तनालय’ नामक एक नृत्य कला शिक्षण संस्थान की भी स्थापना की थी। इस प्रकार उन्होंने नृत्य कला के विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

अतिरिक्त प्रशन एवं उत्तर:

1. सुनील मोहन कौन थे? 

उत्तरः सुनील मोहन असम फुटबॉल संघ के संस्थापक कोषाध्यक्ष एवं असम हॉकी संस्था के अध्यक्ष थे। वे असम के बराकघाटी बंगीय समाज के एक प्रख्यात क्रीडाप्रेमी थे।

2. ‘बराकघाटी में महिलाओं के विकास व कल्याण के लिए उल्लेखनीय काम किसने किया? 

उत्तर: बराकघाटी में महिलाओं के विकास व कल्याण के लिए मालती श्याम ने आजीवन काम किया।

3. कछार में लोक–नृत्य के संरक्षण, प्रचार व प्रसार में किसका उल्लेखनीय योगदान रहा और उन्हें कब और कौन–सा पुरस्कार प्रदान किया गया। 

उत्तर: कछार में लोक–नृत्य के संरक्षण, प्रचार व प्रसार में मुकुंद दास भट्टाचार्य का योगदान उल्लेखनीय रहा। उन्हें सन् 1997 में ‘विष्णु राभा पुरस्कार’ प्रदान किया गया।

4. जगत मोहन सिंह कौन थे?

उत्तरः जगत मोहन सिंह एक शिक्षक और साहित्यकार थे। वे निखिल विष्णुप्रिया मणिपुरी साहित्य परिषद के संस्थापक अध्यक्ष थे। विष्णुप्रिया मणिपुरी भाषा में उन्होंने कविता, नाटक, लेख आदि लिखे थे।

5. गुरु विपिन सिंह को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार कब और क्यों मिला? 

उत्तरः गुरु विपिन सिंह को नृत्य कला के क्षेत्र में विशेष योगदान हेतु सन् 1966 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला था।

कार्बी

सारांश:

कार्बी असम की प्रमुख जनजाति है। विष्णुप्रसाद राभा ने अमेरिका के खोजकर्ता कोलंबस के साथ तुलना करते हुए कार्यों लोगों को ‘असम का कोलंबस’ कहा था। इस कथन का समर्थन प्रसिद्ध इतिहासकार सुनीति कुमार चट्टोपाध्याय ने किया था। असम के मध्य में स्थित कार्बी आंग्लांग और डिमा हसाउ में कार्बी लोग मुख्य रूप से रहते हैं। दोनों इलाकों को मिलाकर कार्बो आंग्लांग स्वायत्त परिषद का गठन किया गया है। इस परिषद में कुल 30 सदस्य हैं। 26 निर्वाचित और 4 मनोनीत सदस्य हैं। क्षेत्रफल 10,343 वर्ग किलोमीटर है। कार्बी आंग्लांग के अलावा शोणितपुर, वशवनाथ, लखीमपुर, सोनापुर आदि स्थानों पर भी कार्बी लोग बसे हुए हैं। कार्बी लोगों को अपनी विशिष्ट परंपरा, रीति–नीति, पोशाक, खान–पान, उत्सव–पर्व, धर्म–विश्वास के कारण उनकी एक खास पहचान है।

पाठ्यपुस्तक संबंधित प्रश्न एवं उत्तर:

1. कार्बी लोगों को असम का कोलंबस किसने कहा था? 

उत्तरः कार्बी लोगों को असम का कोलंबस विष्णुप्रसाद राभा ने कहा था।

2. कार्बी पारंपरिक वेशभूषा के बारे में लिखिए?

उत्तर: कार्बी असम की प्रमुख जनजाति है। स्त्री और पुरुष के वस्त्र अलग–अलग होते हैं। पुरुषों के वस्त्रों को घुटनों तक पे सेलेंग, सई हंगथर, सई इक, सई लक्, पहो आदि कहते हैं। स्त्रियों के वस्त्र हैं–पीनी, पेकक और वांकक । इसके अलावा पे सेलेंग, पे खंजारी, पे सारपी आदि प्रमुख वस्त्र भी होते हैं।

3. कार्वी उत्सव–पर्व के बारे में लिखो? 

उत्तर: कार्बी उत्सव–पर्व में पेंग हेम्फू, रंगकेर, सजून आदि प्रमुख हैं। पेंग हेम्फू घरेलू उत्सव है। इस उत्सव में आम तौर पर तीन पूजाएँ होती हैं–रिंग आंग्लांग, बुईसम और पेंग। साल की शुरुआत में ही यह उत्सव होता है; ताकि साल भर कोई अमंगल न हो। इसे घरेलू उत्सव कहा जाता है। सजून उत्सव हर साल नहीं मनाया जाता, 4, 5 या 9 साल के अंतराल पर मनाया जाता है। रंगकेर उत्सव को गाँव का उत्सव कहा जाता है। इसे साल के आरम्भ में मनाया जाता है। पूजा की मूल वेदी पर पंछी, बकरी, अंडे आदि समर्पित कर देवता की पूजा की जाती है।

4. कार्बी लोगों के मूल गुट क्या–क्या है?

उत्तरः कार्बी लोगों के मूल गुट 5 है–तिमूंग, टेरन, टेरांग, इंग्ही, इंग्ती।

5. कार्बी महिलाओं द्वारा परिधान किए गए कुछ वस्त्रों और अलंकारों के नाम लिखिए?

उत्तर: कार्यों महिलाओं द्वारा परिधान किए जाने वाले कुछ वस्त्रों में पोनी, पेकक और वांकक प्रमुख हैं तथा अलंकारों में लेक हिकी, नर्थेरपी, नलांगपंग, नजांगसाई, लेक रुवे आदि प्रमुख हैं।

6. संक्षिप्त में टिप्पणी लिखिए:

(क) सेमसनसिंग इंग्ली।

उत्तर: कार्बी आंग्लांग के स्वप्नद्रष्टा और रूपकार के रूप में प्रख्यात सेमसनसिंग इंग्ती का जन्म 8 फरवरी, 1910 को पश्चिम कार्बी आंग्लांग के टीका पहाड़ नामक स्थान में हुआ था। उनके पिता का नाम थेंकुरसिंग इंग्ती और माता का नाम रूथ माधवी (काजीर तीमूंग्पी) था। उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा सन् 1916 में गोलाघाट के मिशन स्कूल से प्रारम्भ कर 1928 में गोलाघाट बेजबरुवा हाईस्कूल से प्रथम श्रेणी में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। उच्च शिक्षा हेतु गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज में दाखिला लिया, किन्तु स्वाधीनता आंदोलन में भाग लेने के कारण पढ़ाई अधूरी रह गई। बाद में 1933 में सिलहट के मुरीरचंद कॉलेज से बी. ए. की परीक्षा उत्तीर्ण कर कार्बी समाज के प्रथम स्नातक बन गए। सन् 1934 में ब्रिटिश सरकार ने उन्हें नगांव जिले के शिक्षा विभाग में उप–निरीक्षक के पद पर नियुक्त किया। उन्होंने कार्बी समाज को शिक्षा प्रदान करने हेतु अनेक प्रकार के पाठ्य–पुस्तकों की रचना की, जिसमें ‘बिट्स अकिताप’, ‘कालाखा अकिताप’, ‘टेमपुरु और वपी’ आदि उल्लेखनीय है।

