Class 10 Ambar Bhag 2 Chapter 17 वैचित्र्यमय असम

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Class 10 Hindi Ambar Bhag 2 Chapter 17 वैचित्र्यमय असम

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मोरान:

सारांश:

मोरान असम की किरात मंगोलीय मूल की एक आदिम जाति है। ये असम तथा पूर्वोत्तर के विभिन्न स्थानों में बसे हुए हैं। मोरान लोग प्रागैतिहासिक काल से ही असम की भूमि पर निवास करते आए है। कलागुरु विष्णु प्रसाद राभा जी ने अपनी पुस्तक ” असमीया कृष्टि” में मोरान लोगों के बारे में उल्लेख करते हुए लिखा है कि “इसके समय में असम में तेजगति से ताम्र युग, कांस्य युग और लौह युग का आरंभ हुआ था।” डॉ. स्वर्णलता बरुवा के अनुसार “ईसा के जन्म से कई सदी पूर्व से ही मोरान लोग ब्रह्मपुत्र उपत्यका में रहते आ रहे हैं।” अर्थात् विद्वानों के अनुसार मोरान असम के आदिम निवासी हैं। मोरान जाति के अधिकांश लोग संरक्षित वनांचल के समीप गाँव बनाकर रहते आए हैं। 

वर्तमान में मोरान लोग तिनसुकिया, डिब्रुगढ़, शिवसागर, चराईदेव, जोरहाट, धेमाजी, गोलाघाट, नगाँव, शोणितपुर, लखीमपुर आदि जिलों में रह रहे हैं। मोरान लोगों का एक समृद्ध इतिहास है। चाउलुंग चुकाफा के समय मोरानों का एक स्वतंत्र राज्य था। उस समय मोरानों के राजा का नाम बड़ोसा या बदौसा था। यह मोरानों के अंतिम राजा थे। मोरान भी बोड़ो मूल की एक समृद्ध जाति है। अतीत काल में मोरानों में ‘बड़ोरुची’ नामक एक बोड़ो मूल की भाषा प्रचलित थी बिहू उत्सव मोरानों का प्रधान उत्सव है। वर्तमान में देउरी लोगों के बिहूकी तरह मोरान लोगों के बिहू को ‘मोरान बिहू’ के नाम से जाना जाता है। मोरान लोगों के बिहू नृत्य की भंगिमा, गीत के ताल-तय आदि की अपनी खास विशेषता है। ये लोग अतीत काल से ही देव-देवी की पूजा भी करते आ रहे हैं। मोरान लोग सदिया के केंसाईखाती मठ के साथ ही तिनसुकिया जिले के माकुम के यज्ञोखोवा, देओशाल, चराईदेव आदि देव-देवी की पूजा-अर्चना करते हैं।

पाठ्यपुस्तक संबंधित प्रश्न एवं उत्तर: 

1. तीन वाक्यों में मोरानों के नृ-गोष्ठीगत परिचय लिखिए।

उत्तरः मोरान वृहत किरात मंगोलीय परिवार की एक मुख्य जनजाति समूह है। ये लोग असम तथा उत्तर पूर्वांचल के आदिम अधिवासी हैं। विशाल हिमालय पर्वतमाला के दक्षिण पाददेश के असम तथा उत्तर-पूर्वांचल की इस उर्वर रम्यभूमि में मोरान लोग प्राचीन काल से ही रहते आए हैं।

2. असम और अरुणाचल के कौन-कौन से जिले में मोरानों की आबादी अधिक है?

उत्तर: असम के तिनसुकिया, डिब्रुगढ़, शिवसागर, जोरहाट, धेमाजी, चराईदेव और अरुणाचल के नामसाई तथा चांग्लांग जिले में मोरानों की आबादी अधिक है।

3. इतिहास में उल्लेखित बारह घर कछारियों के नाम लिखिए। 

उत्तर: इतिहास में उल्लेखित बारह घर कछारियों के नाम इस प्रकार हैं-दमसय (डिमासा), इनटुहजय (होजाई), बिहदय (बोड़ो), जुहल-लुइवा (लालुंग या तिवा), बादु सोनलय (सोनोवाल), इनटु मिनखँय (मोरान), दिउनय (देउरी), इनटु-मेचय (मेच), कुचुबयँ (कोच), इनटु-गारोय (गारो), राभा किराटय (राभा), बादु हजय (हाजोंग ) ।

4. मोरान भाषा के 10 शब्द लिखिए। 

उत्तरः मोरान भाषा के 10 शब्द इस प्रकार हैं-दि (पानी), सिम (नमक), माइ (धान), माइरुम (चावल), मियाम (भात), महन (मांस), चान (सूर्य), दान (चंद्र), हिंका (कपड़ा), खेरो (सिर) आदि। 

5. मोरानों के ऐतिहासिक युग के राज्य की चारों सीमाओं का उल्लेख कीजिए। 

उत्तरः मोरानों के ऐतिहासिक युग के राज्य की सीमा उत्तर में बुढ़ीदिहिंग, दक्षिण में दिसांग, पूर्व में सफाई और पश्चिम में ब्रह्मपुत्र तक फैली थी।

6. मोरानों के ऐतिहासिक युग के अंतिम राजा का नाम क्या था? 

उत्तरः मोरानों के ऐतिहासिक युग के अंतिम राजा का नाम बदौसा था।

7. मोरान लोग बोहाग बिहू कब और कैसे मनाते हैं? 

उत्तरः मोरान लोग बोहाग के प्रथम मंगलवार को देव-देवी की पूजा-अर्चना से बिहू का आह्वान कर मंगलवार को ‘उरुका’ बुधवार को ‘गरु बिहू’ और बृहस्पतिवार को ‘मानुह बिहू’ के रूप में सात दिन, सात रात तक बोहाग बिहू मनाते हैं। बिहू मोरानों का प्रधान उत्सव है।

8. मोरानों के दो पेशागत, दो गुणवाचक और दो स्थानवाचक खेलों के नाम लिखिए।

उत्तरः मोरानों के दो पेशागत खेल तेल पेरने वाला तेली, नाव निर्माण करने वाले नाओलीया, दो गुणवाचक खेल चिकरि और गनता है तथा हालधिबरीया, सौकाधरा स्थानवाचक खेल हैं।

9. मोरानों की जातीय खेती क्या है? 

उत्तरः मोरानों की जातीय खेती सुमथिरा या संतरा है।

10. मोरानों के युवाओं के दलपति का दायित्व कैसा होता है? 

उत्तरः मोरानों के युवाओं के दलपति का दायित्व होता है कि वह समाज प्रबंधन के कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले तथा अपने कर्त्तव्यों का पूर्णतः निर्वहन करे।

11. कहाँ-कहाँ मोरानों के देव देवियों के पूजा स्थल थे? 