(ख) सामसिंग हांसे।

उत्तरः लेखक, कवि, गीतकार, उपन्यासकार, सिनेमा निर्माता, राजनेता, साहित्य प्रेमी के रूप में प्रख्यात सामसिंग हांसे का जन्म 18 अप्रैल, 1948 को नगांव जिले के सरुबाट के अन्तर्गत पंडितघाट गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम जयसिंग हांसे और माता का नाम काएट टेरनपी था। उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा टीका मध्य अंग्रेजी विद्यालय से प्रारंभ कर 1967 में बैठालांग्स उच्च अंग्रेजी विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की तथा 1973 में उन्होंने स्नातक की डिग्री हासिल की।

उन्होंने भाषा साहित्य के विकास हेतु कार्बी व असमीया भाषा में कई पुस्तकों की रचना की है, उनमें ताई हाईमू, कार्बी प्रणय गीत साबिन आलून, कुमलिन, कार्बी कविता आदि प्रमुख हैं। वे 1983–84 में कार्बी साहित्य सभा के सचिव तथा 1984–85 में अध्यक्ष चुने गए। सन् 1985 में विधानसभा चुनाव में डिफू सीट से विजयी होकर कैबिनेट मंत्री बने। कार्बी भाषा–साहित्य के साधक और पथ प्रदर्शक सामसिंग हांसे का 13 जनवरी, 1998 को देहांत हो गया।

(ग) बंगलंग तेरांग।

उत्तरः कार्बी साहित्य के पुरोधा बंगलंग तेरांग का जन्म 10 अक्टूबर, 1909 को दिलाई नदी के किनारे निहांगलांग्सों नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता का नाम सार तेरांग तथा माता का नाम कारेंग तिस्सपी था। सर्वप्रथम उन्होंने ही कार्बी साहित्य को लिखित रूप प्रदान किया था। उन्होंने मात्र 13 वर्ष की अवस्था में साहित्य साधना शुरू कर दी थी तथा अनेक प्रकार की पुस्तकों की रचना की, जिनमें वर्ड बुक (Word Book), आदाम आसार (विवाह नियम), रुकासेन, हाईमू, कार्बी कपूसन, कार्बी सरंगजे, रंगलीन आदि उल्लेखनीय हैं। सन् 1973 में कार्बी साहित्य सभा ने उन्हें कार्बी साहित्य के पुरोधा व्यक्ति के रूप में पुरस्कृत किया तथा असम सरकार ने उन्हें एक सौ रुपए की वित्तीय मदद के साथ ही साहित्यिक पेंशन भी प्रदान किया। ऐसे महान व्यक्तित्व का अन्त। 17 जुलाई, 2001 को हो गया।

(घ) लंकाम तेरन।

उत्तर: साहित्यकार के रूप में प्रसिद्ध लंकाम तेरन का जन्म सन् 1932 में हुआ था। उनके पिता का नाम डिप्लू तेरन और माता का नाम कासाई हसिपी था। सन् 1957 में कासे रंगहांग्पी के साथ उनका विवाह हुआ। वे 1964 में मिकिर पहाड़ी जिला परिषद के जन सम्पर्क अधिकारी भी बने। उन्हें कार्बी आदरबार का महासचिव तथा अध्यक्ष भी चुना गया था। वे कार्बी साहित्य के संस्थापक तथा अध्यक्ष थे तथा 1986 में उन्हें असम साहित्य सभा का उपाध्यक्ष भी बनाया गया। उन्होंने अनेक प्रकार की पुस्तकों का लेखन, संकलन और अनुवाद किया था। उनके द्वारा लिखित पुस्तकों में रंग केसेंग, तामाहीदी, किताब किमी, कार्बो लामकुरु, कार्बी जनगोष्ठी आदि उल्लेखनीय हैं।

अतिरिक्त प्रश्न एवं उत्तर:

1. कार्वी कौन हैं? वे कहाँ रहते हैं?

उत्तरः कार्बी असम को एक प्रमुख जनजाति है। कार्बो लोग मुख्यतः कार्यों आंग्लांग में रहते हैं। इसके अलावा शोणितपुर, विश्वनाथ, लखीमपुर, कामरूप आदि स्थानों में भी बसे हुए हैं।

2. कार्वी जैकेट और कार्बी मफलर को क्या कहते हैं? 

उत्तरः कार्बी जैकेट को ‘सई हंगथर’ और कार्बी मफलर को ‘पहो’ कहते हैं।

3. कार्बी युवा महोत्सव कब और कहाँ आयोजित होता है? 

उत्तरः कार्बी युवा महोत्सव हर साल 15 से 19 फरवरी तक डिफ शहर में आयोजित होता है।

4. सामसिंग हांसे की किन्हीं दो पुस्तकों के नाम लिखिए?

उत्तर: सामसिंग हांसे ने कार्बी और असमीया भाषा में कई पुस्तकों की रचना की है, जिनमें ‘ताई हाईमू’, साबिन आलून आदि प्रमुख हैं।

5. सजून उत्सव क्या है?

उत्तरः सजून उत्सव कार्बी लोगों का एक घरेलू पर्व है। यह 4, 5 या 9 साल के अंतराल पर मनाया जाता है।

6. कार्बी साहित्य सभा के संस्थापक अध्यक्ष कौन थे? 

उत्तर: कार्बी साहित्य सभा के संस्थापक अध्यक्ष ‘लंकाम तेरन’ थे।

7. पिबा क्या है?

उत्तरः पिवा कार्बी महिलाओं का पारंपरिक वस्त्र है। यह डेढ़ फीट से दो फीट चौड़ा और 6 फीट लंबा होता है। दोनों सिरे पर कौड़ियों से जुड़े चमकीले काले कपड़े होते हैं। काबी महिलाएँ पिबा में बच्चों को रखकर साथ ले जाती हैं।

कोच–राजवंशी

सारांश:

विद्वानों का मानना है कि सभी राजवंशी लोग मूलतः कोच जाति से संबंधित हैं। इसलिए उन्हें असम में कोच–राजवंशी कहा जाता है। ये लोग असम, उत्तर बंगाल नेपाल, भूटान, बिहार, मेघालय और बांग्लादेश में रहते हैं। कोच–राजवंशी हिंदू धर्मावलंबी हैं। कुछ लोगों का मानना है कि कोच और राजवंशी दो अलग–अलग समुदाय हैं। लेकिन यह सटीक नहीं है। कई स्थलों पर सिर्फ कोच और सिर्फ राजवंशी लिखा जाता है, लेकिन राजवंशी का मूल कोच ही है। अनेक स्थानों पर कोच लोग प्राचीन कीच भाषा और संस्कृति का पालन करते आ रहे हैं। जो आर्येतर धारा है। दूसरी ओर, राजवंशी लोगों की भाषा–संस्कृति आर्य है। दो अलग–अलग भाषा संस्कृति का पालन करने के बावजूद नृतात्विक रूप से सभी कोच–राजवंशी लोगों का मूल कोच ही माना गया है। अलग–अलग स्थान पर ये लोग कोच, कोच–राजवंशी, क्षत्रिय राजवंशी या राजवंशी, किसी स्थान पर सिर्फ क्षत्रिय के रूप में जाने जाते हैं। ये लोग भले ही अपना परिचय क्षत्रिय के रूप में देते हैं, फिर भी आर्य क्षत्रिय नहीं हैं। इन सबकी संस्कृति पर जनजातीय प्रभाव स्पष्ट है।

सरकारी तौर पर इन लोगों को अब तक जनजाति का दर्जा नहीं मिला है, फिर भी इन्हें जनजाति कहना ही उचित होगा। असम, बंगाल, बिहार, नेपाल और बांग्लादेश आदि स्थानों पर ये लोग राजवंशी के रूप में जाने जाते हैं। बाद में महाही, हाजंग, जलधा, धिमाल, झलो, मालो आदि अनेक छोटी–छोटी जनगोष्ठियों के लोग राजवंशी के रूप में अपना परिचय देने लगे, लेकिन ये मूलतः कोच ही हैं। इस संबंध में प्रसिद्ध इतिहासकार बुकानन हैमिल्टन का कहना है– “मुझे कोई संदेह नहीं है कि कोच जनजातीय लोगों की उत्पत्ति एक ही उत्स से हुई है और अधिकतर राजवंशी कोच हैं।”

कोच–राजवंशी लोगों की भाषा एवं संस्कृति अनूठी और समृद्ध है। भारतवर्ष में आर्यों ने जो वर्ण आधारित समाज व्यवस्था स्थापित की, उससे कोच–राजवंशी की समाज–व्यवस्था पूरी तरह अलग है। समय के प्रवाह के साथ ये लोग आर्य समाज व्यवस्था के अंतर्गत आ चुके हैं, फिर भी आर्य क्षत्रिय हिंदुओं की संस्कृति के साथ इनकी समानता नहीं है। हिंदू आचार–नीति अपनाने के बावजूद कोच–राजवंशी का अपना आचार–संस्कार, परंपरा, पूजा–पाठ, धर्म–विश्वास, खाद्य–रुचि, पोशाक–परिधान, अलंकार, गीत–संगीत आदि विद्यमान है। जन्म–मृत्यु, विवाह में अपनी आचार–नीति, मरने के बाद आत्मा के अस्तित्व का विश्वास, मृतक के प्रति श्रद्धा, तंत्र–मंत्र पर विश्वास, प्रकृति पूजा, जीव–जंतु की पूजा, सड़क पूजा, विषहरी पूजा, भूत–प्रेत पर विश्वास आदि कोच–राजवंशी को अर्ध हिंदू और जनजातीय पहचान दिलाते हैं। समग्र रूप से देखा जाए तो कोच–राजवंशी लोगों की संस्कृति पर बौद्ध, शैव, शाक्त का प्रभाव पड़ा है और हिंदू धर्म के प्रति आकृष्ट होने के कारण प्राचीन धार्मिक प्रभाव, शंकरी वैष्णव और गौड़ीय प्रभाव नजर आते हैं। इन सबके अलावा कोच–राजवंशी लोगों की संस्कृति में प्राचीन जनजाति की विशेषता मुख्य रूप से नजर आती है। असम के सामग्रिक विकास एवं प्रगति में कोच–राजवंशी का योगदान सराहनीय रहा है।

पाठ्यपुस्तक संबंधित प्रश्न एवं उत्तर:

1. कोच–राजवंशी लोगों का धर्म क्या है? 

उत्तर: कोच–राजवंशी लोग हिंदू धर्मावलंबी हैं।

2. कोच–राजवंशी लोगों की भाषा और संस्कृति के बारे में लिखिए। 

उत्तर: कोच–राजवंशी लोगों की भाषा और संस्कृति समृद्ध है। भाषाविद् ग्रियर्सन के अनुसार कोच–राजवंशी लोगों की भाषा के शब्द–भंडार, शब्द–रूप, सर्वनाम, उच्चारण भंगिमा, वाक्य संरचना, मौखिक व लिखित साहित्य की एक अलग पहचान है।

इनकी संस्कृति अनूठी है। भारतीय दृष्टिकोण से आर्य समाज की जो व्यवस्था है उससे कोच–राजवंशी की समाज–व्यवस्था थोड़ा भिन्न है। कोच–राजवंशी लोग हिंदू धर्म अपनाने के बावजूद उनका धार्मिक विश्वास, पूजा विधि, संस्कार परंपरा, खान–पान, पोशाक परिधान अलग है। 

निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कोच–राजवंशी लोगों के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में हिंदू, बौद्ध, शैव, शाक्त का प्रभाव होने के बावजूद इनकी संस्कृति में प्राचीन जनजाति की विशेषताएँ भी खास तौर पर नजर आती हैं।

3. कोच–राजवंशी लोगों के भोजन और वेशभूषा के बारे में लिखिए?

उत्तर: कोच–राजवंशी लोगों के भोजन और वेशभूषा भी उनकी खास पहचान दर्शाते हैं। कोच–राजवंशी लोग पारंपरिक तौर पर सेका, पेलका, भेलका, सिदल, सुट्का, तोपला भात आदि खाते हैं। वे वेशभूषा के रूप में वर्तमान प्रचलित परिधान पहनते हैं किंतु उनकी पारंपरिक पोशाक का महत्व खास और अनूठा है। कोच–राजवंशी जाति के पुरुष धोती–कुर्ता और रंगीन मफलर या गमछा लेते हैं जबकि महिलाएँ पाटानी, बुकुनी, फोटा, सेउता का व्यवहार करती हैं।

4. कोच–राजवंशी लोगों के गीत–संगीत क्या–क्या हैं?