उत्तरः मोरान लोगों के सदिया के केंसाइखाती मठ के साथ ही तिनसुकिया जिले के माकुम के यज्ञोखोवा, देओशाल, चराईदेव आदि में देव-देवियों के पूजा-स्थल थे।

12. टिप्पणी लिखिए:

(क) समन्वय के जनक किरात शौर्य बदौसा।

उत्तरः समन्वय के जनक किरात शौर्य बदौसा असम के प्रमुख आदिम अधिवासी किरात मंगोलीय परिवार के अन्तर्गत मोरानों के ऐतिहासिक युग के अंतिम राजा थे। बदौसा के अधीन उत्तर में बुढ़ीदिहिंग, दक्षिण में दिसांग, पूर्व में सफाई और पश्चिम में ब्रह्मपुत्र महानद के बीच का भूखंड एक समृद्ध मोरान राज्य था। वर्तमान के शिवसागर और डिब्रुगढ़ जिलों के कुछ हिस्से मोरान राज्य में थे।

कलागुरु विष्णुप्रसाद राभा ने अपनी ‘असमीया कृष्टि’ शीर्षक पुस्तक में उस काल के मोरान लोगों को प्रबल प्रतापी कहा है। उन्होंने बदौसा के शक्तिशाली प्रभाव की बात भी कही है। उस समय के सुदूर और दुर्गम पहाड़ पर्वतों तक मोरानों के आधिपत्य होने का संकेत व विशाल विस्तृत अंचल में शांति संप्रीति बनाए रखने में बदौसा की शक्तिशाली भूमिका को ही दर्शाता है।

पुत्रहीन बदौसा ने सुलक्षणयुक्त, सुदर्शन युवक चुकाफा से अपनी पुत्री का विवाह किया और वृद्धावस्था में अपने दामाद को राज्य का शासन भार सौंप दिया। बदौसा को असमिया जाति के ‘पितामह’ की आख्या दी जाती हैं क्योंकि उनके द्वारा प्रतिष्ठित कालजयी आदर्श की प्रासंगिकता से असम तथा उत्तर-पूर्वांचल की स्वदेशीय एकता को युगों तक कायम रखने का मार्ग प्रशस्त किया।

(ख) वीरांगना राधा-रुकुणी।

उत्तर: वीरांगना राधा-रुकुणी ने मोवामरीया विद्रोह में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। छः सौ वर्षों के आहोम राज के अंतिम भाग में तानाशाही हो चुके राजतंत्र के घोर अन्याय, अत्याचार के विरुद्ध सभी जाति-उपजाति के साधारण किसान प्रजा के सर्वात्मक विद्रोह का नेतृत्व मोरान लोगों ने किया। वीर राघव मोरान और नाहरखोवा मोरान की अग्रणी भूमिका के समान ही साधारण प्रजा को संगठित करने में नाहर की दो पत्नियों भातुकी, भाबुली उर्फ राधा-रुकुणी ने महत्वपूर्ण भागीदारी की। मोवामरीया विद्रोह का सूत्रपात इन दोनों के रहते हुआ। ध्यान देने योग्य है कि इन दोनों वीरांगनाओं ने उस काल में एक शक्तिशाली नारी योद्धा वाहिनी का गठन किया था। जब राजा के सैनिकों और विद्रोही वाहिनी के बीच लड़ाई हुई, तब रुकुणी के प्रबल पराक्रम के सामने राजकीय सेना टिक नहीं पाई। रुकुणी की वीरता के संदर्भ में पद्मनाथ गोहाईबरुवा ने अपनी ‘असम बुरंजी’ में लिखा है- “उस रण में रुकुणी पुरुष वेश-भूषा में धनुष-तीर लेकर लड़ी थी। गुप्त रण कौशल की ज्ञाता होने की वजह से उनके शरीर को तीर या पत्थर की गोलियां छू भी नहीं पाई थीं। इस वीरांगना की असीम वीरता की सत्य गाथा इतिहास के पन्नों में दर्ज है। परवर्ती समय में राजतंत्र के षड्यंत्र के कारण वीरांगना रुकुणी की मौत हो गई। इस प्रकार वीरांगना रुकुणी ने अपना सम्पूर्ण जीवन राज्य की भलाई के लिए न्यौछावर कर दिया।”

(ग) झपरा जगधा।

उत्तरः दसवीं शताब्दी की मोरान जनजाति के वीर पुरुषों में एक थे झपरा जगधा । उनके पिता का नाम दाखि था। वे अत्यंत सुडौल, बलशाली और साहसी थे। वे बचपन में डिब्रू नदी पार कर जंगल से हाथी पकड़ लाते थे। अन्य लड़कों की अपेक्षा जगधा अत्यंत साहसी, बली व परक्रमी थे। युवा होने पर बिहू मंडली के युवा-युवतियों के दलपति बन गये। उस समय अन्य जनजातियों के साथ अक्सर लड़ाई व संघर्ष होता रहता था। उन दिनों जगधा के नेतृत्व में एक विशाल योद्धा सैनिक दल का गठन हुआ था। सभी ने जगधा को सेनापति का दायित्व सौंपा। विभिन्न अवसरों पर उनकी सैन्य वाहिनी ने विभिन्न जाति-उपजातियों को महापराक्रम से बीसियों बार परास्त किया। एक बार खामति लोगों ने मोरान गाँव पर एक ओर से आक्रमण कर दिया था। सेनापति जगधा ने शत्रु को रोकने के लिए देवचांग में सात दिनों तक केंसाइखाती की पूजा-अर्चना की। वे तलवार हाथ में लिए नाचते हुए युद्ध में गए। उस युद्ध में सेनापति जगधा ने शत्रु को ध्वस्त करते हुए पहाड़ तक खदेड़ दिया था। 

इस प्रकार जगधा ने अनेक युद्धों में अपनी जाति की रक्षा कर जातीय वीर के रूप में प्रतिष्ठित हुए। आज भी मोरान समाज में जगधा का नाम प्रख्यात है।

(घ) मोहन सइकिया।

उत्तरः मोरान लोगों के आधुनिक काल के पुरोधा व्यक्तियों में स्वर्गीय मोहन सइकिया का जन्म तिनसुकिया जिले के अंदरूनी अंचल के 22 नंबर तामूलि गाँव में 22 नवंबर, 1930 को हुआ था। उनके पिता का नाम ज्ञानेंद्र सइकिया और माता का नाम शुकानि सइकिया था। इनकी शिक्षा गाँव से शुरू हुई। इन्होंने 1950 में डाडरी स्कूल से उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से प्रवेशिका परीक्षा उत्तीर्ण कर 1955 में डिब्रुगढ़ के कनोई वाणिज्य महाविद्यालय से बी. कॉम की डिग्री ली और वे डिब्रुगढ़ जिले के राजस्व चक्र अधिकारी कार्यालय में किरानी के पद पर आसीन हुए।

सामाजिक जीवन की दृष्टि से देखा जाए तो उन्होंने मोरान जनजाति को अनेक अवदान दिए। शिक्षित लोगों को साथ लाकर उन्होंने सन् 1965 में ‘असम मोरान सभा’ का गठन किया। मोरान सभा के माध्यम से उन्होंने मोरान समाज को खोखला कर चुके अफीम से मुक्ति दिलाने का अभियान चलाया और लोगों में जागरूकता पैदा की। उनके दिनों में ही मोरानों का अनुसूचीकरण, मोरानों को बिना प्रीमियम जमीन का पट्टा देने, मोरान बेल्ट एंड ब्लॉक का गठन आदि समेत कई मांगों से संबंधित ज्ञापन सरकार को सौंपा गया था।

उन्होंने विशिष्टतापूर्ण ‘मोरान बिहू’ को एक दकियानूस समाज से बाहर निकाल उसे विस्तृत समाज से परिचय कराया। उनके द्वारा रचे मोरान बिहू गीत का कैसेट’ होतौ-पातौ’ मोरान संस्कृति की एक अनुपम पहचान है। असम के विदेशी भगाओ आंदोलन में भी उन्होंने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। आगे चलकर वे असम गण परिषद के एक उल्लेखनीय नेता के रूप में प्रतिष्ठित हुए। इस प्रकार समाज व देश के विकास के लिए वे जीवन भर कार्य करते रहे।

(ङ) राघव मोरान।

उत्तरः असम में हुए मोवामरीया विद्रोह के प्रमुख नेता राघव मोरान थे। छः सौ वर्षों से चला आ रहा आहोम राज अपने अंतिम समय में तानाशाही हो चुका था, जिसके कारण प्रजा को अनेक प्रकार के अत्याचार, अन्याय और शोषणकारी नीति का सामना करना पड़ रहा था। ऐसे में साधारण जनता को अत्याचार,शोषण के चंगुल से मुक्त कराने के लिए राघव मोरान के नेतृत्व में मोवामरीया विद्रोह का सूत्रपात हुआ। इतिहास में भी यह स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है कि साधारण कृषक संतान राघव मोरान की युद्ध कला में अप्रशिक्षित साधारण प्रजा, बांस की लाठी, धनुष-तीर आदि सामान्य अस्त्रों से विशाल राजकीय वाहिनी को परास्त कर राजतंत्र को उखाड़ फेंकने जैसा उदाहरण और विस्मयकारी घटना विरले ही देखने को मिलती है।

राघव के आह्वान पर जाति-जनजाति निर्विशेष हर प्रजा जागृत होकर निकल आती थी, यह उनके जननेता होने का प्रमाण है। राज्य के चारों ओर राजतंत्र का घेराव कर विद्रोही वाहिनी को टुकड़े टुकड़े में तैयार कर, युद्ध में गुरिल्ला कौशल का प्रयोग कर राघव मोरान ने प्रचुर मात्रा में अपनी सांगठनिक दक्षता और युद्ध कुशलता का परिचय दिया था। अतः इसी कारण एक भेद- भावरहित समाज गढ़ने में इस पथ प्रदर्शक ने अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। जिसके कारण राघव मोरान असमीया समाज में आज भी एक आदर्श के रूप में माने जाते हैं।

अतिरिक्त प्रश्न एवं उत्तर:

1. मोरान लोग किस मूल जाति से संबंधित हैं? 