उत्तर: कोच–राजवंशी लोगों के अनेक गीत–संगीत हैं, जैसे–भवाईया गान, विभिन्न पूजा के गीत, रावण गान, कुषाण गान, दोतारा गान, बिषहरी पूजा का गान, मारी पूजा का गान, तुक्खा गान, लाहांकरी गान, नटुवा, सांगी ढाक का गान, डाक नाम, जाग गान आदि।

5. संक्षेप में टिप्पणी लिखिए–

(क) जन नेता शरतचंद्र सिंह।

उत्तरः बहुमुखी प्रतिभा के धनी जननेता शरतचंद्र सिंह असम के मुख्यमंत्री थे। वे सन् 1972 से 1978 तक असम के मुख्यमंत्री रहे। इनका जन्म 1 जनवरी, 1914 को हुआ था। इनके पिता का नाम लालसिंग सिंह और माता का नाम आयासिनी सिंह था। वे सही अर्थों में जनता के नेता थे, इसलिए उनको जननेता कहा जाता था। वे महात्मा गाँधी के आदर्श से अनुप्रेरित थे। सरल जीवन उच्च विचार उनका आदर्श था। जनता की सेवा करना ही शरतचंद्र सिंह के जीवन का संकल्प था। मुख्यमंत्री रहते समय उन्होंने विकास की कई योजनाएँ शुरू की थीं, जैसे–आपातकालीन रबी फसल योजना, गांव पंचायत सहकारी समिति, कृषि निगम, आकलन पत्र योजना, निगरानी कोष योजना, शैक्षिक संस्थान सुधार योजना, शिलांग से दिसपुर तक अस्थायी राजधानी का स्थानांतरण आदि। इनकी मृत्यु 24 दिसंबर, 2005 को हुई।

(ख) अंबिका चरण चौधरी।

उत्तरः अंबिका चरण चौधरी एक विशिष्ट समाजसेवी और उच्च कोटि के साहित्यकार थे। उन्होंने अनेक पुस्तकों की रचना की है। अंबिका चरण चौधरी विद्यार्थी जीवन से ही लोगों की सेवा में रुचि लेते थे। सन् 1953–54 में पलाशबाड़ी, मिर्जा इलाके में बाढ़ और भूस्खलन से प्रभावित लोगों की सहायता करने की वजह से तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उनकी भूरि–भूरि प्रशंसा की थी। लगभग 32 पुस्तकों के रचयिता अंबिका चरण चौधरी को सन् 1961 में असम साहित्य सभा के ग्वालपाड़ा अधिवेशन में ‘रत्नपीठ का रत्न’ सम्मान से सम्मानित किया गया था। इसके अलावा उन्हें ‘कामतारत्न’ साहित्यिक पेंशन, महेंद्रनाथ बड़ा पुरस्कार, शिक्षण बांधव आदि सम्मान से अलंकृत किया गया था।

16 अगस्त, 1930 को बंगाईगांव जिले के अंतर्गत बरपाड़ा नामक गाँव में इस महान व्यक्ति का जन्म हुआ था। उनके पिता नरेश्वर चौधरी थे और माता काशिरवरी चौधरी थीं। कॉटन कॉलेज से दर्शनशास्त्र में उन्होंने ऑनर्स के साथ स्नातक की डिग्री हासिल की। अंबिका चरण चौधरी नौकरी करते हुए अंग्रेजी, असमीया भाषा में अनेक पुस्तकें और लेख लिखे। उनका अंग्रेजी, असमीया और राजवंशी तीनों भाषाओं पर समान अधिकार था।

(ग) अरुण कुमार राय।

उत्तर: अरुण कुमार राय भी कोच–राजवंशी समुदाय से आते हैं। कोच–राजवंशी साहित्य सभा की स्थापना में उनकी अग्रणी भूमिका रही है। अरुण कुमार राय का जन्म 8 अक्टूबर, 1925 को हुआ। उनका निवास बंगाईगाँव के सीपन सीला गाँव में था। उनके पिता का नाम प्रकाश चंद्र राय और माता का नाम अभयेश्वरी राय था। वर्तमान के चिरांग जिले के बेंगतल, प्राथमिक विद्यालय से प्रारंभिक शिक्षा पानेवाले अरुण कुमार राय ने बंगाईगाँव बीरझरा उच्च माध्यमिक स्कूल से एंट्रेंस तक ही पढ़ाई की। वामपंथी विचारधारा का प्रचार करने के कारण उनको जेल भी जाना पड़ा था। वे किसान आंदोलन में सक्रिय रूप से जुड़े थे। सन् 1974–75 में उन्हें कोकराझाड़ महकमा परिषद का अध्यक्ष भी बनाया गया। सन् 1983 में उन्हें उत्तर शालमारा महकमा परिषद का अध्यक्ष बनाया गया। वे आजीवन कोच–राजवंशी जनजाति की भाषा–साहित्य–संस्कृति की उन्नति के लिए काम करते रहे। उन्होंने नाटक, कविता और शब्दकोश भी लिखे। उनकी कुल 10 पुस्तकें प्रकाशित हैं। सन् 2004 में उन्हें असम सरकार की ओर से साहित्यिक अनुदान भी दिए गए थे। कोच–राजवंशी साहित्य सभा ने उन्हें मरणोपरांत ‘साहित्य रत्न’ का सम्मान प्रदान किया।

(घ) रुक्मिणी कांत राय।

उत्तर: कोच–राजवंशी समुदाय के पश्चिम असम के बुद्धिजीवी, शिक्षाविद्, राजनीतिविद्, समाजसेवी और हास्य रसिक व्यक्ति (व्यंग्यकार) के तौर पर रुक्मिणी कांत राय का नाम प्रसिद्ध है। साधारण परिवार में जन्मे रुक्मिणी कांत राय विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त कर वे जीवन में सफलता हासिल करने में कामयाब हुए थे। सामाजिक–सांस्कृतिक, शैक्षिक, राजनीतिक, धार्मिक जीवन के विभिन्न पहलुओं में उन्होंने आदर्श स्थापित किया था। वे विद्यार्थी–जीवन से ही मेधावी थे।

उन्होंने गौहाटी विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में प्रथम श्रेणी में द्वितीय स्थान प्राप्त किया था। उन्होंने समाजसेवा के लिए कई स्कूलों, कॉलेजों और मठ–मंदिरों की स्थापना की। अपनी विलक्षण प्रतिभा के बल पर वे एक साधारण क्लर्क की नौकरी से वे कॉलेज के प्राध्यापक प्राचार्य और बाद में विधायक भी बने। उनका भाषण सुनकर जनता मंत्र–मुग्ध हो जाती थी।

(ङ) ‘दूरंत तरुण’ पानीराम दास।

उत्तर: आजीवन शुद्ध खादी धोती–कुर्ता धारण करने वाले, समय की रेत पर अपने कदम के निशान बनाने वाले, देशप्रेम का आदर्श सामने रखकर समझौता किए बगैर निरंतर संग्राम चलानेवाले, समाज सेवी, स्वतंत्रता सेनानी पानी राम का जन्म 7 अप्रैल, 1917 को मंगलदै के समीप जलजली गाँव में एक साधारण किसान परिवार में हुआ था। उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। सन् 1941 में महात्मा गाँधी के सत्याग्रह में शामिल होकर जेल की सजा काटी थी। इनकी मृत्यु 30 नवंबर, 2010 को हुई। इन्हें राष्ट्रीय मर्यादा के साथ अंतिम विदाई दी गई। स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर इनका नाम सम्मान से हमेशा लिया जाएगा।

अतिरिक्त प्रश्न एवं उत्तर:

1. कोच–राजवंशी लोग कहाँ रहते हैं?

उत्तर: कोच–राजवंशी लोग मुख्य रूप से असम, उत्तर बंगाल, नेपाल, भूटान, बिहार, मेघालय और बांग्लादेश में रहते हैं।

2. राजवंशी लोग किस जाति से संबंधित हैं?

उत्तरः राजवंशी लोग मूलतः प्राचीन कोच जाति से संबंध रखते हैं। 

3. कोच–राजवंशी लोगों के बारे में विद्वान बुकानन हैमिल्टन के क्या कहा था? 

उत्तर: कोच–राजवंशी लोगों के बारे में विद्वान बुकानन हैमिल्टन का कहना है–मुझे कोई संदेह नहीं है कि कोच जनजाति के लोगों की उत्पत्ति एक ही स्रोत से हुई है और अधिकांश राजवंशी कोच हैं।

4. विश्व सिंह कौन थे?

उत्तर: विश्व सिंह कोच राजा थे, जिन्होंने 16वीं शताब्दी में अपना साम्राज्य स्थापित किया था।

5. कोच–राजवंशी लोगों की किन्हीं दो धार्मिक पूजा का नामोल्लेख कीजिए?

उत्तरः कोच–राजवंशी लोग अनेक धार्मिक पूजा करते हैं, जैसे–सड़क पूजा, यात्रा पूजा आदि।

कछार की जनगोष्ठियाँ:

सारांश:

असम में विभिन्न जातियाँ–उपजातियाँ एक साथ रहती हैं। इन सबको मिलाकर ही बृहत्तर असमीया जाति का गठन हुआ है। दूसरी स्थानीय जनगोष्ठियों की तरह असमीया जाति गठन प्रक्रिया में भागीदार गरिया, मरिया और देशी के नाम से प्रख्यात इस्लाम धर्मावलंबी स्थानीय लोग असम की प्राचीन जनगोष्ठियों के अंश हैं। सन् 1205–06 में तिब्बत–चीन जीतने के मकसद के साथ बंग के तुर्की सेनापति बख्तियार खिलजी के नेतृत्व में कामरूप में प्रवेश करनेवाले मुसलमान सैनिक कामरूप के राजा पृथु के हाथों शोचनीय रूप से पराजित हुए और कुछ सैनिक असम में ही बस गए। वक्त बीतने के साथ–साथ वे इस्लाम को अपनाकर भी असम की भाषा–परंपरा–संस्कृति के साथ घुलते–मिलते चले गए। सदियों से धर्म निरपेक्ष समाज संस्कृति को अपनाने वाले असमीया लोगों के जाति गठन की प्रक्रिया में गरिया, मरिया और देशी लोगों का योगदान सराहनीय रहा है।

पाठ्यपुस्तक संबंधित प्रश्न एवं उत्तर:

1. बख्तियार खिलजी ने असम में कब प्रवेश किया था?

उत्तरः बख्तियार खिलजी ने सन् 1205–06 में असम में प्रवेश किया था।

2. ‘बख्तियार खिलजी ने किसलिए असम में प्रवेश किया था? 

उत्तरः तुर्की सेनापति खिलजी ने तिब्बत–चीन जीतने के मकसद से असम में प्रवेश किया था।

3. बख्तियार खिलजी को किसने परास्त किया था? 

उत्तरः बख्तियार खिलजी को कामरूप के राजा पृथु ने परास्त किया था।

4. इस्लाम धर्म में धर्मांतरित होने वाले प्रथम जनजातीय राजा का नाम क्या था?

उत्तर: इस्लाम धर्म के धर्मांतरित होनेवाले प्रथम जनजातीय राजा का नाम ‘आली मेस’ था।

5. ‘गरिया’ शब्द का विश्लेषण कीजिए। असम में गरिया किसे कहते हैं?

उत्तर: इस्लाम धर्म अपनानेवाले लोग जो मूल समाज से अलग छूट चुके समाज मे शामिल हो गए। ऐसे लोगों को ‘गरिया’ कहा जाता है। इनका बृहत्तर असमीया समाज में विशेष स्थान है।

6. आहोम काल में असम में कुछ स्थानीय लोगों द्वारा इस्लाम धर्म अपनाने के दो कारण लिखिए।

उत्तरः आहोम काल में असम में कुछ स्थानीय लोगों द्वारा इस्लाम धर्म अपनाने के दो कारण निम्नलिखित है–

(i) विभिन्न पीर–फकीरों के संदेश के प्रभाव से हिंदू धर्मावलंबी लोगों के मन पर इस्लाम का गहरा असर पड़ा था। 

(ii) जनजातीय राजा मेस के इस्लाम धर्म अपनाने के बाद राजा के साथ अधिकांश प्रजा भी इस्लाम के प्रति आकर्षित हुई थी।

7. मरिया और देशी जनगोष्ठी के बारे में वर्णन कीजिए?

उत्तरः आहोम शासनकाल में पीतल–कांसे के धंधे से जुड़े मुसलमानों को ‘मरिया’ के नाम से जाना जाता है। ऊपरी असम के कुछ इलाके, नगाँव जिला, निचले असम की गुवाहाटी के उजान बाजार और कामरूप के हाजो में मरिया लोग रहते हैं। देशी लोग मुख्य रूप से अविभाजित ग्वालपाड़ा जिले में रहते हैं। इस इलाके में कोच– राजवंशी भाषा–संस्कृति सम्पन्न स्थानीय मुसलमान देशी या देशी मुसलमान कहलाते हैं। देशी लोग खासकर कोच–राजवंशी, मेस–कछारी आदि स्थानीय जनगोष्ठियों में धर्मांतरित लोग हैं।

8. महान असमीया समाज गठन का उदाहरण किसने किसके राज में प्रस्तुत किया?