उत्तरः मोरान लोग किरात मंगोलीय मूल की जाति से संबंधित हैं।

2. मोरानों का अंतिम राजा कौन था?

उत्तरः मोरानों का अंतिम राजा बदौसा था।

3. ‘बदौसा’ शब्द का अर्थ लिखिए।

उत्तर: ‘बदौसा’ शब्द का अर्थ है-बोड़ो की संतान

4. मोरानों में प्रचलित कुछ नृत्यों के नाम लिखिए। 

उत्तरः मोरान लोगों की एक समृद्ध सांस्कृतिक विरासत है। उनमें प्रचलित नृत्यों में कुलाबुढ़ी नृत्य, जाँजा नृत्य, रणुवा नृत्य प्रमुख हैं।

5. मोरान लोगों के जातीय पशु और जातीय पेड़ के नाम बताइए। 

उत्तरः मोरान लोगों का जातीय पशु ‘हाथी’ है और जातीय पेड़ ‘होलुंग’ है।

मिसिंग:

सारांश:

मिसिंग असम की एक बड़ी जनजाति है। इन्हें ‘मिरि’ के नाम से भी जाना जाता है। भारतीय संविधान में इन्हें मैदानी जनजाति का दर्जा प्राप्त है। मिसिंग जनजाति स्वयं को ‘तानि’ के रूप में परिचय देते हैं। “तानि” शब्द का अर्थ है-मानव या आदमी। मिसिंग लोगों का पूर्व निवास स्थान असम के उत्तर का पहाड़ी क्षेत्र माना जाता है। असम की अन्य जातियों की तरह मिसिंग भी कृषिजीवी हैं। ये धान की खेती के अलावा दलहन, सरसों, विविध प्रकार के आलू, अरुई, अदरक, मिर्च आदि की खेती करते हैं।

मिसिंग लोगों का परिधान पहनावा स्वतंत्र है। पुरुष मिबु गालुग, गनर, उगन टंगाली, दुआ आदि पहनते हैं तो महिलाएँ रिहा-मेखेला, रिबि-गासँग के साथ परंपरागत आभूषण पहनती हैं। मिसिंग महिलाएँ हथकरघे पर सुंदर-सुंदर वस्त्र बुनती हैं। मिसिंग लोगों का मूल धर्म ‘दई पलो’ है, परंतु वर्तमान में वे महापुरुषीया, शैव, शाक्त, तांत्रिक व विशेषकर केवलीया या रात्रि सेवा धर्म पंथ को मानते हैं। मिसिंग लोगों का लोक- विश्वास में बड़ी आस्था है। धार्मिक उत्सव में ये ‘दबुर’ की पूजा करते हैं। विभिन्न देवताओं को संतुष्ट करने के लिए ‘दबुर’ की पूजा की जाती है। मिसिंग लोग मुर्गे को संकट का रक्षा कवच मानते हैं।

मिसिंग उत्सवप्रिय होते हैं। इनका जातीय उत्सव आलि-आये लृगांग’ है। ये अतीत काल से ही यह उत्सव मनाते आ रहे हैं। इसके अतिरिक्त वे असम का जातीय उत्सव बिहू भी मनाते हैं। मिसिंग समाज एक सुव्यवस्थित समाज है। इस समाज में पुरुष व महिला एक समान होते हैं। इनमें कोई भेद-भाव नहीं होता। पुरुषों की तरह महिलाएँ भी कृषि-कार्य, गृह कार्य आदि में समान रूप से हिस्सा लेती हैं। साहित्यकार भृगुभुनि काग्युंग, शहीद कमला मिरि, संस्कृति के पितामह ऐराम बरि, पद्मश्री यादव पायेंग आदि मिसिंग समाज के स्वनाम धन्य व्यक्ति हैं।

पाठ्यपुस्तक संबंधित प्रश्न एवं उत्तर:

1. ‘मिसिंग जनजाति के बारे में संक्षेप में लिखिए। 

उत्तर: मिसिंग असम की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति है। मिसिंग लोगों को ‘मिरि नाम से भी जाना जाता है। भारतीय संविधान में मिसिंग को ‘मिरि’ नाम से असम की मैदानी जनजाति का दर्जा दिया गया है। मिसिंग लोग ‘मिरि’ शब्द का प्रयोग स्वयं नहीं करते। ‘मिरि’ शब्द का प्रयोग मिसिंग समाज के एक वर्ग विशेष मिबू या पुरोहित के लिए किया जाता है।

2. ‘मिसिंग’ लोगों के किसी तीन प्रकार के परिधानों के नाम लिखिए। 

उत्तरः मिसिंग लोगों के तीन प्रकार के परिधानों के नाम इस प्रकार हैं- मिबु गालुग, गनर, उगन टंगाली आदि। 

3. ‘मिसिंग’ लोगों के धर्मपंथ का संक्षिप्त परिचय दीजिए।

उत्तर: ‘मिसिंग’ लोग महापुरुषीया शैव, शाक्त, तांत्रिक और विशेषकर केवलीया या रात्रि सेवा धर्म पंथ को मानते हैं। इसके बावजूद स्वधर्म के रूप में ‘दई पलो’ उनका मूल धर्म है। लोक विश्वास में इनकी बड़ी आस्था है। ये मुर्गे को संकट का रक्षा कवच मानते हैं। धार्मिक उत्सव में ‘दबुर’ की पूजा का बड़ा महत्व है। विभिन्न देवताओं को संतुष्ट करने के लिए ‘दबुर’ पूजा की जाती है। मिसिंग लोगों का विश्वास है कि ‘दई पलो’ अर्थात् सूर्य-चंद्र जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवन का संचालन करते हैं।

4. आलि आये लूगांग किसे कहते हैं और कब मनाया जाता है? 