उत्तरः महान असमीया समाज गठन का उदाहरण अजान फकीर ने आहोम राज में प्रस्तुत किया।

9. संक्षिम लिखिए–

(क) बाघ हजारिका।

उत्तर: इनका असली नाम इस्माइल सिद्दीकी था। बाघ को युद्ध में परास्त करने की वजह से इनका नाम बाघ पड़ा और आहोम शासन ने उनके अदम्य साहस और दक्षता को देखते हुए हजारिका का पद प्रदान किया था। शराइघाट युद्ध में इन्होंने अपना पराक्रम दिखलाया था।

(ख) अज़ान फकीर साहब।

उत्तर: इस्लाम धर्म के प्रचार में अजान फकीर की भूमिका अहम है। इन्होंने इस्लाम धर्म की वाणियों को सहज–सरल भाषा में प्रचारित किया। इनका दूसरा नाम शाह मिलन है। वे सुदूर बगदाद से इस्लाम धर्म प्रचार करने के लिए असम आए और यहीं बस गए। उन्होंने कुल 108 जिकिर की रचना की, जो असमीया भाषा की अनमोल धरोहर है।

(ग) सैयद अब्दुल मलिक।

उत्तर: सैयद अब्दुल मलिक एक प्रसिद्ध असमीया साहित्यकार थे। इनका जन्म गोलाघाट जिले के नाहरनी गाँव में 16 मई, 1919 को हुआ था। उनके पिता का नाम सैयद रहमत अली था। अब्दुल मलिक की पहली कहानी ‘बंध कोठा’ थी। उन्होंने कहानियों, उपन्यासों, नाटकों, कविताओं की अनेक पुस्तकें लिखीं। ‘अघरी आत्मार काहिनी’ उपन्यास के लिए उनको साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला। असम साहित्य सभा ने उन्हें साहित्याचार्य की उपाधि दो। इसके अलावा उन्हें असम उपत्यका सम्मान, अजान पीर सम्मान जैसे कई पुरस्कार व सम्मान मिले। पद्मश्री और पद्मभूषण से सम्मानित इस साहित्यकार की मृत्यु 19 दिसंबर, 2002 को हुई।

(घ) नवाब साहिदूर रहमान।

उत्तरः नवाब साहिदूर रहमान एक क्रांतिकारी नेता थे। वे सुभाष चंद्र बोस की ‘आजाद हिंद फौज’ के प्रमुख नेता थे। आजादी की लड़ाई में ये शहीद हो गए। 31 मार्च, 1945 को मित्र वाहिनी के बम धमाके की वजह से इनकी मौत हो गई।

(ङ) फकरुद्दीन अली अहमद।

उत्तरः फकरुद्दीन अली अहमद भारत के पूर्व राष्ट्रपति थे। इनका जन्म 13 मई, 1905 को दिल्ली में हुआ। उन्होंने केंब्रीज सेंट कैथोलिक कॉलेज से इतिहास में स्नातक और लंदन के इनरटेंपल से ‘बार एट लॉ’ की डिग्री हासिल की थी। सन् 1931 में असम लौटकर वकालत करने के साथ राजनीति में उन्होंने कदम रखा। सन् 1966 में संसदीय चुनाव जीतकर केंद्रीय मंत्री बने। फिर 1974 में भारत के राष्ट्रपति बने। असम के इस सुपुत्र का निधन 19 फरवरी, 1977 को दिल का दौरा पड़ने से हुआ।

अतिरिक्त प्रश्न एवं उत्तर:

1. ‘जिकिर’ की रचना किसने की? 

उत्तरः अजान फकीर ने ‘जिकिर’ की रचना की थी।

2. बाघ हजारिका का असली नाम क्या था?

उत्तर: बाघ हजारिका का असली नाम इस्माइल सिद्दीकी था।

3. बहादुर गाँवबूढ़ा कौन थे?

उत्तर: बहादुर गाँवबूढ़ा एक स्वतंत्रता सेनानी थे। सन् 1857 के सिपाही विद्रोह के दौरान असम के तत्कालीन स्वतंत्रता सेनानी मणिराम देवान, पियली बरुवा आदि के साथ बहादुर (बाहदिल) ने भी योगदान किया था। अंग्रेजों के खिलाफ बगावत के आरोप में उनको आजीवन कालापानी की सजा सुनाई गई।

4. ‘धन्य नर तनु भाल’ किसकी रचना है?

उत्तर: ‘धन्य नर तनु भाल’ श्रीमंत शंकरदेव के जीवन और कर्म पर आधारित एक असमीया उपन्यास है, जिनकी रचना सैयद अब्दुल मलिक साहब ने की थी।

गारो

सारांश:

‘गारों’ असम की एक प्राचीन जनजाति है। इस समुदाय के कुछ लोग स्वयं को मंगोल मानते हैं। गारो लोग भाषाई दृष्टि से इंडो–चीन के अंतर्गत तिब्बत–बर्मी बोड़ो भाषा परिवार से संबंधित हैं। गारो समुदाय के लोग पश्चिम बंगाल से लेकर पूर्वोत्तर के प्रायः सभी राज्यों में फैले हुए हैं। इसके अलावा बांग्लादेश के कई इलाकों में भी गारो समुदाय के लोग रहते हैं। गारो समुदाय के कई उप समुदाय भी हैं, जैसे–आमवेंग, मावसी, माताबेंग, गारागानसी, दुवाल, रुगा और मेगाम आदि।

किंवदंतियों के अनुसार गाये लोगों के पूर्वज तिब्बत के थरुवा नामक स्थान पर रहते थे। एक बार वहाँ अकाल पड़ने के कारण जापफा, जालीमफा, चुकफा, बंगिफा और बिजिंफा आदि की अगुवाई में उस स्थान को छोड़कर हिमालय पहाड़ पारकर सोधे कोचबिहार आ गए और वहाँ काफी लंबे समय तक रहे। लेकिन वहाँ से असम आने के समय उन्हें घुबड़ी और बिजनी जैसे छोटे–छोटे राज्यों के राजाओं के साथ युद्ध करना पड़ा। अंत में राजा आब्रासेन ने हाब्राघाट में अपनी राजधानी बनाई और आस–पास के इलाके को अपने राज्य में मिला लिया। दूसरी ओर, कुछ एक–दूसरे से नाराज होकर अलग–अलग स्थानों की ओर चले गए। एक समूह गारो पहाड़ तो दूसरा समूह बांग्लादेश जाकर रहने लगा।

जहाँ तक धार्मिक आस्था की बात है तो गारो लोगों के पूर्वज पूजा–पाठ करते थे। पूजा करने वालों को गारो लोग ‘संसारेक’ कहते हैं। इनके देवी–देवता थे चालजंग, गवेरा, खालखामे, आसिमा, डिंगसिमा, सुसिमे आदि। देवी–देवताओं की पूजा में पालतू पशुओं की बलि दी जाती थी, लेकिन उन्नीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में गारो लोगों ने ईसाई धर्म अपनाना शुरू किया और पूजा–पाठ भी परंपरा खत्म होने लगी। कालांतर में गारो लोगों का मुख्य ‘उवानगालाओ’ भी विलुप्त हो गया।

सामाजिक रूप से गारो परिवार का गठन माँ से शुरू होता है। गारो लोग स्वभाव से गुस्सैल और उग्र होते हैं। यही कारण है कि पड़ोसी राजा उन पर शासन नहीं कर पाए। यहाँ तक कि अंग्रेजों ने दमन नीति के बदले मिशनरियों की मदद से धर्म प्रचार का सहारा लिया। जगह–जगह पर गिरजाघर, विद्यालय आदि की स्थापना कर मिशनरियों को मिशन संचालित करने दिया गया। गारो लोग रंग–बिरंगी पोशाक पहनते थे। वे घुटनों तक ही कपड़े पहनते थे। वर्तमान में कुछ गारो लोग भी आधुनिक कपड़े पहनने लगे हैं। गारो जनसमुदाय के लोग मांसाहारी हैं। वे मुर्गा, सूअर और गौ मांस खाते हैं। सूखी मछली और खार गारो लोगों का प्रिय भोजन है।

गारो जनजाति का प्राचीन परंपरा, लोकाचार, परिवार गठन, विवाह आदि का विशेष महत्व है। बृहत्तर असमीया समाज गठन में गारो लोगों की भूमिका भी प्रशंसनीय रही है।

पाठ्यपुस्तक संबंधित प्रश्न एवं उत्तर:

1. गारो लोगों की उप–जनगोष्ठियाँ कौन–कौन–सी हैं?

उत्तरः गारो लोगों की उप–जनगोष्ठियाँ हैं– आमबॅग, मातसी, माताबेंग, गारागानसी, दुवाल, रुगा और मेगाम।

2. गारो बहुल इलाके कौन–कौन–से हैं?

उत्तरः गारो जनगोष्ठी के लोग पश्चिम बंगाल से पूर्वोत्तर के प्रायः सभी राज्यों में फैले होने के अलावा बांग्लादेश के कई इलाकों में रहते हैं।

3. गारो समुदाय में पूजा करने वाले व्यक्ति को क्या कहा जाता है?

उत्तरः गारो समुदाय में पूजा करनेवाले व्यक्ति को ‘संसारेक’ कहा जाता है।

4. प्रारंभ में गारो लोगों का धर्म क्या था और बाद में कौन–सा धर्म अपना लिया?

उत्तरः प्रारंभ में गारो लोग पूजा–अर्चना करते थे। अतः वे हिंदू धर्मावलंबी थे। बाद में उन लोगों ने ईसाई धर्म अपना लिया।

5. गारो लोगों के प्रधान वाद्य यंत्र क्या–क्या है?

उत्तरः गारो लोगों के प्रधान वाद्य यंत्र हैं– ढोल, गगना, भैंस की सींग से निर्मित बाँस की पाइप लगी बाँसुरी आदि।

6. संक्षिप्त टीका लिखो:

(क) रामखे ओवाचे मोमीन।

उत्तरः गारो समाज में रामखे ओवाथ्रे मोमीन का स्थान सर्वोपरि था। वे गारो समाज के मार्गदर्शक माने जाते हैं। रामखे गारो समाज के प्रथम साहित्यकार, गीतकार व शिक्षाविद थे, जिन्होंने समाज के सामूहिक विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

इनका जन्म सन् 1834 में मेघालय राज्य के उत्तर गारो पहाड़ पर स्थित ‘माटडक ग्रे’ नामक एक पहाड़ी गाँव में हुआ था। इन्होंने 8 फरवरी, 1863 को डॉ. माइल्स बनसन से ईसाई धर्म ग्रहण किया था। रामखे ओवाथ्रे मोमीन ने ईसाई मिशनरियों के प्रभारी के रूप में भी काम किया था। इन्होंने चालीस गारो सदस्यों को लेकर सबसे पहले एक ईसाई मिशनरी के रूप में एक गिरजाघर की स्थापना की थी। इसके बाद डामरा में मिशन की स्थापना की और एक ‘स्कूल भी खोला। रामखे सिर्फ एक शिक्षक ही नहीं बल्कि एक लेखक भी थे। सन् 1990 में उनकी हस्त लिखित कला और संस्कृति को मेघालय सरकार ने प्रकाशित किया। पूवोत्तर भारत के जनजातीय लेखकों में रामखे अन्यतम थे।

(ख) रेवरेंड गिलबर्थ के मराक।

उत्तर: रेवरेंड गिलबर्थ के मराक का जन्म सन् 1925 में पशचम खासी पहाड़ और दक्षिण कामरूप जिले की सीमा पर अवस्थित रांग्सापाड़ा गाँव में हुआ था। उन्होंने सन् 1960 में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। रेवरेंड गिलबर्थ ईसाई धर्म के प्रचारक के साथ–साथ शिक्षा के विकास के लिए भी काफी काम किए। गिलबर्थ के मराक स्विट्जरलैंड के जीनिवा के वर्ल्ड काउंसिल ऑफ क्रिशिचयन एजुकेशन के मुख्यालय में भारत के सलाहकार थे। उन्हें वर्ल्ड काउंसिल फॉर चर्च का सदस्य भी बनाया गया था। इन्होंने विशव के अनेक देशों का भ्रमण किया। इनकी कार्यक्षमता को देखते हुए ईसाई संगठनों ने उन्हें ‘रेवरेंड’ (अर्थात् श्रद्धेय) की उपाधि से सम्मानित किया था। इसलिए वे रेवरेंड गिलबथ के मराक नाम से विख्यात हुए। इन्होंने सन् 1972 में पवित्र बाईबल का गारो भाषा में अनुवाद किया था। इनकी मृत्यु सन् 2007 में मेघालय राज्य के तुरा शहर में हुई।