उत्तर: ‘आलि आये लूगांग’ मिसिंग लोगों का जातीय उत्सव है। मिसिंग लोग प्राचीन काल से ही आलि आये लृगांग उत्सव मनाते आ रहे हैं। जातीय उत्सव आलि-आये लुगांग तीन पदों से मिलकर बना है- आलि, आये और लुगांग आलि का अर्थ है जमीन के नीचे होने वाला बीज, आये का अर्थ है-पेड़- पौधों पर होने वाला फल या बीज और लूगांग का अर्थ है- रोपण कार्य का शुभारंभ। यह उत्सव फाल्गुन महीने के प्रथम बुधवार को मनाया जाता है।

5. आलि आये लुगांग शब्द की व्युत्पत्ति लिखिए।

उत्तर: ‘आलि आये लुगांग’ मिसिंग लोगों का महत्वपूर्ण उत्सव है। यह उत्सव कृषि से संबंधित है।’ आलि आये लुगांग’ में तीन शब्द हैं और तीनों शब्दों की व्युत्पतिगत अर्थ अलग-अलग है। ‘आलि’ का अर्थ है – जमीन के नीचे होनेवाला बीज; ‘आये’ का अर्थ है- पेड़-पौधों पर होने वाला फल या बीज और लृगांग का अर्थ है – बीज रोपण का शुभारंभ।

6. संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए: 

(क) भृगुमुनि काग्युंग।

उत्तरः भृगुमुनि काग्युंग का जन्म सन् 1932 में अक्टूबर महीने में आलिमूर गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम खहुवा और माता का नाम याबरी था। भृगुमुनि ने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा अपने गाँव के ही 58 नंबर आलिमूर प्राथमिक विद्यालय से प्राप्त की। भृगुमुनि बचपन से ही आत्मनिर्भरशील प्रवृत्ति के थे। पिता की मृत्यु के पश्चात् स्वयं की पढ़ाई का खर्च स्वयं ही पूरी करते थे। जिसके फलस्वरूप दिन में अर्थ उपार्जन के उद्देश्य से विभिन्न प्रतिष्ठानों में काम करते और रात्रि में कॉलेज में पढ़ाई करते। इसी प्रकार पढ़ाई करते हुए जोरहाट के जेबी कॉलेज से आई.ए. और बी. बरुवा कॉलेज, गुवाहाटी से 1987 में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। हाई स्कूल में पढ़ते वक्त उन्होंने पत्रकार कमला सइकिया के साथ मिलकर सन् 1952 में दिखौमुख में एक एम.ई. स्कूल की स्थापना की तथा इसी विद्यालय में उन्होंने बिना किसी वेतन के शिक्षक के रूप में कार्य भी किया। इसके पश्चात् 1958 में जोरहाट वोकेशनल कॉलेजियट हाई स्कूल में शिक्षक के पद पर कार्य करना शुरू किया।

भृगुमुनि काग्युंग का असमीया काव्य साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान रहा है। उनके द्वारा रचित काव्य-ग्रंथ इस प्रकार हैं- कविता कलि, आनाहुत, मन बननिर जुई आदि। आनाहुत काव्य ग्रंथ के लिए उन्हें 1971 में भारत के राष्ट्रपति ने पुरस्कृत भी किया था। भृगुमुनि मिसिंग जनजाति के प्रथम राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त करने वाले व्यक्ति थे। उन्होंने असमीया भाषा के अतिरिक्त मिसिंग भाषा में भी काव्यों की रचना की। मिसिंग भाषा में रचित काव्य-संग्रह इस प्रकार हैं-क: कांग मौतम् दःजिंग। उन्होंने कुल 27 ग्रंथों का संपादन भी किया और कुछ निबंधों की भी रचना की, जिनके नाम इस प्रकार हैं- आंचलिक भाषा बनाम त्रिभाषा, मिसिंग कृष्टिर समु आभास, भाषा आरु शिक्षार भूमिका आदि।

असमीया और मिसिंग भाषा-साहित्य के विकास हेतु कार्य करते हुए भृगुमुनि काग्युंग की मृत्यु 27 मार्च, 2011 को हुई।

(ख) शहीद कमला मिरि।

उत्तर: अपनी जन्मभूमि को पराधीनता के चंगुल से मुक्त कराने के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन न्यौछावर करने वाले शहीद कमला मिरि का जन्म सन् 1894 में शिवसागर जिले के रंगामाटी मौजा अन्तर्गत ऊपर टेमेरा गाँव में हुआ था। कमला मिरि के पिता का नाम सिकौ लइंग और माता का नाम मंगली लइंग था। उन्होंने औपचारिक शिक्षा भोलागुरी से प्राप्त की।

कमला मिरि के दिनों में देश में महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वाधीनता आंदोलन भारत के कोने-कोने में फैला हुआ था तथा जिसका प्रभाव असम के लोगों पर भी पड़ा। इसी से प्रभावित होकर कमला मिरि के नेतृत्व में महुरा मौजा के बंकुवाल अंचल से विकाराम मिरि, बेजिया लइंग, भूटाई लइंग, धातुराम पेगु, बोंदा लइंग, शंभुराम मिरि आदि स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े। उन दिनों टेमेरा से लेकर गेलाबिल के उत्तरी हिस्से के गाँव में अफीम, भांग आदि मादक द्रव्यों का प्रभाव था। अफीम से भरे टेमेरा गाँव को अफीम से मुक्ति कमला मिरि और उनके सहयोगियों की देन है।

महात्मा गाँधी के नेतृत्व में हुए भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान गाँधी जी को जेल में डाल दिया गया था तब कमला मिरि की अध्यक्षता में 18/8/ 1942 को रंगामाटी मौजा के ऊपर टेमेरा गांव में शांति सेना दल का गठन कर अठारह सदस्यीय दल को गोलाघाट में धरना देने के लिए चुना गया। इसी दौरान सन् 1942 के सितम्बर महीने के आखिरी सप्ताह में गोलाघाट कांग्रेस कार्यालय में आन्दोलन का समाचार लेने के लिए जाते समय कमला मिरि और उनके साथियों को पकड़कर जेल में डाल दिया गया जहाँ इस महान देशप्रेमी की सन् 1943 के 22 अप्रैल की मध्यरात्रि को मृत्यु हो गई। इस प्रकार महान शहीद कमला मिरि ने देश की आजादी के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर दिया।

(ग) ऐराम बरि।

उत्तरः मिसिंग संस्कृति के पितामह ऐराम बरि का जन्म ब्रिटिश प्रशासन के अधीन नेफा (NEFA) के अन्तर्गत अयान गाँव में हुआ था। इनके पिता का नाम ताकिर बरि तथा माता का नाम मंडली बरि था। उनके गाँव में कोई स्कूल न होने की वजह से उन्होंने अपने गाँव से तीस पैंतीस कि.मी. दूर मुर्कंगसेलेक के अन्तर्गत मेसाकी प्राथमिक विद्यालय में चौथी कक्षा तक अध्ययन किया।

मिसिंग कला संस्कृति के पितामह ऐराम बरिदेव ने कुछ युवक- युवतियों को साथ लेकर उसकी पद्धतिबद्ध चर्चा, संरक्षण और संवर्द्धन के कार्य में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका सहयोग करने वाला पंद्रह- सोलह लोगों का एक दल था। बरिदेव की इस सांस्कृतिक मंडली ने जोनाई, पासीघाट से आरम्भ कर गुवाहाटी, जोरहाट, डिब्रुगढ़, माजुली तक लोककला का प्रदर्शन किया तथा उसे एक नई ऊँचाई प्रदान की। साथ ही उन्होंने पाँच युवतियों के सहयोग से पद्धतिबद्ध रूप में लृगांग लः ले, गुमराग नृत्य का प्रदर्शन कर मिसिंग कला को नया रूप प्रदान किया।

इसके अतिरिक्त उन्होंने पिछड़े गाँवों में व्याप्त अशिक्षा, गंदगी, एकता का अभाव, सामाजिक कुरीतियाँ आदि दुर्गुणों को दूर कर एक स्वच्छ, निर्मल समाज की स्थापना की। उन्होंने ‘अयान अंचल सुधार और उन्नति सभा’ से आरम्भ कर’ भारत के स्वतंत्रता संग्राम’ तक कई महत्वपूर्ण कार्य किये। इस प्रकार उन्होंने देश और समाज के लिए अपना सर्वस्व नौछावर कर उसे एक नई ऊँचाई प्रदान की।