(ग) सोनाराम रंगरकग्रे सांगमा।

उत्तरः सोनाराम रंगरकग्रे सांगमा का जन्म सन् 1867 में उत्तर–पूर्व गारो पहाड और ग्वालापाड़ा जिले की सीमा पर अवस्थित नासिरंगदिक नामक गाँव में हुआ। निशानग्राम में प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने तुरा मिशन स्कूल में छठी तक की पढ़ाई की। उन दिनों गारो पहाड़ पर छठी कक्षा से ऊपर अर्थात् उच्च प्राथमिक विद्यालय था। अत: सोनाराम की शिक्षा छठी कक्षा के बाद समाप्त हो गई।

सोनाराम रंगरकग्रे सांगमा एक साहसी, आत्मविशवासी, परोपकारी और सबसे स्नेह–प्रेम रखनेवाले व्यक्ति थे। सोनाराम ने हमेशा अत्याचार और उत्पीड़न का विरोध किया और उन्हें जड़ से मिटाने की कोशिश की। उन्होंने गारो लोगों के हित में अंग्रेजों की नीतियों का खुलकर विरोध किया था। 21 अगस्त, 1916 को उनका निधन हो गया।

(घ) हावर्ड डेनिसन मोमीन।

उत्तरः हावर्ड डेनिसन मोमीन को ‘आधुनिक गारो साहित्य का जनक’ कहा जाता है। उन्होंने सबसे पहले ‘Achik Kurang’ (गारो लोगों की आवाज) नामक गारो भाषा की एक पत्रिका का प्रकाशन किया था। इनका जन्म 20 फरवरी, 1913 को मेघालय के तुरा शहर में हुआ था। इनके पिता जबांग डी मराक पढ़ाई के लिए अमेरिका जानेवाले गारो समाज के प्रथम व्यक्ति थे। जबांग डी मराक ने हावर्ड विश्वविद्यालय के ‘डेनिसन स्कूल’ में शिक्षा हासिल की थी। उसी की स्मृति में उन्होंने अपने बड़े पुत्र का नाम हावर्ड डेनिसन डब्ल्यू मोमीन रखा। हावर्ड डेनिसन डब्ल्यू मोमीन ने कोलकाता में पढ़ाई के समय अपना नाम बदलकर ‘हावर्ड डेनिसन मोमीन’ रख लिया।

हावर्ड डेनिसन मोमीन अंग्रेजी में स्नातकोत्तर डिग्री हासिल करनेवाले गारो समाज के प्रथम व्यक्ति थे। सन् 1940 में वे गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज में अंग्रेजी के प्राध्यापक नियुक्त हुए थे। उनकी प्रमुख पुस्तकें हैं– ‘Nangko Gisik Ragen’ (गारो बातचीत), ‘Do Ma Skini Git’ (चातकी चिड़िया का गीत), ‘Me. Chikaro Tamaku’ (महिला और तंबाकू), ‘Bilsi Gital’ (नववर्ष), ‘Sengwat (जुगनू) आदि।

अतिरिक्त प्रशन एवं उत्तर:

1. गारो समाज के लोग मुख्यतः किस भाषा–परिवार के अंतर्गत आते हैं? 

उत्तर: गारो समाज के लोग मुख्यतः इंडो–चीन के तिब्बत–बर्मी बोड़ो भाषा–परिवार से आते हैं।

2. गारो लोगों के पूर्वजों का संबंध किस स्थान से था और किस कारण वे वहाँ से आए? 

उत्तर: गारो लोगों के पूर्वज तिब्बत के थरुवा नामक स्थान पर रहते थे। एक बार भयंकर अकाल पड़ने के कारण वे वहाँ से आए।

3. ‘उवानगालाओ’ क्या है?

उत्तरः उवानगालाओ गारो लोगों का प्राचीन पर्व है, जो कालांतर में विलुप्त हो गया। 

4. गारो महिलाएँ क्या–क्या पहनती हैं?

उत्तर: गारो महिलाएँ परंपरागत पोशाक दागाबांदा, दागशारी, चुनी आदि पहनती हैं। 

5. गारो समाज मातृप्रधान है या पितृ प्रधान? 

उत्तर: गारो समाज मातृप्रधान है। माँ से ही गारो परिवार का गठन होता है।

6. प्राचीन काल में गारो युवाओं का शिक्षा–केंद्र क्या था? 

उत्तर: प्राचीन काल में गारो युवाओं का शिक्षा–केंद्र था–नकपांथे या डेकाचांग। यहाँ गाँव के सभी युवक एकत्र होकर हस्तकला, वाद्ययंत्र, खेल–कूद आदि सीखते थे।

साउताल (संथाल)

सारांश:

साउताल भी असम की एक जनगोष्ठी है। इनकी मातृभाषा संथाली है। साउवाल खुद को ‘होड़ हपन’ मानते हैं। प्रसिद्ध विद्वान सुनीति कुमार चट्टोपाध्याय (चटर्जी) साउताल शब्द की उत्पत्ति संस्कृत शब्द ‘समांतराल’ से मानते हैं। डॉ. वाणीकांत काकति के अनुसार असम में चाय उद्योग शुरू होने से बहुत पहले वर्तमान असम में रहनेवाले ‘साउताल’ लोग कामरूप में ही रहा करते थे।

साउताल लोगों की सामाजिक जीवन प्रक्रिया अनूठी है। वे गाँव बसाकर रहा करते हैं। गाँव के जनसाधारण को प्रणालीबद्ध तरीके से शासन करने के लिए गाँव के नागरिकों में से पाँच लोगों को चुनकर शासन करने का दायित्व सौंपा जाता है। उन पाँच व्यक्तियों को ‘मोड़े होड़’ कहा जाता है। ‘मोड़े होड़’, के प्रमुख को मुखिया या ‘माझी’ कहा जाता है। गाँव के किसी भी समस्या या आपसी विवादों की शिकायत माझी को दी जाती है। इस प्रकार साउताल समाज की समस्याएँ गाँव में ही सुलझ जाती हैं।

साउताल लोगों का समाज पितृप्रधान है। इनकी मुख्य आजीविका कृषि ही है। उर्वर कृषि भूमि की खोज में वे अपने निवास को बदलते रहते हैं। साउताल समाज के लोग गीत–नृत्य में भी रुचि रखते हैं। दंग नृत्य, दंग गीत, लंगड़े गीत, सहराई, बाहागीत आदि उनके प्रमुख गीत–नृत्य हैं। साउताल लोगों की वैवाहिक रीति–नीति, पोशाक–परिधान और पूजा–अर्चना की परंपरा अनूठी और अलग है। साउताल असम की प्राचीन जाति है।

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