(घ) यादव पायेंग।

उत्तरः प्रकृति प्रेमी यादव पायेंग का जन्म 30 अक्टूबर, सन् 1959 में जोरहाट जिले के ककिलामुख के बरघोप गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम लक्षीराम पायेंग तथा माता का नाम आफूली पायेंग था। उन्होंने अपने गाँव के बालिगाँव प्राथमिक विद्यालय से अपना शैक्षणिक जीवन प्रारम्भ किया। सन् 1979 से उन्होंने वृक्ष के पौधे लगाने का काम भी शुरू किया तथा कालांतर में विशाल ‘काठिन’ का निर्माण किया जो वर्तमान में नवगठित माजुली जिले के औना या अरुणा चापरि (चर) के किनारे स्थित है। पायेंग के ‘मोलाई काठिन’ में विभिन्न औषधिमूलक पेड़-पौधे व जीव-जन्तु भरे पड़े हैं। यह यादव पायेंग की देन है। यादव पायेंग का कहना है कि उनसे मिलने आये अतिथि अगर उन्हें ‘गामोछा’ पहनाने के बदले अगर ‘मोलाइ काठनि’ में जाकर एक-एक वृक्ष के पौधे लगाते हैं तो उन्हें बेहद खुशी होती है। पर्यावरण की सुरक्षा के लिए किए गए यादव मोलाइ पोयंग द्वारा क्रियान्वित महान कार्यों के प्रतिदानस्वरूप सन् 2012 में नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने उन्हें भारत का अख्य मानव उपाधि से सम्मानित किया। उसी साल भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने 250 लाख रुपए सहित उन्हें ‘हीरा खोदित’ पुरस्कार तथा 2015 में भारत सरकार ने पद्मश्री से नवाजा। 

इसी प्रकार उन्होंने प्रकृति और समाज के लिए कार्य करते हुए अनेक पुरस्कार प्राप्त किये तथा प्रकृति के संरक्षण में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।

अतिरिक्त प्रश्न एवं उत्तर

1. मिसिंग समाज में ‘मिरि’ शब्द किसके लिए प्रयुक्त होता है? 

उत्तर: मिसिंग समाज में ‘मिरि’ शब्द उनके एक विशेष वर्ग मिबु या पुरोहित के लिए प्रयुक्त होता है।

2. मिसिंग लोगों के लिए संवैधानिक प्रावधान क्या है? 

उत्तर: भारतीय संविधान में मिसिंग यानी मिरि को मैदानी जनजाति का दर्जा प्राप्त है।

3. मिसिंग लोग ‘तानि’ शब्द किसके लिए प्रयुक्त करते हैं ? इस शब्द का क्या अर्थ है?

उत्तर: मिसिंग लोग ‘तानि’ शब्द अपने-आप के लिए प्रयुक्त करते हैं। ‘तानि’ शब्द का अर्थ है-मनुष्य या आदमी।

4. ‘कौबांग’ क्या है?

उत्तर: मिसिंग गाँव में शांति व भाईचारा बनाए रखने के लिए गाँवबुढ़ा (मुखिया) रहता है। किसी व्यक्ति के अपराध करने पर ‘कौबांग’ यानी जनता दरबार लगाया जाता है। ‘कौबांग’ में गाँवबुढ़ा की उपस्थिति में अपराध की सुनवाई होती है। कौबांग का आयोजन गाँवबुढ़ा के आँगन में होता है।

मणिपुरी:

सारांश:

असम की जनगोष्ठियों में ‘मणिपुरी’ प्रमुख है। असम में मुख्य रूप से बराक और ब्रह्मपुत्र घाटी में मणिपुरी लोग निवास करते हैं। बराक घाटी के कछार, हैलाकांदी और करीमगंज जिले में मणिपुरी लोग स्थायी रूप से रहते हैं। वर्तमान में होजाई जिले, कामरूप महानगर जिले के गुवाहाटी, उदालगुड़ी, कार्बी आंग्लांग, डिमा- हसाओ, शिवसागर, डिब्रुगढ़, गोलाघाट आदि जिलों में मणिपुरी लोग रह रहे हैं। मणिपुरी तिब्बत-बर्मी भाषा-परिवार के अंतर्गत आती है। मणिपुरी को मैते या मीते भी कहते हैं। यह भाषा और जाति दोनों को परिभाषित करता है। मणिपुरी या मैतै लोगों की भाषा मैतैलोन है। लोन शब्द का अर्थ भाषा है। मणिपुरी भाषा की लिपि का नाम ‘मीतै मयेक’ है। मणिपुरी भाषा को सन् 1992 में संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया। इस भाषा का प्रचलन मणिपुर, असम, त्रिपुरा, मिजोरम, मेघालय, नागालैंड के अलावा दक्षिण-पूर्व एशिया के म्यांमार और बांग्लादेश में भी है। मणिपुरी भाषा वर्तमान में असम में प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर तक शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रचलित है। भाषा-साहित्य, कला-संस्कृति के क्षेत्र में मणिपुरी लोग समृद्ध हैं। मणिपुरी संस्कृति में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। महिला के बिना कोई भी धार्मिक कार्य या सामाजिक आयोजन आदि का शुभारंभ नहीं किया जाता है। महिला का स्थान पुरुष के बराबर होता है। मणिपुरी महिलाएँ पारंपरिक पोशाक पहनकर अपनी संस्कृति को अटूट रखी हुई हैं। मणिपुरी लोग धर्म पर बड़ी आस्था रखते हैं। वे वैष्णव होते हुए भी अपने कुल देवताओं ‘लाइनिंधौ छानामही’, ‘इमा लैमरेन शिदवी’ आदि देवी-देवताओं की लोकाचार के अनुसार पूजा-अर्चना करते है।” लाई हराओबा” मणिपुरी लोगों का प्रधान उत्सव है। यह उत्सव कृषि संबंधित है।‘“लाई हराओबा” का अर्थ है- ‘अदृश्य आराध्य को संतुष्ट करना।’ यह उत्सव मणिपुरी संस्कृति का दर्पण है। ‘लाई हराओबा’ के प्रधान कलाकार माइबा माइबी होते हैं। इस नृत्य का प्रधान वाद्ययंत्र ‘पेना’ होता है। पेना वीणा की तरह एक सुरीला वाद्ययंत्र है। वृहत्तर असमीया जाति के गठन में मणिपुरी लोगों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

पाठ्यपुस्तक संबंधित प्रश्न एवं उत्तर:

1. मणिपुरी लोग असम में स्थायी रूप से रहने के लिए कब आए?

उत्तर: मणिपुरी लोग असम में स्थायी रूप से 1819 में रहने के लिए आए।

2. भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में मणिपुरी भाषा कब शामिल की गई? 

उत्तर: भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में मणिपुरी भाषा को सन् 1992 में शामिल किया गया।

3. मणिपुरी मीतै/ मैतै समाज के सात येक छलाई के नाम क्या-क्या है? 

उत्तर: मणिपुरी मीतै/ मैतै समाज के सात येक छलाई के नाम इस प्रकार है- मंगांम (निधौपा), लुवांग, खुमन, मोइरांग, आगोम, खाबा- गानबा और चेंग्लै।

4. मणिपुरी मीतै/ मैतै लोगों के घरों में पूजे जाने वाले देव-देवियों के नाम क्या-क्या है? 

उत्तर: मणिपुरी मीत/ मैं लोगों के घरों में पूजे जाने वाले देव देवियों के नाम ‘युमलाई’ है।

5. लाई हराओबा क्या है? साल के किस महीने में लाई हराओबा उत्सव मनाया जाता है? लाई हराओबा उत्सव में इस्तेमाल होने वाले एक वाद्य यंत्र का नाम लिखिए।

उत्तरः ‘ लाई हराओबा’ एक मणिपुरी उत्सव एवं मणिपुरी संस्कृति का दर्पण है। यह उत्सव साल के बैसाख महीने में मनाया जाता है। लाई हराओबा उत्सव में इस्तेमान होने वाले एक वाद्य यंत्र का नाम ‘पेना’ है।

6. मणिपुरी मीतै/ मैतै लोगों के कुछ नृत्यों के नाम लिखिए। 

उत्तर: मणिपुरी मीतै/ मैतै लोगों के कुछ नृत्यों के नाम ‘थाबल चोंग्बी, ‘मोइबी जगोई’ आदि हैं।

7. संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए:

(क) नाओरिया फूलो।

उत्तरः आधुनिक मणिपुरी साहित्य के कर्णधारों में एक नाओरिया फूलो का जन्म असम के हैलाकांदी जिले के राजेश्वरपुर मौजे के ‘लाइ श्रम खुन’ नामक गाँव में 28 अगस्त, 1888 को हुआ था। उनके पिता का नाम नाओरेम चाओबा और माता का नाम थम्बो देवी था।

बीसवीं शताब्दी का तृतीय दशक मणिपुरी आधुनिक साहित्य के अरुणोदय का समय था। उन्होंने अध्यापन के समय से ही अनुवाद के जरिए साहित्य चर्चा शुरू की। सन् 1918 से सन् 1919 तक हिन्दू उपाख्यान पर कुल पाँच नाटकों की रचना की, वे इस प्रकार हैं- इनिंगथो हरिचंद्र, सीता वनवास, दष्यंत शकुंतला, श्रवण कुमार आदि। इसके अतिरिक्त उन्होंने 19 कविता, निबंधों की भी रचना की। उनकी गद्य रचनाओं में मीतै हौभमवारी (मीतै का इतिहास), गौड़ धर्म चंगकपा मतांग (गौड़ या गौड़ीय धर्म स्थापना का संधिकाल), हौरकपा अमसूंग हौभम (पुरावृत्त) इत्यादि प्रमुख हैं।

उनकी पद्य रचनाओं में यूमलाइरोन (1930), शिंथा चैथारोन (1930), सकोक थीरेन (1931) इत्यादि प्रमुख हैं।

उन्होंने अपनी विचारधारा के 12 अनुरागियों को लेकर 13 अप्रैल, 1930 में ‘ अपोकपा मरूप’ (अपोकपा समाज) का गठन किया। कालांतर में उन्होंने मणिपुर में भी अपोकपा समाज की स्थापना की।

उनकी कविताएँ आध्यात्मिक भाव और प्राचीन गौख का गुणगान, विलुप्त मीतै देव-देवियों के स्त्रोत, स्तुति, मंत्र आदि से परिपूर्ण हैं। उनके ये साहित्य अमूल्य धरोहर हैं। बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न नाओरिया फूलो की मृत्यु 30 जून, 1941 को मात्र 53 वर्ष की अवस्था में हुई।

(ख) नृत्यगुरु के. यतीन्द्र सिंह।

उत्तर: विश्व भारती शांति निकेतन संगीत भवन से सेवानिवृत्त प्राचार्य सम्मानित नृत्यगुरु के. यतीन्द्र सिंह का जन्म 22 अप्रैल, 1943 को असम के कछार जिले के लखीपुर में हुआ था। उनके पिता का नाम मणिपुरी नट-संकीर्तन गुरु की कामिनी सिंह और माता का नाम श्रीमती पशोत्लैमा देवी था। वे बचपन से ही विनम्र, विनयी, संगीत प्रेमी तथा नृत्यप्रेमी थे। उन्होंने अपने पिता से नट्- संकीर्तन और नृत्य की प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त की। सन् 1965 में छात्रवृत्ति प्राप्त कर वे विश्व भारती शांति निकेतन में नृत्य की शिक्षा प्राप्त करने गये। शिक्षा पूरी कर विश्व भारती शांति निकेतन में नृत्य एवं संगीत विभाग में अध्यापक पद पर नियुक्त हुए। वे राष्ट्रीय तथा अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित नृत्य की कई कार्यशालाओं, विचारगोष्ठियों तथा सांस्कृतिक समारोहों में नृत्य प्रदर्शित कर तथा विचार प्रकट कर लोगों का दिल जीतने में सफल रहे। विश्व भारती के संगीत विभाग के कलाकारों के साथ दक्षिण अमेरिका, चीन, जापान, मलेशिया, सिंगापुर, फ्रांस आदि समेत दुनिया के कई देशों में मणिपुरी और रवीन्द्र नृत्य का मंचन कर काफी प्रशंसा प्राप्त की थी।

वे विश्व भारती शांति निकेतन से 2010 में सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने ‘त्रिधार’ और ‘मीरजिगांनसा’ नामक दो टेलीफिल्मों में भी कार्य किया। उन्हें सन् 2000 में मणिपुरी साहित्य परिषद असम ने ‘नृत्यगुरु’ तथा 2010 में राजकुमार बुद्धिमंत मेमोरियल डांस एकेडमी, त्रिपुरा ने ‘राजकुमार मेमोरियल अवार्ड’ एवं 2012 में मणिपुरी साहित्य परिषद, इंफाल ने ‘नृत्यरत्न’ उपाधि से सम्मानित किया। इसी प्रकार कार्य करते हुए नृत्यगुरु के यतीन्द्र सिंह की मृत्यु 2 अप्रैल, 2018 को शांति निकेतन में हुई।

(ग) समाजसेविका सरस्वती सिन्हा।

उत्तरः समाजसेविका सरस्वती सिन्हा का जन्म 8 सितम्बर, 1958 को होजाई जिला के अन्तर्गत लंका के आमपुखुरी गाँव में हुआ था। उनके पिता का नाम वाहेंगबम जयचंद्र सिंह तथा माता का नाम वाहँगबम फजबी देवी था। उन्होंने अपनी प्रारम्भिक शिक्षा प्राइमरी स्कूल आमपुखुरी तथा लंका राष्ट्रभाषा हाई स्कूल से सन् 1916 में मैट्रिक की परीक्षा उतीर्ण की। उन्होंने नगाँव गर्ल्स कॉलेज से 1981 में बी.ए. तथा 1993 में नगाँव कानून महाविद्यालय से कानून में स्नातक की उपाधि प्राप्त की।

उन्होंने कुछ समय असम सरकार के समाज कल्याण विभाग में आंगनबाड़ी कर्मी के रूप में कार्य किया तथा कुछ समय आमपुखुरी एल.पी. स्कूल में अध्यापन का भी कार्य किया। उनकी पहल पर सन् 2005 में मणिपुरी भाषा-साहित्य के उत्थान के लिए होजाई में अखिल मणिपुरी साहित्य मंच का गठन किया गया। सरस्वती सिन्हा ने 1996 में होजाई शंकरदेव नगर अदालत में एक अधिवक्ता के रूप में कार्य शुरू कर अपनी प्रतिभा से अति कम समय में स्वयं को प्रतिष्ठित किया। उन्होंने नारी समाज में चेतना जागरण के उद्देश्य से होजाई, लंका, नगाँव के इलाकों की महिलाओं के विभिन्न संगठनों की स्थापना कर उसका स्वयं संचालन किया। उन संगठनों में ‘मैरा पाइबी लूप’ (मशालधारी महिला वाहिनी) नामक महिला संगठन सबसे उल्लेखनीय है। इस प्रकार विभिन्न महिला संगठनों के माध्यम से महिलाओं में नई चेतना पैदा करने में अद्भुत सफलता प्राप्त की। उन्होंने समाजसेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें मणिपुरी साहित्य परिषद, असम ने 2012 में ‘समाजसेविका’ उपाधि से विभूषित किया। 

अन्ततः 5 दिसम्बर, 2012 को वे स्वर्ग सिधार गई।

(घ) नोंगथोम्बम विद्यापति सिंह।

उत्तरः बहुमुखी प्रतिभासंपन्न नोंगथोम्बम विद्यापति सिंह का जन्म 24 नवम्बर, 1912 को हैलाकांदी जिले के लाला शहर में हुआ था। उनके पिता का नाम ललित सिंह तथा माता का नाम मइसन देवी था। विद्यापति सिंह ने 1931 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के अधीन प्रथम श्रेणी से मैट्रिक पास की। इसके पश्चात् मुरारीचंद कॉलेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा तथा 1935 में ढाका विश्वविद्यालय के अधीन इतिहास में ऑनर्स सहित बी.ए. की परीक्षा उत्तीर्ण की। उन्होंने 1936 में कछार जिले के सोनाई एम.ई. स्कूल में अंग्रेजी के शिक्षक के रूप में कार्य शुरू किया। उनकी अध्यक्षता में सन् 1939 में कछार मणिपुरी एवं युवा संघ नामक एक संगठन की स्थापना हुई। सन् 1946 में आयोजित असम विधानसभा चुनाव में साउथ हैलाकांदी से निर्वाचित हुए तथा वे सन् 1951 तक विधायक रहे। विधायक रहते समय उन्होंने अपनी मातृभाषा मणिपुरी के माध्यम में शिक्षा-दीक्षा की सुविधा प्रदान करने की माँग कई बार उठाई तथा परिणामस्वरूप असम सरकार ने मणिपुरी भाषा को शिक्षा के माध्यम के रूप में स्वीकृति प्रदान की।

स्वजाति और जनता के लिए निःस्वार्थ भाव से काम करते हुए 14 सितम्बर, 1954 को 42 वर्ष की अल्पायु में सोनाई शहर में नोंगथोम्बम विद्यापति सिंह का निधन हो गया।

अतिरिक्त प्रश्न एवं उत्तर:

1. मान सेना ने मणिपुर पर हमला कब किया? मणिपुरी लोगों का आगमन असम में कैसे हुआ?

उत्तरः मान सेना ने सन् 1819 में मणिपुर राज्य पर हमला किया। मान सेना के बर्बर अत्याचार व उत्पीड़न से तंग आकर मणिपुरी लोगों का कुछ हिस्सा असम के कछार आदि स्थानों पर आकर बस गया।

2. मणिपुरी भाषा की लिपि क्या है? 

उत्तर: मणिपुरी भाषा की लिपि का नाम ‘मीतै मयेक’ है।

3.असम सरकार ने असम में मणिपुरी भाषा को शिक्षा का माध्यम कब बनाया?

 उत्तर: असम सरकार ने सन् 1956 से मणिपुरी बहुल क्षेत्रों में निम्न प्राथमिक विद्यालयों और 1984 में हाईस्कूल स्तर पर मणिपुरी भाषा को शिक्षा के माध्यम के रूप में प्रचलित किया।

4. मणिपुरी लोगों का मुख्य खाद्य क्या है?

उत्तर: मणिपुरी लोगों का मुख्य खाद्य चावल और मछली है।

5. किन्हीं दो मणिपुरी नृत्यों का उल्लेख कीजिए। 

उत्तर: ‘थाबल चोंग्बी’, ‘मोइबी जगोई’ आदि मुख्य मणिपुरी नृत्य हैं।

6. मणिपुरी भाषा-साहित्य कैसा है?

उत्तर: मणिपुरी भाषा और उसका साहित्य समृद्ध है। मणिपुरी भाषा में अनेक अनमोल पुस्तकें हैं। नाओरिया फूलो एक महान मणिपुरी साहित्यकार थे।

राभा:

सारांश:

असम में निवास करनेवाली राभा जाति के लोग अनुसूचित जनजाति के अंतर्गत आते हैं। राभा एक आदिम जाति है। राभा समुदाय के लोग असम, मेघालय और पश्चिम बंगाल के विभिन्न स्थानों पर बसे हुए हैं। असम में राभा जनजाति गारो पहाड़ जिले के ‘फुलबारी’ से दक्षिण कामरूप के रानी तक तथा गारो पहाड़ और खासी पहाड़ जिलों के उत्तर सीमांत तक फैली हुई है। राभा समुदाय के लोग नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और भारतवर्ष के मेघालय समेत कई राज्यों के साथ असम के विभिन्न जिलों- कोकराझार, बंगाईगांव, चिरांग, बाक्सा, उदालगुड़ी, कामरूप, शोणितपुर गोलाघाट, नगांव, धेमाजी, डिब्रुगढ़, शिवसागर आदि के विभिन्न इलाकों में बसे हुए हैं। राभा इंडो-मंगोल परिवार से संबंधित है। राभा शब्द भाषा और व्यक्ति दोनों को परिभाषित करता है। अपने प्राचीन गौरव, विशिष्ट पहचान तथा पौराणिक आख्यान- उपाख्यान से परिपूर्ण है राभा जाति। राभा भाषा शोध और अभ्यास के अभाव में विस्मृत-सा हो गया है। परंतु अखिल राभा साहित्य सभा की पहल से इस भाषा में काफी शोध हुआ है तथा राभा भाषा के पुनरुद्धार व संरक्षण की पहल शुरू हो गई है। अब तक दो शब्दकोश, अनेक पाठ्यपुस्तकें एवं पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित हो चुके हैं। राभा लोग अपनी कला-संस्कृति में धनी हैं। राभा समाज में प्रचलित लोकगीत, लोककथा, लोक-विश्वास एवं लोक-संस्कृति, पूजा-अर्चना, उत्सव पर्व अपने- आप में विशिष्ठता प्रदान करते हैं। राभा जनजाति के लोग युद्ध प्रिय हैं। प्राचीन काल में भी युद्ध के क्षेत्र में पुरुष और महिला सक्रिय रूप से हिस्सा लेते थे। कृषिकार्य में भी महिलाएँ बढ़-चढ़कर हिस्सा लेती हैं। युद्ध-संघर्ष पसंद करने के कारण राभा जाति को क्षत्रीय भी कहा जाता है।

पाठ्यपुस्तक संबंधित प्रश्न एवं उत्तर:

1. राभा लोगों का आदि निवास स्थान कहाँ था? 

उत्तरः राभा लोगों का निवास स्थान असम और पश्चिम बंगाल है।

2. सामाजिक दृष्टि से राभा लोग कितनी शाखाओं में विभक्त हैं? 

उत्तर: सामाजिक दृष्टि से राभा लोग कई शाखाओं में विभक्त हैं, जैसे-रंगदानी, पाति, दाहरी, मायतरी, कोच, बितलिया, हाना, मदाही आदि।

3. राभा संस्कृति का प्रतीक क्या है? 

उत्तरः राभा संस्कृति का प्रतीक ‘मानचार्लेका’ या ‘माछरोका’ पक्षी है। यह अतीत काल से राभा संस्कृति का प्रतीक चिह्न है।

4. राभा लोगों के प्रधान देवता कौन हैं?

उत्तरः राभा लोगों के प्रधान देवता ‘रिसि’ या ‘महादेव’ हैं। राभा लोग ‘बायखो’ पूजा करते हैं।

5. राभा लोगों की मुख्य पूजा का नाम क्या है?

उत्तरः राभा लोगों की मुख्य पूजा का नाम ‘बायखो’ है। आख्यान के अनुसार ‘बाय- खोकसि’ नामक दो देवी बहनों से ‘बायखो देवी’ और ‘खोकसि देवी’ बनी हैं, जिनकी पूजा राभा लोग अतीत से करते आ रहे हैं।

6. संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए:

(क) विष्णु प्रसाद राभा।

उत्तरः कलागुरु विष्णुप्रसाद राभा कवि, साहित्यकार, नाटककार, संगीतकार, नृत्यविद्, अभिनेता, खिलाड़ी और चित्रकार थे। इनका जन्म 31 जनवरी, 1909 को ढाका शहर (वर्तमान बांग्लादेश) की सैन्य छावनी में हुआ था। उनके पिता गोपाल चंद्र राभा थे और माता गेथीबाला राभा थीं। विष्णुप्रसाद राभा ‘कलागुरु’ के नाम से चिरप्रसिद्ध हैं। विष्णु राभा की प्राथमिक शिक्षा ढाका के एक अंग्रेजी माध्यम के प्राथमिक विद्यालय में आरंभ हुई, किंतु पिता ने बाद में उन्हें बंगाली माध्यम में भर्ती कराया। तेजपुर आने पर उन्होंने असमीया माध्यम में शिक्षा प्राप्त की। सन् 1926 में तेजपुर हाई स्कूल से जिले भर में प्रथम श्रेणी में प्रवेशिका उत्तीर्ण कर ‘क्वीन एम्प्रेस’ पदक प्राप्त किया था। महापुरुष श्रीमंत शंकरदेव के प्रति विष्णु राभा की बड़ी आस्था थी। उन्होंने कलकत्ता के रिपन कॉलेज से बी.एससी. की डिग्री हासिल की थी। विष्णु राभा एक महान देशप्रेमी थे और इसलिए वे अंग्रेजों की नजरों में आ गए थे। विष्णु राभा ने अंग्रेजों की आँख में धूल झोंकते हुए रिपन कॉलेज छोड़कर कूचबिहार के विक्टोरिया कॉलेज में नाम लिखवा लिया। 

इक्कीस वर्षीय विष्णु राभा विक्टोरिया कॉलेज से स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े। उनकी यह काव्यांश उनके देशप्रेम का सुन्दर उदाहरण है- “राज्ये आछे दुइटि पाठा, एकटि कालो एकटि सादा, राज्येर यदि मंगल चाउँ, दुइटि पाठाइ बलि दाउँ ।” यह विष्णु राभा के जीवन में क्रांति की शुरुआत थी। विक्टोरिया कॉलेज में पढ़ाई अवरुद्ध होने के कारण उन्होंने माइकल कॉलेज में दाखिला लिया। किंतु चयन परीक्षा में सर्वोच्च अंक पाने पर भी उन्हें अंग्रेज की पुलिसिया परेशानी के चलते माइकल कॉलेज छोड़ने पर विवश होना पड़ा। सन् 1931 में उनके छात्र-जीवन का अंत हो गया। कलकत्ता लौटकर उन्होंने नए तेवर के साथ अंग्रेजों के खिलाफ कलम उठाई। ‘बाँही’ पत्रिका में लिखना शुरू किया और असमीया साहित्य प्रेमियों के बीच वे प्रसिद्ध हुए।

सन् 1939 में काशी विश्वविद्यालय के आमंत्रण पर विष्णुप्रसाद राभा ने नृत्य पेश किया था। महादेव का तांडव नृत्य प्रस्तुत कर डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को मंत्र-मुग्ध करने के साथ ही भूरि-भूरि प्रशंसा बटोरी थी। विद्रोही विष्णुप्रसाद राभा को सन् 1962 में देशद्रोही बताकर जेल में डाल दिया गया था।

यायावरी जीवन बिताने वाले विष्णु राभा ने कई ग्रंथ लिखे, जैसे- ‘सोनपाही’, ‘मिसिंग कनेंग’, ‘असमीया कृष्टिर समु आभास’ और ‘अतीत असम’ आदि। वे सन् 1967 में तेजपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने थे। उनका निधन 20 जून, 1969 को हुआ।

(ख) राजेन राभा।

उत्तरः विशिष्ट साहित्यकार राजेन राभा का जन्म 18 सितंबर, 1920 को दुधनै में हुआ था। राजेन राभा ने एम.ई. स्कूल से निकलते ही मात्र पाँच रुपये के पारितोषिक पर एक मारवाड़ी की दुकान में आजीविका शुरू कर दी और अपने दृढ़ संकल्प के बल पर मैट्रिक, आई.ए. और एम. ए. पास की। शिक्षा प्राप्ति के बाद वे राभा समाज-संस्कृति के अध्ययन में जुट गए। आजीवन साहित्य साधक, समाज और मानवप्रेमी राजेन राभा के विराट जीवन का प्रथम चरण दुःख और परेशानियों से भरा था।

वे असम साहित्य सभा के बंगाईगाँव अधिवेशन के उपसभापति और दुधने अधिवेशन की स्वागत समिति के सभापति थे। उन्होंने “राधा” (राभा कहानियाँ), “राभा जनजाति” आदि पुस्तक के अलावा बीसियों निबंध लिखकर असमीया साहित्य को समृद्ध किया। उन्हें असम सरकार की ओर से साहित्यिक पेंशन देने के अलावा राष्ट्रीय कृति शिक्षक का पुरस्कार भी प्राप्त हुआ था।

(ग) प्रसन्न पाम।

उत्तरः प्रसन्न पाम का जन्म सन् 1932 में ग्वालपाड़ा जिले के बालिजान मंडल के अंतर्गत लातापारा गाँव में हुआ था। इनके पिता थे फलम कुमार राभा और माता दाखेल बाला राभा थीं। प्रसन्न पाम बचपन से ही राभा कला-कृष्टि की साधना में लग गए थे। रेडियो कलाकार के रूप में मशहूर प्रसन्न पाम ने कई गोत लिखे और उनके सुर दिए।’ददान वीर’ नाटक के माध्यम से लोकप्रिय हुए प्रसन्न पाम के ‘मास्क्षेत्री’ (नाटक), “सृष्टि विधान”, “मयरा शक्ति” “लांगामुक्ति”, “कामगिरि शक्ति”, “पिदान संसार”, “माया हासंग”, “लेख तेवा जमा तंग्सा” आदि अप्रकाशित पुस्तकें हैं आजीवन राभा कृष्टि के साधक प्रसन्न राभा की मृत्यु 20 फरवरी, 1978 को एक मोटर दुर्घटना में हुई।

(घ) वीरूबाला राभा।

उत्तर: डायन हत्या जैसे अंधविश्वास को दूर कर एक स्वस्थ समाज गढ़ने की लगातार चेष्टा में अपने जीवन को समर्पित करने वाली नेत्री है- डॉ. बीरूवाला राभा। सन् 1949 में ग्वालपाड़ा जिले के ठाकुरबिला गाँव में इनका जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम कालिमाराम राधा और माता का नाम सागरबाला राभा था। सिर्फ तीसरी कक्षा तक पढ़ी बीरूवाला का विवाह पंद्रह वर्ष की उम्र में ही हो गया था। बीरूबाला राभा के कर्म- जीवन का प्रारंभ बुनाई कताई से हुआ था। इसके साथ ही सामाजिक कुसंस्कार डायन हत्या के विरुद्ध सक्रिय हो गई। निरंतर अंधविश्वास के विरुद्ध लड़तीं बीरूवाला राभा को कई पुरस्कार और सम्मान दिए गए। वर्तमान में ‘Mission Birubala’ के नाम से डायन हत्या जैसे अंधविश्वास के खिलाफ वे लगातार अभियान चला रही है।

अतिरिक्त प्रश्न एवं उत्तर:

1. राभा समाज में अनेक लोक-विश्वास प्रचलित है। उनमें से किसी का उल्लेख कीजिए।

उत्तरः राभा समाज में पारंपरिक लोक विश्वास के अनुसार संसार के सृष्टिकर्ता ‘रिसि’ (महादेव) से उन्हें भाषा, कला, खाद्य सामग्री आदि दान स्वरूप मिले है।

2. राभा जाति में कौन-कौन-सी शाखाएँ राभा भाषा जानती और कौन- कौन-सी नहीं?

उत्तरः राभा जाति में रंगदानी, मायतरी और कोच राभा लोग ही राभा भाषा जानते हैं। पाति, दाहरी, बिटलीया, हाना आदि राभा भाषा नहीं जानते।

3. राभा लोगों का प्रमुख त्योहार क्या है?

उत्तरः राभा लोग प्राचीन काल से ‘बायखो’ पूजा करते आ रहे हैं। ये लोग जड़ उपासक हैं। पत्थर, पैड़-पौधे की पूजा कर सूअर, मुर्गी, कबूतर आदि अर्पित करते हैं।

4. राभा समाज के कुछ विशिष्ट व्यक्तियों के नाम बताइए। 

उत्तरः राभा समाज में वीर राजा ददान, योद्धा मारुक्षेत्री, राजा परशुराम राभा जैसी महान विभूतियाँ सत्रहवीं शताब्दी में अपने पराक्रम के लिए प्रसिद्ध थे। आधुनिक काल में विष्णु प्रसाद राभा, राजेन राभा, डॉ. बीरूबाला राभा जैसे व्यक्तियों के नाम असम के विकास और एकता में उल्लेखनीय हैं।

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